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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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२८४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु तो मैं तुमसे प्रसन्न होकर आशीर्वाद दूँगा जिससे सखी राधारानी तुम पर प्रसन्न हो जायगी।" सामान्यतया ब्राह्मण लोग वैश्यों को आशीर्वाद दिया करते हैं। श्रीकृष्ण नन्द महाराज के आत्मज के रूप में अपने को वैश्य मानते थे; अतः ब्राह्मण बालक के लिये उन्हें आशीर्वाद देना उचित ही था। इस प्रकार मित्रोचित परिहास में सखा के आशीर्वाद से श्रीकृष्ण को बड़ी प्रसन्नता होती और वे उसे लड्डू पर लड्डू देते जाते। कभी-कभी कोई प्रियसखा श्रीकृष्ण के सामने पड़ने पर उन्हें अति- शय प्रीति और प्रेमवश गले लगा लेता। दूसरा पीछे से आकर श्रीकृष्ण के नेत्रों को अपने हाथों से ढक लेता। अपने प्रियसखाओं के साथ श्रीकृष्ण को इस प्रकार की लीलाओं में निरन्तर बड़े सुख का अनुभव होता था। इन सब प्रियसखाओं में श्रीदामा प्रमुख है। श्रीदामा पीताम्बर और शृंग धारण किये रहता है। उसकी पगड़ी का ताम्र वर्ण है, शरीर की कान्ति श्यामवर्ण है और गले में सुन्दर माला शोभायमान है। सख्य के परिहास में वह निरन्तर श्रीकृष्ण से होड़ लगाये रहता है। उसी श्रीदामा की कृपा की हमें याचना है। कभी-कभी श्रीदामा श्रीकृष्ण से कहता, "हे निर्दयी ! तुम हम सबको नदी तट पर अकेला छोड़कर न जाने कहाँ चले गये। जानते हो तुम्हें न देखने पर हमें कैसा उन्माद हुआ। बड़े भाग्य से अब दिखाई दिये हो। हाय ! अब आलिंगन के द्वारा हम सबको आनन्दित करो। हे सखे ! विश्वास करो। तुम्हारी एक क्षण की अनुपस्थिति भी बड़ी उत्पात करने वाली है। हमारे लिये ही नहीं, बल्कि गायों के लिये भी। सब कुछ विरूप हो जाता है और हम तुम्हारे लिये पागल हो उठते हैं।" नर्म वयस्य तो प्रियसखाओं से भी अधिक अंतरंग हैं। इनमें सुबल, अर्जुन, गन्धर्व, वसन्त, और उज्ज्वल आदि हैं। इनके सम्बन्ध में एक गोपी ने राधारानी से कहा है, "हे कृष्णांगी ! देखो-देखो, सुबल तुम्हारे सन्देश को श्रीकृष्ण के कान में सुना रहा है। श्यामादासी के गुप्त पत्र को श्रीकृष्ण के हाथ में दे रहा है। फिर पालिका द्वारा भेजे ताम्बूल को श्रीकृष्ण के मुख में खिला रहा है। तारका द्वारा गुम्फित माला से श्रीकृष्ण को सुशोभित करता है। हे सखि ! क्या तुम जानती हो कि श्रीकृष्ण के ये सब प्रिय नर्मसखा निरन्तर इसी प्रकार उनकी सेवा में लगे रहते हैं। नाना प्रिय नर्मवयस्यों में सुबल और उज्ज्वल सर्वप्रधान माने गये हैं।