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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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प्रस्तावना [ ७ अवस्था में अपने यथार्थ स्वरूप को फिर प्राप्त करे। इस प्रकार स्वरूप को प्राप्त हुआ पुरुष अपनी इन्द्रियों से इन्द्रियों के स्वामी, भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा के परायण रहता है।' अतएव इन्द्रियों का अपने यथार्थ स्वामी की सेवा में तत्पर रहने का नाम ही भक्तियोग है। बद्ध अवस्था में इन्द्रियाँ शरीर की माँगों की पूर्ति में लगी रहती हैं। जब वही इन्द्रियाँ श्रीकृष्ण के आज्ञापालन में लग जाती हैं, तो उसे भक्ति कहते हैं। जब तक मनुष्य समझता है कि वह किसी परिवार का अथवा समाज का है और शरीर में आत्मबुद्धि रखता है, तब तक वह उपाधि- बद्ध है। जब इस बात का पूरा बोध होता है कि वह किसी परिवार, समाज अथवा देश का नहीं है, वरन् श्रीकृष्ण से उसका शाश्वत् सम्बन्ध है, उस समय वह अनुभव करता है कि उसे अपनी शक्ति का उपयोग तथाकथित परिवार, समाज और राष्ट्र के स्वार्थ के लिए न करके श्रीकृष्ण की सेवा में करना चाहिए। यही जीवन का शुद्ध प्रयोजन और कृष्णभावनाभावित शुद्ध भक्तियोग है।