भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
पृष्ठ 310, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंसख्यभक्तिरस [ २८३ बालों को ठीक करो। हे वृषभ ! व्यर्थ बोलना रोक कर शरीर को दबाओ क्योंकि उस असुर से युद्ध करने में हमारे श्रीकृष्ण के बाहुओं को बड़ी थकावट हो गई है ।'' ये श्रीकृष्ण के सखाओं के कुछ व्यवहार हैं। देवप्रस्थ नामक सखा का रूप इस प्रकार है—"वह बड़ा बलवान है, धुरन्धर विद्वान् है, और गेंद खेलने में बड़ा दक्ष है। वह श्वेत वस्त्र धारण किये रहता है और उसके बाल रस्सी से बँधे रहते हैं। जब भी श्रीकृष्ण और असुरों में युद्ध होता है तो देवप्रस्थ सहायता में सबसे आगे होता है। युद्ध में वह हाथी जैसे लड़ता है।" एक गोपी अपनी सखी से बोली, "हे सखि ! जिस समय नन्दनन्दन श्रीकृष्ण पहाड़ी की कन्दरा में विश्राम कर रहे थे तो उन्होंने अपना सिर श्रीदामा की भुजाओं में रख रखा था और अपने बायें हाथ को दामा के वक्ष पर टिका रखा था। इस अवसर का लाभ उठाकर देवप्रस्थ तुरन्त श्रीकृष्ण के लिये अपने तीव्र स्नेह से प्रेरित होकर उनके चरणों को दबाने लगा।'' गौचारण में श्रीकृष्ण के सखाओं की इस प्रकार लीलाएँ होती हैं। श्रीकृष्ण के अधिक अंतरंग मित्रों को प्रियसखा कहते हैं। उनकी वय प्रायः श्रीकृष्ण के समान है। अतिशय अंतरंगता के कारण इनके सम्पूर्ण व्यवहार का एकमात्र आधार शुद्ध सख्य है। विभिन्न प्रकार के सखाओं में वात्सल्य अथवा दास्य का पुट रहता है। परन्तु इन प्रिय सखाओं की क्रियाओं का आधार समस्तर पर शुद्ध सख्यभाव है। इनमें से कुछ प्रियसखा हैं—श्रीदामा, सुदामा, दामा, वसुदामा, किंकिणी, स्तोक कृष्ण, अंशु, भद्रसेन, विलासी, पुण्डरीक, विटंव और कलविंक । नाना लीलाओं में अपनी विविध क्रियाओं से ये सब श्रीकृष्ण को दिव्य आनन्द प्रदान करते हैं। इन प्रिय सखाओं के व्यवहार का वर्णन करते हुए एक सखी राधा- रानी से कहती है, 'हे शोभामयी राधे ! तुम्हारे अंतरंग मित्र श्रीकृष्ण की उनके अंतरंग गोपसखा खूब सेवा करते हैं। उनमें से कुछ मन्द-मन्द स्वर से व्यंग्य करते हैं; इससे श्रीकृष्ण को बड़ी प्रसन्नता होती है।" उदाहरण के लिये श्रीकृष्ण का एक मधुमंगल नामक ब्राह्मण सखा था। यह बालक लोभी ब्राह्मण के समान भूमिका निभाकर व्यंग्य करता। जब भी सखा भोजन करते तो वह और सबसे अधिक खाता। विशेषतः उसे लड्डू बड़े प्रिय थे। सबसे अधिक लड्डू खा लेने पर भी मधुमंगल की तृप्ति नहीं होती और वह श्रीकृष्ण से कहता है, "यदि तुम मुझे एक और लड्डू दे दोगे