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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 309

२८२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु आजानुलम्बित हैं और अपने महान् पराक्रम को जिन्होंने प्रलम्बासुर का वध करके प्रकट किया है, उन बलदेवजी की मैं शरण लेता हूँ।" श्रीकृष्ण के लिये बलदेव का स्नेह सुवल से कहे इस वाक्य में अभि- व्यंजित है—"हे सखे ! कृपया श्रीकृष्ण से कह देना कि वे आज कालिय दह के निकट न जायें। आज उनकी जन्मतिथि है। इसलिये यशोदा मैया के साथ मैं उन्हें स्नान कराने जाना चाहता हूँ। उनसे कह देना कि आज घर से न जायें।" इससे प्रकट होता है कि श्रीकृष्ण के अग्रज बलरामजी सख्यप्रीति के अर्न्तगत होने वाले वात्सल्य से श्रीकृष्ण का ध्यान रखते थे। जो श्रीकृष्ण से छोटे हैं, जिनमें प्रीति की गन्ध पाई जाती है और जो निरन्तर उनकी नाना प्रकार से सेवा करते हैं वे सखा हैं। इनके उदाहरण हैं—विशाल, वृषभ, ओजस्वी, देवप्रस्थ, वरूथप, मरन्द, कुसुमापीड, मणिवन्ध तथा करन्धम। श्रीकृष्ण के ये सब सखा केवल उनकी सेवा चाहते हैं। कभी-कभी वे प्रातःकाल जल्दी उठकर तुरन्त नन्द महाराज के द्वार पर जाकर खड़े हो जाते और गोचारण के लिए श्रीकृष्ण के साथ जाने को उनकी प्रतीक्षा करते। इस बीच यशोदा मैया श्रीकृष्ण को तैयार करतीं और जब वे किसी बालक को द्वार पर खड़े देखतीं तो पुकार कर कहतीं, 'अरे विशाल, तू वहाँ क्यों खड़ा है यहाँ आ।' इस प्रकार यशोदा मय्या की अनुमति से वह अविलम्ब घर में चला जाता । यशोदा मैय्या को श्रीकृष्ण को वस्त्राभूषणों से अलंकृत करते देखकर वह भी श्रीकृष्ण को कंकण किंकणी पहनाने में सहायता करता। वह देखता श्रीकृष्ण परिहास में उसे अपनी वंशी से छूते। तब यशोदा जी कहने लगतीं, "कृष्ण यह क्या ? तू अपने सखा को क्यों चिढ़ा रहा है।" इस पर श्रीकृष्ण हँस पड़ते और सखा भी हँसने लगता। यह सब श्रीकृष्ण के सखाओं की कुछ क्रियाएँ हैं। कभी-कभी सखा इधर-उधर जाकर गायों की देखभाल करते और श्रीकृष्ण से कहते, "कृष्ण तुम्हारी गायें इधर-उधर जा रही हैं।" और श्रीकृष्ण इसके लिये उनका धन्यवाद करते। कभी-कभी सखाओं सहित श्रीकृष्ण के गोचारण के लिये चले जाने पर कंस उनको मारने के लिये किसी असुर को भेजता। अतएव प्रायः प्रतिदिन ही किसी न किसी प्रकार के असुर से युद्ध होता था। इस प्रकार के युद्ध के बाद श्रीकृष्ण बहुत थक जाते और उनके सिर के बाल भी बिखर जाते। ऐसे अवसर पर सखा तुरन्त आकर उन्हें नाना प्रकार से सुख देने का प्रयास करते। कुछ मित्र कहते, 'हे विशाल ! लो यह कमल का पंखा और श्रीकृष्ण को हवा करो जिससे उन्हें कुछ सुख मिले। वरूथप उलझे हुए