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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 380 में से

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पृष्ठ 308

सख्यभक्तिरस [ २८१ हैं—सुहृद, सखा, प्रिय सखा, तथा प्रियनर्म सखा । श्रीकृष्ण के सुहृद उनसे तनिक बड़े हैं और इसलिये उनमें श्रीकृष्ण के लिये थोड़ा वात्सल्य पाया जाता है। वे निरन्तर सब प्रकार के भय से उनकी रक्षा के लिये तत्पर रहते हैं। इस प्रकार वे कभी-कभी अस्त्र भी धारण करते हैं जिससे श्रीकृष्ण का अनिष्ठ करने आए दुष्टों को मार भगाएँ । इनमें सुभद्र, मण्डलीभद्र, भद्रवर्धन, गोभट, यक्ष, यक्षेन्द्र भट, भद्रांग, वीरभद्र, महागण, विजय तथा बलभद्र आदि हैं। श्रीकृष्ण से थोड़े बड़े होने से वे निरन्तर उनका हितचिन्तन किया करते हैं। उनके सख्य का उदाहरण इस प्रकार है—"हे मण्डलीभद्र ! तुम अपनी चमकती हुई तलवार को क्यों घुमा रहे हो। ऐसा लगता है मानो अरिष्ट सुर को मारने दौड़ते हो। हे बलदेव ! तुमने व्यर्थ ही अपने हल को क्यों धारण कर रखा है ? हे विजय ! बिना प्रयोजन घबड़ाओ नहीं। हे भद्रवर्धन इस प्रकार गरजने की कोई आवश्यकता नहीं। यदि तुम ध्यान से देखो तो पाओगे कि यह केवल गोवर्धन पर्वत पर गरजने वाला एक बादल है। यह सांडरूप धारी अरिष्टासुर नहीं है, जैसा कि तुम समझ रहे हो।" ये सब श्रीकृष्ण के बड़े सुहृद सखा बड़े से मेघ को सांडरूप धारी अरिष्टासुर समझ बैठे थे । इसी उत्तेजना के बीच उनमें से एक को पता चला कि यह तो वास्तव में गोवर्धन पर्वत पर गरजने वाला बादल है । अतएव उसने दूसरों को सूचित किया कि श्रीकृष्ण के लिये चिन्ता करने का कोई कारण नहीं है--वर्तमान में अरिष्टासुर का भय नहीं है। इन सुहृदों में मण्डलीभद्र और बलभद्र प्रधान हैं। मण्डलीभद्र का वर्णन इस प्रकार है—"पीतवर्ण वस्त्र से सुशोभित शरीरांग वाला, हाथ में चितकबरी लाठी पकड़े हुए, कमल जैसी कान्ति को धारण किये हुए मोरमुकुटधारी मण्डलीभद्र शोभायमान है।" उसका सख्यभाव इस वाक्य से प्रकट होता है, "हे सखाओं ! गायों को चारण कराते हुए दूर-दूर वन में विचरण करने से हमारे प्रिय श्रीकृष्ण बहुत थक गये हैं। इसलिये अब घर सोते हुए इनके सिर को मैं धीरे-धीरे दबाता हूँ । सुभद्र तुम चरण दबाओ।" एक भक्त ने बलदेव के निजी सौन्दर्य का वर्णन इन शब्दों में किया है—"कपोलों से लगते कुण्डलों से जिनकी शोभा अतिशय हो उठी है, जिनका माथ कस्तूरी तिलक से सुशोभित है, वक्षःस्थल पर गुञ्जा की माला विराजमान है, जिनका वर्ण शरदकालीन मेघों के समान धवल है, जो नीलाम्बर धारण करते हैं और जिनकी वाणी बड़ी गंभीर है, भुजाएँ

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