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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 307

२८०] भक्तिरसामृतसिन्धु श्रीकृष्ण को न देखने पर विह्वल हो उठते हैं। श्रीकृष्ण के वृन्दावन के वयस्य मित्रों से एक भक्त की प्रार्थना है—“श्रीकृष्ण के वयस्य मित्रों की जय हो, जो आयु, गुण, विलास, वेष एवं शोभा में साक्षात् श्रीकृष्ण के समान हैं। वे निरन्तर अपनी वेणुओं को बजाते रहते हैं और उन सब के श्रृंग श्रीकृष्ण के समान ही इन्द्रनील, स्वर्ण और पद्मराग मणि से जड़ित हैं। वे निरन्तर श्रीकृष्ण के समान आह्लादित रहते हैं। श्रीकृष्ण के ये शोभामय मित्र सहचर हमारी रक्षा करें।” वृन्दावन धाम के वयस्यों का श्रीकृष्ण से ऐसा अन्तरंग सख्य है कि कभी-कभी वे अपने को श्रीकृष्ण के समान समझने लगते हैं। इसका एक उदाहरण इस प्रकार है—“श्रीकृष्ण को अपने बायें हाथ से गोवर्धन पर्वत को धारण किये देखकर वयस्य कहने लगे, “हे सखे ! तुम्हें गोवर्धन को धारण किये खड़े-खड़े बिना विश्राम किये सात दिन-रात बीत गये हैं। यह देखकर हमें बड़ा दुःख हो रहा क्योंकि तुम थक गये हो। इसलिये अब इस पर्वत को श्रीदामा के हाथ पर रख दो। यदि तुम समझते हो कि श्रीदामा इसे नही उठाता तो कम से कम अपने ही दाहिने हाथ में ले लो जिससे हम तुम्हारे बायें हाथ की अच्छी प्रकार से मालिश कर सकें।” यह उस अन्तरंगता का परिचायक है जिसमें वयस्य अपने को श्रीकृष्ण के बराबर समभते हैं। श्रीमद्भागवत (१०.१२.११) में शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित से कहते हैं, “हे राजन् ! श्रीकृष्ण विद्वान् योगियों के लिये साक्षात् भगवान् हैं; निर्विशेषवादियों के लिये परम सुख हैं; भक्तों के लिये परम आराध्य देव हैं और जो माया के बन्धन में पड़े हैं उनके लिये साधारण बालक हैं। कल्पना तो करो कि ये गोप-बालक परम पुरुष के साथ समान भाव से खेल रहे हैं। अवश्य ही उन्होंने पूर्वजन्म में पुण्यों के पुन्ज एकत्र किये होंगे, जिससे भगवान् से उन्हें ऐसा अन्तरंग सख्यभाव का सम्बन्ध प्राप्त हुआ है।” श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने वृन्दावनीय वयस्यों के लिये अपना भाव व्यक्त किया है। वे बलरामजी से कहते हैं, “हे भ्राता ! जिस समय मेरे सखा अघासुर द्वारा निगले जा रहे थे तो मेरे नेत्रों से गरम-गरम आँसू झरने लगे। जैसे मेरे गाल उनसे भीगे, एक क्षण के लिये मैं अपने को भी पूर्ण रूप से भूल बैठा।” गोकुल में श्रीकृष्ण के वयस्यों के सामान्यतः चार गोष्ठ माने जाते