भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३६ श्रीकृष्ण से योग के प्रकार जब श्रीकृष्ण और उनके भक्त मिलते हैं तो उनके इस मिलन को योग कहा जाता है। श्रीकृष्ण और उनके भक्तों के योग तीन प्रकार के हैं—सिद्धि, तुष्टि तथा स्थिति। जब कोई भक्त बड़ी उत्सुकता के साथ श्रीकृष्ण से मिलता है तो उस मिलन को सिद्धि कहते हैं। 'कृष्णकर्णामृत' में बिल्वमंगल ठाकुर ने वर्णन किया है कि किस प्रकार मोर मुकुटधारी, वक्षःस्थल पर मरकतमणियों से सुशोभित तथा नित्य मोहक स्मित, कान्ति और चंचल नेत्र एवं कोमल शरीरांग श्रीकृष्ण अपने भक्त से मिलते हैं। श्रीमद्भागवत (१०.३८.३४) में शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित से कहते हैं, "हे राजन् ! रथ पर सवार अक्रूर ने जैसे ही वृन्दावन में अग्रज बलराम सहित श्रीकृष्ण को देखा, वैसे ही वह रथ से नीचे उतर पड़ा और वैकुण्ठनाथ के अतिशय स्नेहवश उनके चरणों में साष्टांग दण्डवत् करने लगा। ये सिद्ध योग के कुछ उदाहरण हैं। जब कोई भक्त लम्बे विरह के बाद श्रीकृष्ण से मिलता है तो उस मिलन को तुष्टि कहते हैं। श्रीमद्भागवत (१.११.१०) में उल्लेख है जब श्रीकृष्ण अपनी राजधानी द्वारका को लौटे तो वहाँ के निवासी कहने लगे, "हे नाथ ! आप विदेश में इतने लम्बे समय तक रहेंगे तो हमें निस्सन्देह आपके मुस्कराते मुख मण्डल के दर्शन से वंचित रहना पड़ेगा। हे प्रभो ! आपके मुख को देखकर हम आपके नित्य सेवकों को बड़ा सन्तोष होता है। सारी चिन्ताएँ और उद्वेग तुरन्त समाप्त हो जाते हैं। यदि द्वारका में आपकी अनुपस्थिति के कारण हम आपको न देख पाये तो और अधिक हमारे लिये जीवित रहना संभव न होगा।" यह दीर्घकालीन विच्छेद के बाद श्रीकृष्ण से योग होने से तुष्टि रूप का उदाहरण है। श्रीकृष्ण का निजी सेवक दारुक द्वारका के द्वार पर श्रीकृष्ण को आया देख उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम करना तक भूल गया।