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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 300

अध्याय ४० श्रीकृष्ण के मित्र तथा अन्य लाल्याभिमानियों की गौरवप्रीति यथार्थ गौरवप्रीति उनमें प्रकट होती है जो अपने को श्रीकृष्ण का कृपापात्र मानते हैं अथवा जो अपने को श्रीकृष्ण का पुत्र समझते हैं। इस लाल्याभिमान के सर्वोत्तम उदाहरण सारण, गद और सुभद्र हैं। ये सब यदुवंशी थे और निरन्तर अपने को श्रीकृष्ण द्वारा रक्षित समझते थे। इसी प्रकार श्रीकृष्ण के प्रद्युम्न, चारुदेष्ण, और साम्ब आदि पुत्र भी इसी प्रकार समझते थे। द्वारका में श्रीकृष्ण के अनेक पुत्र थे। अपनी सोलह हजार एक सौ आठ रानियों में से प्रत्येक से उनके दस-दस पुत्र थे। ये सब, जिनमें से प्रद्युम्न, चारुदेष्ण और साम्ब प्रधान थे, निरन्तर अपने को श्रीकृष्ण द्वारा रक्षित समझते थे। जब श्रीकृष्ण के पुत्र उनके साथ भोजन करते तो कभी-कभी वे अपना मुँह खोलते जिससे श्रीकृष्ण खिला सकें। जब श्रीकृष्ण अपने किसी पुत्र की पीठ पर हाथ फेरते तो वह झट उनकी गोद में जा बैठता। श्रीकृष्ण जैसे ही उसका सिर सूंघते हुए आशीर्वाद देते, दूसरे आँसू बहाने लगते—यह सोचते हुए कि पूर्वजन्म में उसने कितने पुण्य कर्म किए होंगे। श्रीकृष्ण के अनेक पुत्रों में पट्टमहिषी रुक्मिणी का पुत्र, प्रद्युम्न सर्वप्रधान समझा जाता है। प्रद्युम्न का रूप ठीक श्रीकृष्ण जैसा है। श्रीकृष्ण के शुद्धभक्त प्रद्युम्न को सर्वोत्कर्षशाली कहकर जय- जयकार करते हैं, क्योंकि वह अपने रूप से श्रीकृष्ण भ्रम का उत्पन्न करने वाला है। हरिवंश में प्रभावती का हरण करते हुए प्रद्युम्न के क्रियाकलाप का वर्णन है। उस समय प्रद्युम्न ने प्रभावती से कहा, "हे प्रभावती ! हमारे कुल के प्रधान श्रीकृष्ण गरुड़वाहन स्वयं साक्षात् नारायण हैं। वे ही हमारे परम स्वामी हैं। उनकी रक्षा का हमें ऐसा गौरव और विश्वास