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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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श्रीकृष्ण के मित्र तथा अन्य लाल्याभिमानियों की गौरवप्रीति [ :२७५ श्रीकृष्ण से अपने नित्यसम्बन्ध को जान सकता है। कृत्रिम रूप से किसी सम्बन्ध को स्थापित करने का प्रयत्न करना ठीक नहीं। अपरिपक्व दशा में कभी-कभी देखा जाता है कि कोई बद्ध पुरुष अस्वाभाविक रूप से श्रीकृष्ण से माधुर्य प्रेम का सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है। इसका परिणाम यह होता है कि वह प्राकृत सहजिया बन जाता है। ऐसे व्यक्ति श्रीकृष्ण से माधुर्य सम्बन्ध स्थापित करने को तो बड़े आतुर रहते हैं; परन्तु देखा जाता है कि प्राकृत-जगत् में उनका बद्धजीवन फिर भी परम निकृष्ट बना रहता है। जिसका वास्तव में श्रीकृष्ण से सम्बन्ध हो गया है वह फिर प्राकृत स्तर पर कार्य नहीं कर सकता और उसका निजी चरित्र सर्वथा अनिन्द्य हो जाता है। श्रीकृष्ण के दर्शन के लिये कंदर्प को आया देख किसी भक्त ने उसे संबोधित करते हुए कहा, 'हे कंदर्प ! अपने नेत्रों से श्रीकृष्ण के चरण युगला- रविन्द देखने का तुम्हें सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इसलिये तुम्हारे शरीर पर स्वेदकण जमकर कंटकी के फलों की सी शोभा पा रहे हैं।" ये श्रीभगवान् के लिये प्रीति और गौरव के लक्षण हैं। जब यदुवंशी राजकुमारों ने दूर से श्रीकृष्ण के पांचजन्य शंख की ध्वनि सुनी तो तुरन्त भावमय आह्लादवश उनके शरीर में रोमांच हो आया। प्रतीत होता था मानो उस समय राज- कुमारों के रोम भावोन्माद में नृत्य कर रहे हैं। हर्ष के अतिरिक्त कभी-कभी निर्वेद के लक्षण भी होते हैं। प्रद्युम्न ने एक बार साम्ब को सम्बोधित किया, "हे साम्ब ! तुम्हें पता है कि एक बार जब तुम भूमि पर लोट रहे थे तो तुम्हारी देह धूल से लथपथ हो गई थी, फिर भी हमारे पिता भगवान् श्रीकृष्ण ने तुम्हें अपने अंक में उठा लिया। मैं ऐसा मन्दभाग्य हूँ कि पिता से ऐसा प्रेम कभी नहीं पा सका।" यह प्रेम में निर्वेद का लक्षण है। श्रीकृष्ण को अपना पूज्य मानना गौरवभाव है और जब इसके अतिरिक्त भक्त श्रीकृष्ण को अपना रक्षक मानता है तो श्रीकृष्ण के लिये उसका दिव्य प्रेम अधिक बढ़ जाता है। इस प्रकार के सम्मिलित भावों को गौरवप्रीति कहते हैं। यही स्थायी गौरवप्रीति आगे बढ़ने पर गौरव भक्तिमय प्रेम कहलाता है। इस अवस्था के दो प्रमुख लक्षण राग और स्नेह हैं। इस गौरव के भक्तिभाव में प्रद्युम्न ने अपने पिता से कभी उच्च स्वर में बात नहीं की। वास्तव में उसने अपनी होठों की मुद्रा को कभी तनिक भी नहीं खोला और न कभी प्रेमआँसुओं से पूर्ण अपने मुख को ऊपर