भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसख्यभक्तिरस [ २७६
प्रियता, बुद्धिमानी, क्षमाभाव, सब प्रकार के मनुष्यों को आकृष्ट करने की शक्ति, उनका ऐश्वर्य और उनका सुख—ये सब सख्यरस को उद्दीप्त करते हैं। श्रीकृष्ण के वृन्दावनवासी पार्षदों को देखने पर भी सख्यरस का उद्दीपन होना बड़ा स्वाभाविक है क्योंकि उनके निजी स्वरूप, गुण तथा परिधान आदि सब श्रीकृष्ण के समान हैं। ये पार्षद सदा श्रीकृष्ण की सेवा में प्रसन्न रहते हैं। इन्हें सामान्यतः वयस्य कहा जाता है अर्थात् समकालीन, समान आयु के मित्र। इन मित्रों को सदा श्रीकृष्ण के संग में विश्वास रहता है। भक्त कभी-कभी प्रार्थना करते हैं, “हम श्रीकृष्ण के वयस्क मित्रों को प्रणाम करते हैं, जिन्हें श्रीकृष्ण के सख्य और संरक्षण में पूर्ण विश्वास है और जिनकी श्रीकृष्ण में स्थायी भक्ति है। वे निर्भय हैं और श्रीकृष्ण के समकक्ष होकर अपनी दिव्य प्रेममयी सेवा का अर्पण करते हैं।” ये शाश्वत् वयस्य वृन्दावन के बाहर द्वारका, हस्तिनापुर आदि स्थानों पर भी पाये जाते हैं। वृन्दावन के अतिरिक्त श्रीकृष्ण की लीला के अन्य सब स्थल पुर कहलाते हैं। मथुरा और कुरुओं की राजधानी हस्तिनापुर—ये दोनों पुर हैं। अर्जुन, भीम, द्रौपदी, श्रीदामा, ब्राह्मण, इत्यादि सब पुरों में श्रीकृष्ण के सख्य भक्त हैं। पाण्डवों द्वारा श्रीकृष्ण के संग का आस्वादन करने का वर्णन इस प्रकार है—“जब श्रीकृष्ण कुरुवंशियों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ पधारे तो महाराज युधिष्ठिर तुरन्त उनकी अगवानी के लिये बाहर आये और श्रीकृष्ण के सिर को सूँघने लगे।” यह वैदिक परिपाटी है कि जब छोटे बड़ों को पैर छूकर प्रणाम करें तो बड़े उनका सिर सूँघा करते हैं। भीम और अर्जुन दोनों श्रीकृष्ण की भुजाओं से लिपट गये और नकुल और सहदेव ने अश्रुपूरित नेत्रों से झुककर श्रीकृष्ण के चरणकमलों में प्रणाम किया। इस प्रकार पाँचों पाण्डव श्रीकृष्ण के साथ दिव्य सख्यरस का आस्वादन कर रहे थे। पाँचों में अर्जुन का श्रीकृष्ण से सर्वाधिक अंतरंग सम्बन्ध है। उसके हाथ में ‘गाण्डीव’ नामक प्रख्यात धनुष रहता है; जंघाएँ हाथी की सूँड के समान सुन्दर हैं और नेत्र दीर्घातिरक्त हैं। जब श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों साथ-साथ रथ पर विराजते हैं तो उनकी बड़ी अतुलनीय शोभा होती है जिससे सबके नेत्रों को आनन्द मिलता है। अर्जुन प्रायः शय्या पर लेटे हुए श्रीकृष्ण की गोद में सिर रखकर उनसे वार्ता अर्थात् परिहास किया करते। इस प्रकार मुस्कराते हुए श्रीकृष्ण के संग में उसे बड़ा सन्तोष मिलता। जहाँ तक ब्रजसम्बन्धी वयस्यों का सम्बन्ध है वे क्षणभर भी