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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 312, कुल 380 में से

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पृष्ठ 312

सख्यभक्ति रस [ २८५ सुबल के रूप का वर्णन इस प्रकार है—“उसका वर्ण द्रवित स्वर्ण की कान्ति को भी हरने वाला है, वह श्रीकृष्ण को अतिशय प्रिय है। निरन्तर गले में माला धारण किये रहता है और 'पीताम्बरधारी है। उसके नेत्र कमलदल जैसे हैं और वह इतना बुद्धिमान् है कि उसकी वाणी और नीति के द्वारा अन्य सखाओं को परमानन्द की प्राप्ति होती है। हम सब श्रीकृष्ण के उस सुबल सखा की सादर वन्दना करते हैं।” सुबल और श्रीकृष्ण की अंतरंगता को इस बात से समझा जा सकता है कि उनमें होने वाला वार्तालाप इतना गुप्त था कि कोई भी उसे नहीं समझ सका। श्रीकृष्ण के एक अन्य नर्म वयस्य का वर्णन निम्नलिखित है— “उज्ज्वल अरुण आम्बर धारण करता है और उसके नेत्रों की दृष्टि बड़ी चंचल है। उसे नाना प्रकार के पुष्पों से अपने को सजाना प्रिय है। शरीर का रंग प्रायः श्रीकृष्ण जैसा है और गले में मोतियों की माला झलकती रहती है। वह श्रीकृष्ण को सदा प्रिय है। श्रीकृष्ण के ऐसे प्रियनर्म सखा उज्ज्वल की जय हो।” उज्ज्वल की अन्तरंग सेवा के सम्बन्ध में राधारानी अपनी एक सखी से कहती हैं, 'हे सखि ! मेरे लिये अपने मान की रक्षा करना असम्भव सा हो गया। मैं श्रीकृष्ण से अब बिल्कुल भी नहीं बोलना चाहती; परन्तु यह देखो वह उनका सखा उज्ज्वल दूत-कर्म के लिये मेरे पास आ रहा है। उसकी नर्मोक्तियाँ इतनी प्रबल होती हैं कि किसी भी गोपी के लिये उनके सामने अपने कृष्णप्रेम को रोक पाना असम्भव हो जाता है; चाहे वह अत्यन्त लज्जावती परिवार में निष्ठ और पतिव्रता ही क्यों न हो।” उज्ज्वल के हर्षमय स्वभाव के सम्बन्ध में उसका यह वाक्य है—‘हे' कृष्ण ! हे अघारि ! तुमने अपने प्रेमव्यापार का इतना अधिक विस्तार कर लिया है कि अब तुम्हें अपार सागर की उपमा दी जा सकती है। संसार की सारी युवतियाँ, जो निरन्तर सच्चे प्रेमी को खोजा करती हैं, उन नदियों के समान हैं जो इस सागर की ओर दौड़ रही हैं। इस अवस्था में ये सब युवतीरूप नदियाँ यदि किसी ओर मुड़ने का प्रयास भी करें तो भी अन्त में तुम तक ही पहुँचेंगी।” श्रीकृष्ण के सखाओं के नाना समूहों में कुछ शास्त्रों में और कुछ लोक में प्रसिद्ध हैं। वे नित्यप्रिय, सुरचर तथा साधक—ऐसे तीन प्रकार के कहे गये हैं। इनमें से कुछ, जो स्वभाव से ही श्रीकृष्ण की सेवा में स्थिर-