भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु हो चला है कि कभी-कभी तो हम त्रिपुरारी (शिवजी) से लड़ने में भी संकोच नहीं करते। सम्भ्रम एवं गौरव से युक्त भक्ति दो प्रकार के भक्तों में पाई जाती है—जो भगवान् के कृपापात्र हैं और जो उनके पुत्र हैं। द्वारकानिवासी सेवक निरन्तर श्रीकृष्ण को परमाराध्य भगवान् के रूप में भजते हैं। उनमें श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य ज्ञान की प्रधानता रहती है। वे इसी पर मोहित रहते हैं। अपने को निरन्तर श्रीकृष्ण द्वारा रक्षित समझने वाले यदुवंशियों का यह विश्वास प्रायः विपदा पड़ने पर बहुत शीघ्र प्रत्यक्ष अभिव्यक्त हो जाता था। ऐसे अनेक अवसरों का उल्लेख है। कभी श्रीकृष्ण के पुत्र अनधिकार चेष्टा करते; परन्तु फिर भी कृष्ण-बलराम ने सदा उन्हें पूर्ण संरक्षण दिया। श्रीकृष्ण के अग्रज बलराम भी कभी-कभी जाने-अनजाने उन्हें आदर देते थे। एक समय जब श्रीकृष्ण बलरामजी के सामने आये तो वे अपने अग्रज को प्रणाम करने को उद्यत हुए। परन्तु उसी समय बलराम की गदा श्रीकृष्ण के चरणकमलों में झुक गई। भाव यह है कि बलराम के हाथ ने श्रीकृष्ण को प्रणाम किया। ये लाल्य अथवा आश्रयता के भाव कभी-कभी अनुभाव के रूप में अभिव्यक्त होते हैं। जब स्वर्गीय देवता श्रीकृष्ण के पास आये तो श्रीकृष्ण के सारे पुत्रों ने उनका अनुगमन किया और ब्रह्माजी ने अपने कमण्डलु से उन पर सुगन्धित जल का परिवर्षण किया। जब देवता श्रीकृष्ण के सामने आये तो पुत्र स्वर्ण सिंहासनों पर बैठने के स्थान पर श्रीकृष्ण के सामने भूमि पर बिछे हुए मृगचर्म के ऊपर बैठ गये। कभी-कभी श्रीकृष्ण के पुत्रों का व्यवहार उनके निजी सेवकों के समान प्रतीत होता है। उदाहरण के लिये प्रणाम करना, अधिकतर चुप रहना, संकोच, विनय की बहुलता और अपने प्राणों को देकर भी आज्ञा का पालन करना, सिर नीचा रखना, स्थिरता, खांसने और हँसने आदि का परित्याग, और उनकी अत्यन्त गुप्त क्रीड़ा और बातों आदि से दूर रहना—ये सब दासों के समान लाल्यजनों में भी होने वाले अनुभाव हैं। अतएव गौरवभक्ति में लगे भक्तों को श्रीकृष्ण की माधुर्य लीला का वार्तालाप कभी नहीं करना चाहिए। मुक्त हुए बिना कोई भी श्रीकृष्ण से नित्य सम्बन्ध की घोषणा न करे बद्धदशा में भक्तों के लिये भक्तियोग के विधि-विधान का पालन अनिवार्य है। भक्ति- योग के परिपक्व होने पर और स्वरूप का साक्षात्कार होने पर ही वह