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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 380 में से

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पृष्ठ 298

श्रीकृष्ण के साथ भक्त के सहवास को विद्वान् लोग भक्ति की सिद्धि कहते हैं। भक्तियोग की इस सिद्ध अवस्था का वर्णन 'हंसदूत' नामक ग्रन्थ में है। वहाँ वर्णन है कि किस प्रकार जिसके नाम से भी गोपियों को भय लगता था वह अक्रूर कृष्ण को कुरुवंश के कार्यकलापों के विषय में बताता था। बृहस्पति के शिष्य उद्धव को भी वह स्थिति प्राप्त थी। यह श्रीकृष्ण के सामने भूमि पर घुटने टेक कर उनके चरणकमलों को दबाया करता था। जब कोई भक्त भगवान् की सेवा के परायण होता है तो उसे 'योग' को प्राप्त हुआ कहा जाता है। भाव यह है कि भगवान् श्रीकृष्ण से योग का प्रारम्भ तभी से हो जाता है जब भक्त उनकी सेवा करने में प्रवृत्त होता है। दास्यभाव वाले भक्त जब भी उनसे मिलते हैं तो वे अपनी विशिष्ट सेवा का अर्पण करते हैं। वे श्रीकृष्ण के आगे आज्ञा की प्रतीक्षा में बैठ जाते हैं। कुछ व्यक्ति भक्ति की इस अवस्था को यथार्थ भक्तियोग मानने में संकोच करते हैं और कुछ पुराणों में भी भक्तियोग के इस दास्यभाव को यथार्थ भक्तियोग नहीं माना गया है। परन्तु श्रीमद्भागवत में स्पष्ट निर्देश है कि श्रीकृष्ण से दास्य का सम्बन्ध योग साक्षात्कार का यथार्थ प्रारम्भ है। श्रीमद्भागवत (११.३.३२) में उल्लेख है कि भक्तगण श्रीकृष्ण का प्रेमपूर्वक चिन्तन करते हुए कभी हँसते हैं, कभी खिलखिलाते हैं, कभी असाधारण रूप में बोलने लगते हैं, कभी नाचते हैं, कभी गाते हैं, कभी पूर्ण रूप से उनकी सेवा में लग जाते हैं और कभी चुपचाप समाधिमग्न जैसे बैठ जाते हैं। इसी प्रकार श्रीमद्भागवत (७.७.३४) में प्रह्लाद महाराज अपने मित्रों से कह रहे हैं, "जैसे ही शुद्धभक्त लीलामय भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य लीला-कथा को सुनते हैं अथवा उनकी गुणावली का उनके कर्ण रन्ध्रों में प्रवेश होता है वैसे ही वे आनन्द विह्वल हो उठते हैं। उनके शरीर में सारे सात्त्विक भावों का उदय हो जाता है। वे आँसू बहाते हैं, रुक-रुक कर बोलते हैं, उच्च स्वर से भगवान् का कीर्तिगान करते हैं और भावोन्मत्त नृत्य भी करने लगते हैं। ये सब भाव निरन्तर रहते हैं। परन्तु कभी-कभी वे सब सीमाओं का उल्लंघन भी कर जाते हैं और इस प्रकार सबके समक्ष प्रकट हो जाते हैं। भगवान् की शरणागति के छः अंग हैं—भक्तियोग के अनुकूल जो कुछ हो उसका संकल्प; जो भक्तियोग के प्रतिकूल हो उसका त्याग; श्रीकृष्ण निरन्तर रक्षा करेंगे ऐसा दृढ विश्वास; अपने को श्रीकृष्ण के भक्तों के साथ

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