भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८८] भक्तिरसामृतसिन्धु हैं। उस समय बाहर से वृन्दावन को लौटने वाले कृष्ण को देखकर कह उठतें, “हे मुकुन्द ! तुम्हारा सौन्दर्य शनैः शनैः बढ़ रहा है, ठीक अश्व के किसलय के समान। हे कमलनयन ! तुम्हारा कंठ शंख के समान स्फुटित तीन रेखाओं से युक्त हो गया है। चन्द्रिका के प्रकाश में तुम्हारी दन्तावलि और कपोलराशि पद्मराग मणि से स्पर्धा कर रही हैं। इस प्रकार तुम्हारी यह वर्तमान अपूर्व शोभा तुम्हारे सुहृदों के आनन्द का विधान कर रही है।" इस वय में श्रीकृष्ण भाँति-भाँति के पुष्पों की मालाओं से सुशोभित रहते थे। वे रंग-बिरंगे वस्त्र और पीत दुपट्टा धारण करते। इस प्रकार के वस्त्राभूषण श्रीकृष्ण के अलंकार माने जाते हैं। दिन में गोचारण के लिये जाते हुए श्रीकृष्ण इसी प्रकार का परिधान धारण करते । कभी वे वहाँ अपने सुहृद मित्रों के साथ कुश्ती करते और कभी सब मिल कर केलि नृत्य करने लगते। ये पौगण्ड अवस्था की कुछ विशिष्ट क्रियाएँ हैं। श्रीकृष्ण के गोप-बालकों के लिये उनका संग बड़ा ही आनन्ददायक था। अपने दिव्य भाव को उन्होंने इन शब्दों में व्यक्त किया है-“हे कृष्ण ! तुम निरन्तर शोभायुक्त वृन्दावन में सर्वत्र विचरती हुई गायों को चराया करते हो। सुन्दर माला, नन्हा शंख, पगड़ी पर मोर मुकुट, कानों में लगे कर्णिकार के फूल, वक्षःस्थल पर विराजती हुई मल्लिका की माला-ये सब तुम्हारे सौन्दर्य का वर्धन कर रहे हैं। इस सुन्दर स्वरूप में जब तुम हमसे लड़ने का अभिनय करते हो तो हमें असीम, अतुल आनन्द की अनुभूति होती है।" श्रीकृष्ण के मध्य पौगण्ड में प्रवेश करने पर उनकी नाक नुकीला, गाल गोल-गोल और दीप्त हो जाते हैं। पार्श्व अंग में त्रिवलि का उदय होता है। ऐसी अवस्था में गोपबालकों को श्रीकृष्ण के संग का बड़ा गर्व हुआ । उस समय श्रीकृष्ण की नाक तिल कुसुम का उपहास कर रही थी; कपोलों की दीप्ति मणियों की ज्योति को हर रही थी और दोनों पार्श्व अंग विशिष्ट सौन्दर्य को प्राप्त हो रहे थे। इस अवस्था में श्रीकृष्ण विद्युत् की सी कान्ति वाला पीत रेशमी वस्त्र धारण करते हैं। उनके सिर पर रेशमी वस्त्र की पगड़ी सुशोभित रहती है और हाथ में वे सोने की मूठ वाली यष्टि धारण किये रहते हैं। इस काल की विशिष्ट लीलाओं का परिवेषण भाण्डीरवन में होता है। यह भाण्डीरवन अन्य ग्यारह वनों के साथ आज भी वृन्दावन धाम में है और सम्पूर्ण वृन्दावन की परिक्रमा करने