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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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अध्याय ४२ सख्यरस में प्रेम के व्यवहार श्रीकृष्ण की आयु, उनका सौन्दर्य, विगुल, वंशी, शंख और उनका मधुर अंगन्यास तथा अभिवृत्ति—ये सब सख्य भक्तिरस में उद्दीपन का काम करते हैं। उनका असाधारण विनोद, भी, पराक्रम, जो कभी-कभी राज- कुमार अथवा भगवान् के रूप में उनके अभिनय में प्रकट होता है, भक्तों में उनके लिये सख्यरस को जगाता है । विद्वानों ने श्रीकृष्ण की आयु के तीन भाग किये हैं—एक से पाँच वर्ष तक की अवस्था कौमार कहलाती है, छठे से दसवें वर्ष तक पौगण्ड अवस्था रहती है और ग्यारहवें से पन्द्रहवें वर्ष की अवस्था को कैशोर कहते हैं। गोचारण की लीला के दिनों में श्रीकृष्ण की आयु कौमार और पौगण्ड में रहती है। कैशोर अवस्था में वे गोकुल में रहते हैं और सोलहवें वर्ष में प्रवेश करते-करते कंस को मारने मथुरा चले जाते हैं । कौमार अवस्था बालकृष्ण और मैय्या यशोदा में होने वाले प्रेम- विनिमय के उपयुक्त है। श्रीमद्भागवत (१०.१३.११) में शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित से कहते हैं, "हे राजन् ! भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण यज्ञों के परम भोक्ता हैं। फिर भी वे अपने गोपसखाओं के साथ भोजन किया करते । उस समय उन्होंने साधारण बाल का रूप धारण कर रखा था । पेट और परिधान के बीच में वंशी को धारण किए हुए, शृंग और बेंत को बगल में दबाये हुए, दही-भात से सने बायें हाथ में उठाये हुए और फल खाते हुए जब वे सखाओं के बीच बैठते तो ऐसा प्रतीत होता मानो कमलदल के बीच कमल की कर्णिका शोभायमान हो। उन्हें इस प्रकार के हास-परिहास का आनन्द लेते देखकर स्वर्ग के देवता आश्चर्य से चकित होकर आंवाक् रह जाते । श्रीकृष्ण की पौगण्ड आयु के आद्य, मध्य तथा शेष—ये तीन भेद हैं। पौगण्ड अवस्था का प्रवेश होने पर अधरों में लालिमा का आधित्य, उदर में कृशयता और गर्दन में शंख के समान चिह्न आदि प्रकट होते