भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
२८८] भक्तिरसामृतसिन्धु हैं। उस समय बाहर से वृन्दावन को लौटने वाले कृष्ण को देखकर कह उठतें, “हे मुकुन्द ! तुम्हारा सौन्दर्य शनैः शनैः बढ़ रहा है, ठीक अश्व के किसलय के समान। हे कमलनयन ! तुम्हारा कंठ शंख के समान स्फुटित तीन रेखाओं से युक्त हो गया है। चन्द्रिका के प्रकाश में तुम्हारी दन्तावलि और कपोलराशि पद्मराग मणि से स्पर्धा कर रही हैं। इस प्रकार तुम्हारी यह वर्तमान अपूर्व शोभा तुम्हारे सुहृदों के आनन्द का विधान कर रही है।" इस वय में श्रीकृष्ण भाँति-भाँति के पुष्पों की मालाओं से सुशोभित रहते थे। वे रंग-बिरंगे वस्त्र और पीत दुपट्टा धारण करते। इस प्रकार के वस्त्राभूषण श्रीकृष्ण के अलंकार माने जाते हैं। दिन में गोचारण के लिये जाते हुए श्रीकृष्ण इसी प्रकार का परिधान धारण करते । कभी वे वहाँ अपने सुहृद मित्रों के साथ कुश्ती करते और कभी सब मिल कर केलि नृत्य करने लगते। ये पौगण्ड अवस्था की कुछ विशिष्ट क्रियाएँ हैं। श्रीकृष्ण के गोप-बालकों के लिये उनका संग बड़ा ही आनन्ददायक था। अपने दिव्य भाव को उन्होंने इन शब्दों में व्यक्त किया है-“हे कृष्ण ! तुम निरन्तर शोभायुक्त वृन्दावन में सर्वत्र विचरती हुई गायों को चराया करते हो। सुन्दर माला, नन्हा शंख, पगड़ी पर मोर मुकुट, कानों में लगे कर्णिकार के फूल, वक्षःस्थल पर विराजती हुई मल्लिका की माला-ये सब तुम्हारे सौन्दर्य का वर्धन कर रहे हैं। इस सुन्दर स्वरूप में जब तुम हमसे लड़ने का अभिनय करते हो तो हमें असीम, अतुल आनन्द की अनुभूति होती है।" श्रीकृष्ण के मध्य पौगण्ड में प्रवेश करने पर उनकी नाक नुकीला, गाल गोल-गोल और दीप्त हो जाते हैं। पार्श्व अंग में त्रिवलि का उदय होता है। ऐसी अवस्था में गोपबालकों को श्रीकृष्ण के संग का बड़ा गर्व हुआ । उस समय श्रीकृष्ण की नाक तिल कुसुम का उपहास कर रही थी; कपोलों की दीप्ति मणियों की ज्योति को हर रही थी और दोनों पार्श्व अंग विशिष्ट सौन्दर्य को प्राप्त हो रहे थे। इस अवस्था में श्रीकृष्ण विद्युत् की सी कान्ति वाला पीत रेशमी वस्त्र धारण करते हैं। उनके सिर पर रेशमी वस्त्र की पगड़ी सुशोभित रहती है और हाथ में वे सोने की मूठ वाली यष्टि धारण किये रहते हैं। इस काल की विशिष्ट लीलाओं का परिवेषण भाण्डीरवन में होता है। यह भाण्डीरवन अन्य ग्यारह वनों के साथ आज भी वृन्दावन धाम में है और सम्पूर्ण वृन्दावन की परिक्रमा करने
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वाले भक्तजन आज भी इन वनों की शोभा का आस्वादन कर सकते हैं। श्रीकृष्ण के अप्रतिम सुन्दर रूप को देखकर एक भक्त अपने सखा से कहने लगा, “हे मित्र ! तनिक श्रीकृष्ण की ओर तो देखो। आज वे दोनों ओर सोने से मढ़ी हाथ की लाठी धारण किये हुए हैं और चमकते सुनहरी रेशमी वस्त्र की पगड़ी पहने हुए उनकी वेशभूषा सखाओं को परम आह्लादित कर रही है।” पौगण्ड की शेष अवस्था में श्रीकृष्ण की केशराशि कभी नितम्बों तक लटकने लगती है और कभी इधर-उधर बिखर जाती है। इस अवस्था में उनके दोनों कंधे ऊँचे और चौड़े होते हैं और मुखमण्डल निरन्तर तिलक के चिह्न से सुशोभित रहता है। उनके कंधों पर बिखरे बालों को देखकर लगता है मानो श्रीदेवी उनका आलिंगन कर रही है। इस आलिंगन का इनके सखा खूब आनन्द लेते हैं। सुबल ने एक बार उनसे कहा था, “हे केशव ! तुम्हारी गोल-गोल पगड़ी, हाथ में पकड़ा हुआ कमल, ललाट पर तिलक की सीधी रेखा, कुंकुम मिश्रित सुगन्ध और सुन्दर वेष मुझे भी परास्त देने वाला है, यद्यपि मैं तुम और तुम्हारे सखाओं से पराक्रमी हूँ। फिर स्वभाव से ही सरल-मृदु गोपांगनाओं की क्या दशा होगी ?” इस अवस्था में श्रीकृष्ण अपने सखाओं के कानों में धीरे-धीरे बोलने में आनन्द लेते हैं और उनकी वार्ता का विषय होता है—गोपियों का सौन्दर्य, जो सामने खड़े-खड़े उन्हें निहारा करती हैं। सुबल ने एक बार श्रीकृष्ण से कहा, “अरे धूर्त ! तू बड़ा चतुर है। तू दूसरों के मन की जान लेता है, इसलिए मैं तेरे कान में कहता हूँ कि सब गोपियों में ये जो पाँच सबसे अधिक सुन्दर हैं, ये तेरी वेश-भूषा पर मोहित हो गई हैं। लगता है कन्दर्प ने उन्हें तुझे परास्त करने में नियुक्त किया है।' भाव यह है कि यद्यपि श्रीकृष्ण त्रिभुवनविजयी हैं, पर गोपियों का सौन्दर्य श्रीकृष्ण को जीत सकता है। कैशोर वय के लक्षणों का वर्णन पहले हो चुका है। यही वह अवस्था है जब भक्त श्रीकृष्ण का सबसे अधिक आस्वादन कर सकते हैं। श्रीकृष्ण की राधारानी के साथ किशोर-किशोरी के रूप में आराधना की जाती है। श्रीकृष्ण की वय इस कैशोर से आगे नहीं बढ़ती। ब्रह्मसंहिता' में प्रमाण हैं कि यद्यपि वे पुराणपुरुष हैं और अनन्त रूपधारी हैं फिर भी उनका मूल रूप नित्य यौवन है। जब भी हम कुरुक्षेत्र के युद्ध में श्रीकृष्ण का कोई चित्र देखते हैं तो उन्हें किशोर ही पाते हैं, यद्यपि उस समय तक उनके
२६० ] भक्तिरसामृतसिन्धु बहुत से पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र तक हो चुके थे। गोप-सखाओं ने एक बार श्रीकृष्ण से कहा, "हे कृष्ण तुम्हें इन अलंकारों से क्या प्रयोजन ? तुम्हारा दिव्य रूप इतना मनोहर है कि तुम्हें इनकी कोई आवश्यकता नहीं।" इस अवस्था में जब भी श्रीकृष्ण प्रातःकाल अपनी वंशी को बजाते हैं तो उनके सारे सखा तुरन्त शैय्या को त्याग कर उनके साथ गोचारण को जाने के लिये प्रस्तुत हो जाते हैं। श्रीकृष्ण के एक सखा ने कहा, "हे गोप बालकों ! गोवर्धन पर्वत के ऊपर से आ रही श्रीकृष्ण की वंशीध्वनि बता रही है कि अब हमें उन्हें खोजने के लिये यमुना तट पर नहीं जाना पड़ेगा।" पार्वती ने अपने पति भगवान् शिव से कहा, "हे पंचमुख ! तनिक पाण्डवों की ओर देखिये । श्रीकृष्ण के पांचजन्य नामक शंख की ध्वनि को सुनकर वे अपने बल को फिर से प्राप्त हो गये हैं और अब सिंह के समान गर्जन कर रहे हैं।" इस अवस्था में एक बार श्रीकृष्ण ने ठीक राधारानी सा वेष बनाया। उनका प्रयोजन अपने मित्रों में हास-परिहास का संचार करना था। उन्होंने सोने के कुण्डल धारण कर लिये और अपने काले रंग को ढकने के लिये राधारानी के वर्ण के समान कुंकुम का आलेप कर लिया। उनकी इस वेष-भूषा को देखकर सुबल मित्र को बड़ा आश्चर्य हुआ। श्रीकृष्ण कभी-कभी खेल-खेल में अपने अंतरंग सखाओं के साथ लड़ते अथवा भुजाओं से कुश्ती करते। कभी गेंद खेलते तो कभी द्यूत। कभी वे एक दूसरे को अपने कंधे पर उठाते और कभी कूदने में अपनी कुशलता दिखाते गोपबालक भी पलने के आसन वाले झूले पर साथ-साथ बैठकर तथा नाना प्रकार के परिहास और जलाशयों में एक साथ विहार करके श्रीकृष्ण को प्रसन्न करते थे। ये सब क्रियाएँ अनुभव कहलाती हैं। सब सखा श्रीकृष्ण के संग में इकट्ठे होते तो वे तुरन्त इन सब कार्यों, विशेषतया नाचने में प्रवृत्त हो जाते। उनकी कुश्ती के सम्बन्ध में एक मित्र श्रीकृष्ण से कहता है, "सखा ! हे अघारी ! तुम बड़े अभिमान के साथ आज मित्रों में घूम-घूमकर अपनी भुजाओं के बल का प्रदर्शन कर रहे हो इसका कारण कहीं यह तो नहीं कि तुम मुझसे ईर्ष्यालु हो। मैं यह भली प्रकार से जानता हूँ कि तुम कुश्ती में मुझे हरा नहीं सकते। मुझे हरा न सकने की निराशा में मैंने तुम्हें बहुत देर तक अकेले बैठे देखा है।" श्रीकृष्ण के सारे सखा बड़े ही साहसी थे। किसी भी कठिनाई से नहीं डरते थे। उन्हें पूरा विश्वास था कि श्रीकृष्ण सब उद्यमों में
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उन्हें विजयी बनायेंगे। वे आपस में बैठकर कर्तव्य-अकर्तव्य का विचार करते, एक दूसरे को हितकार्य में प्रवृत्त करते । कभी-कभी वे एक-दूसरे के मुख में पान खिलाते अथवा एक-दूसरे के शरीरों में चन्दन का आलेप करते । कभी-कभी हास-परिहास के लिये वे विचित्र रूपों में अपने मुखों को सजाते । श्रीकृष्ण के सखाओं का एक अन्य कार्य स्पर्धापूर्वक श्रीकृष्ण को हराना था। वे उनके वस्त्रों को खींच लेते, तो कभी उनके हाथ में पकड़े हुए पुष्पों को । कभी-कभी वे एक-दूसरे को अपने शरीर की सज्जा में प्रवृत्त करते और ऐसा न करने पर हाथापाई का प्रसंग भी उठ आता । श्रीकृष्ण और उनके सखाओं के ये सामान्य कार्य हैं। श्रीकृष्ण के सखाओं का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य गोपियों के पास श्रीकृष्ण का और श्रीकृष्ण के पास गोपियों का दूत बनकर जाना है। वे गोपियों से श्रीकृष्ण का परिचय कराते और फिर श्रीकृष्ण के लिये दूत का कार्य करते । जब गोपियों और श्रीकृष्ण में प्रणयकलह हो जाती तो श्रीकृष्ण की उपस्थिति में तो ये सखा श्रीकृष्ण का ही पक्ष लेते, परन्तु जब श्रीकृष्ण वहाँ नहीं होते तो गोपियों का साथ देते। इस प्रकार कभी एक का पक्ष लेते हुए और कभी दूसरे का पक्ष लेते हुए वे बड़ी चातुरी के साथ कानाफूसी करते । श्रीकृष्ण के सेवक समय-समय पर उनके लिये फूल चुनते, उनके शरीर को अलंकारों से सजाते-सँवारते, उनके आगे नाचते-गाते, उन्हें गोचारण में सहायता देते, उनके शरीर की मालिश करते, उनके लिये सुन्दर-सुन्दर पुष्पों के हार बनाते और कभी-कभी उन्हें हवा करते । ये सब श्रीकृष्ण के सेवकों के प्रधान कर्तव्य हैं। श्रीकृष्ण के सखा और सेवक दोनों मिलकर सेवा करते और उनकी इन सब क्रियाओं का नाम अनुभाव है । जब श्रीकृष्ण कालिय नाग का अनुशासन करके यमुना से निकले तो श्रीदामा सबसे पहले उनका आलिंगन करने के लिये दौड़ा; परन्तु वह चाहते हुए भी अपने स्तम्भित हाथों को ऊपर न उठा सका । जब श्रीकृष्ण अपनी वंशी बजाते तो उससे निकली ध्वनि स्वाति नक्षत्र में आकाश में होने वाली मेघों की गर्जना जैसी लगती । वैदिक ज्योति शास्त्र के अनुसार यदि स्वाति नक्षत्र की वर्षा सागर पर गिरे तो वह मोती को जन्म देती है और यदि सर्प पर गिरे तो रत्नों की उत्पत्ति होती है । इसी प्रकार जब स्वाति नक्षत्र के मेघगर्जन के समान श्रीकृष्ण की वेणु गरजी तो श्रीदामा के शरीर पर उत्पन्न स्वेदकण मुक्ताहल की सी शोभा पाने लगे ।
२६२] भक्तिरसामृतसिन्धु श्रीकृष्ण और श्रीदामा को परस्पर आलिंगन करते देखकर श्रीमती राधारानी तनिक ईर्ष्या से भर गईं और अपने क्रोध को छिपाकर बोलीं, "हे सुबल ! तुम बड़े भाग्यवान् हो, जो पूज्यों की उपस्थिति में भी तुम्हें और श्रीकृष्ण को परस्पर आलिंगन करने में जरा संकोच नहीं हुआ । अवश्य ही तुमने पूर्वजन्म में महान् तप-त्याग किया होगा।" श्रीमती राधारानी प्रायः श्रीकृष्ण का आलिंगन किया करती थीं। परन्तु पूज्यों की उपस्थिति में उनके लिये ऐसा करना सम्भव न था; जबकि सुबल ऐसा खुले रूप से कर सका । अतएव राधारानी ने उसके सौभाग्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की । जिस समय श्रीकृष्ण ने कालिय दह में प्रवेश किया तो उनके अंतरंग सखा इतने उद्विग्न हो उठे कि उनके शरीर का रंग उड़ गया और वे भयंकर धड़धड़ ध्वनि करने लगे । ऐसी अवस्था में वे तुरन्त अचेतन होकर भूमि पर गिर पड़े । इसी प्रकार जब वन में अग्नि लगी तो श्रीकृष्ण के सभी सखाओं ने अपने गोधन की चिन्ता किये बिना चारों ओर से उन्हें घेर लिया और अग्नि की ज्वाला से उनकी रक्षा करने लगे। सखाओं के इस व्यवहार को मनीषि जनों ने व्यभिचारी कहा है। व्यभिचारिभाव में कभी-कभी मद, दक्षता, भय, आलस्य, हर्ष, गर्व, श्रम, धृति, व्याधि, विस्मृति और दैन्य आदि भाव होते हैं। ये सब श्रीकृष्ण के व्यभिचारिभाव के सामान्य लक्षण हैं । जब श्रीकृष्ण और उनके सखाओं में सम्भ्रम के भाव से सर्वथा रहित रति होती है जिसमें वे एक-दूसरे को समान समझते हैं तो ऐसे सख्य भाव को स्थायी कहते हैं। श्रीकृष्ण से ऐसी घनिष्ठ सख्यरति में प्रेम के प्रणय, प्रेम, स्नेह तथा राग आदि लक्षण प्रकट रहते हैं । स्थायी का उदाहरण अक्रूर से कहे अर्जुन (ये अर्जुन भगवद्गीता के अर्जुन से भिन्न हैं) के वाक्य से प्रकट होता है—"हे गान्दिनीनन्दन ! कृपया श्रीकृष्ण से पूछियेगा कि मैं अपनी भुजाओं में उनका आलिंगन कब कर सकूँगा ?" जब श्रीकृष्ण की श्रेष्ठता का पूर्ण ज्ञान हो, परन्तु फिर भी उनसे सख्यरस के व्यवहार में सम्भ्रम की गन्ध का भी अभाव हो तो उस अवस्था को प्रणय कहते हैं। इस प्रणय का एक उज्ज्वल उदाहरण है—जब शिव आदि देवता भगवान् के कीर्तिमय ऐश्वर्यों को बखानते हुए सादर प्रणाम कर रहे थे तो श्रीकृष्ण के सामने उनके कन्धे पर हाथ रख कर खड़ा अर्जुन उनके मोरपंख से धूलि झाड़ने लगा ।
सख्यरस में प्रेम के व्यवहार [ २६३ जिस समय दुर्योधन द्वारा राज्य से निर्वासित होकर पाण्डव वन में अज्ञातवास कर रहे थे उस समय कोई भी उनके निवास को नहीं जान सका। ऐसे समय में देवर्षि नारद भगवान् श्रीकृष्ण से मिलने आए और कहने लगे, "हे मुकुन्द ! आप परम पुरुष स्वयं भगवान् हैं। परन्तु फिर भी आपकी मित्रता के कारण पाण्डव को विश्व के साम्राज्य के अपने उचित अधिकार से वंचित होना पड़ा है और अब वे वन में अज्ञात वास कर रहे हैं। यहाँ तक कि उन्हें दूसरों के यहाँ दास्य कर्म तक करना पड़ा है। ये सब लक्षण लौकिक दृष्टि से बड़े अमंगलमय प्रतीत होते हैं। परन्तु प्रसन्नता का विषय है कि इन सब दुःखों के होते हुए भी उनमें आपके प्रति जो विश्वास और प्रेम था उसमें कोई अन्तर नहीं आया है। वास्तव में तो वे निरन्तर आपके सख्यरूप अमृत में निमग्न हुए आपके नामों का ही कीर्तन किया करते हैं।" श्रीकृष्ण के लिये स्नेह के आधिक्य का उदाहरण श्रीमद्भागवत (१०.१५.१८) में है। गोचारण भूमि में विचरते श्रीकृष्ण को तनिक श्रान्ति अनुभव हुई और वे विश्राम चाहने लगे । अतएव भूमि पर लेट गये । उस समय बहुत से गोप-बालक वहाँ एकत्रित हो गये और बड़े स्नेह से गीत गाने लगे, जिससे श्रीकृष्ण भली प्रकार से विश्राम कर सकें । कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में कृष्ण और अर्जुन के सख्य का उदाहरण तो प्रसिद्ध है ही। युद्ध के बीच द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने अनुचित रूप से श्रीकृष्ण पर आक्रमण किया। उस समय के प्रचलित युद्धनियमों के अनुसार शत्रु को अपने शत्रु के सारथि पर कभी आक्रमण नहीं करना चाहिए। अश्वत्थामा ने नाना प्रकार से पाप का आचरण करते हुए श्रीकृष्ण के विग्रह पर भी आक्रमण करने में संकोच नहीं किया, यद्यपि श्रीकृष्ण अर्जुन का सारथ्य कर रहे थे । जब अर्जुन ने देखा कि अश्वत्थामा श्रीकृष्ण को मारने के लिये नाना प्रकार के बाण चला रहा है तो वह उन्हें रोकने के लिये एकदम श्रीकृष्ण के आगे आकर खड़ा हो गया । उस समय बाणों की चोट लगने पर भी अर्जुन को श्रीकृष्ण के लिये दिव्य प्रेम का अनुभव हो रहा था; बाणों की मार उसे फूलों की बरसात लग रही थी । सख्यभक्तिरस में श्रीकृष्ण के लिये प्रेमभाव का एक अन्य उदाहरण इस प्रकार है। वृषभ नामक गोपबालक वन में श्रीकृष्ण की माला के लिये पुष्प चुन रहा था । तभी मध्याह्न काल हो आया और सूर्य
२६४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु ज्योति बड़ी प्रचण्ड हो उठी। परन्तु फिर भी वृषभ को वह चन्द्रिका के समान शीतल प्रतीत हो रही थी। वास्तव में भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा करने की यही विधि है। जब भी भक्तों को कष्ट होता है तो पाण्डवों के समान जैसा ऊपर वर्णन किया गया है, वे समझते हैं कि यह दुःख भगवान् की सेवा के लिये महान् अवसर है। श्रीकृष्ण से अर्जुन के सख्य का वर्णन करते हुए नारदजी ने श्रीकृष्ण को स्मरण कराया, "बाण-विद्या को सीखने में लगा अर्जुन बहुत दिनों से आपको देख नहीं पाया था। परन्तु जैसे ही आप वहाँ पहुँचे, उसने अपने सम्पूर्ण कार्य रोक दिये और तुरन्त आपका आलिंगन किया।" तात्पर्य यह है कि युद्धविद्या सीखने में तत्पर होने पर भी अर्जुन श्रीकृष्ण को क्षणभर के लिये भी नहीं भूला और जैसे ही उसे श्रीकृष्ण को देखने का अवसर मिला, अर्जुन ने तत्क्षण उनका आलिंगन किया। श्रीकृष्ण के एक पत्री नामक सेवक ने उनका एक बार सम्बोधन करते हुए कहा, "हे नाथ ! आपने गोपबालकों की अघासुर की भूख से, कालिय के विष से और भयंकर वन-अग्नि से रक्षा की है; परन्तु मैं आपकी विरह-अग्नि से पीड़ित हूँ, जो अघासुर की भूख, कालिय के विष, और वन की अग्नि से भी अधिक है। ऐसे में इस विरह अग्नि से आप मेरी रक्षा क्यों नहीं करते?" एक अन्य मित्र श्रीकृष्ण से कहने लगा, "हे कंसारि ! जब से हमें छोड़ गये हो तब से विरह की ज्वाला असाधारण हो उठी है। यह विरह व्यथा अधिक तीव्र हो उठती है जब हम यह जानते हैं कि भाण्डीर वन में आप भानु तनया राधारानी रूपी शीतल नदी की लहरों में श्रम खो रहे हैं।" कोई मित्र श्रीकृष्ण से कहता है, 'हे कृष्ण ! हे अघारी ! राजा कंस को मारने के लिये तुम्हारे मथुरा चले जाने पर सब गोपबालकों के शरीरों में पाँच में से चार भूत अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि और आकाश कृशता को प्राप्त हो गये और पाँचवा, अर्थात् वायु भी उनकी श्वासमार्ग में बड़ी तीव्रता से चलने लगा।" कंस के वध के लिये श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने पर सब के सब गोप बालक विरह से ऐसे व्यथित हुए कि मृतप्रायः हो गए। जब कोई मर जाता है तो कहा जाता है कि उसने पंचमहाभूतों को छोड़ दिया है क्योंकि मृत देह पुनः इन पंचमहाभूतों में मिलकर विलीन हो जाती है। इस सन्दर्भ में पृथ्वी, जल, अग्नि और आकाश, ये चार तत्त्व तो बिल्कुल चले ही जा चुके थे; पाँचवा वायु तब भी बड़ा प्रधान था और बड़ी ही तीव्र गति से उनके श्वास मार्ग में चल रहा था। भाव यह है कि
जब श्रीकृष्ण वृन्दावन को छोड़ गए, तब गोपबालकों को इस बात की बड़ी चिन्ता हुई कि कंस से उनके युद्ध में क्या परिणाम होगा । एक अन्य मित्र श्रीकृष्ण से कहने लगा, "हे सखे ! एक मित्र को तुम्हारे विरह ने ऐसा सताया कि उसके नेत्र रूपी कमल अश्रुधारा से अभिपूरित हो गये। अतएव निद्रारूपी काले भ्रमरों ने उसके नेत्रों में प्रवेश नहीं किया और उस स्थान को छोड़कर चले गये।" भ्रमर प्रायः मधु- संचय के लिये कमल पर मँडराया करते हैं। श्रीकृष्ण के सखा के नेत्रों को कमल की उपमा दी गई है और क्योंकि वे अश्रुधारा से पूर्ण थे, इसलिये निद्रारूपी भ्रमर उसके नेत्ररूपी कमलों से मधु का संचय नहीं कर सके और वहाँ से चले गये । भाव यह है कि विरह से अत्यधिक अभिभूत होने के कारण उसके नेत्र भर आये और वह सो न सका । यह श्रीकृष्ण के विरह में निद्रानाश का उदाहरण है। आलम्बनशून्यता का उदाहरण इस प्रकार है—"श्रीकृष्ण के वृन्दावन से मथुरा चले जाने पर श्रीकृष्ण के प्रियतम ग्वाल सखाओं के चित्त एकदम हलका हो गये और रूई के समान हवा में इधर-उधर निरा- श्रित होकर चक्कर खाने लगे।" भाव यह है कि श्रीकृष्ण के विरहवश गोपबालकों के मन बिल्कुल सारहीन हो गये । अधृति का भी एक उदा- हरण गोपबालकों में तब प्रकट हुआ जब श्रीकृष्ण मथुरा को गये थे। विरह की व्यथा में ये सब बालक अपने गोधन का ध्यान करना भूल गये और उन मधुर गीतों को भुलाने का प्रयास करने लगे जो वे गोचारण करते समय गाया करते थे। श्रीकृष्ण के विरह में उनमें जीने की भी कोई इच्छा शेष न रही । श्रीकृष्ण के विरह में होने वालीं जड़ता का वर्णन करते हुए एक सखा उनसे बोला कि उनके विरह में गोपबालक पर्वत-शिखरों पर खड़े पत्तों से रहित वृक्ष जैसे हो गये हैं। पत्तों अर्थात् वेशभूषा से रहित होने के कारण वे अत्यन्त कृश और रूखे लगते हैं। उनमें फल-फूलों अर्थात् कान्ति का भी सर्वथा अभाव हो गया है। इस प्रकार सब के सब गोपबालक पर्वत के शिखरों पर खड़े वृक्षों के समान स्तम्भित लग रहे थे। कभी-कभी उन्हें श्रीकृष्ण के विरह में व्याधि का अनुभव होता और इस प्रकार तीव्र विरहज्वर से शिथिलप्रायः होकर वे यमुना तट पर इधर-उधर टहलने -गते । श्रीकृष्णविरह में होने वाले उन्माद के भी अनेक उदाहरण हैं। जब श्रीकृष्ण वृन्दावन से चले गये तो सारे गोपबालकों को उन्माद हो
२६६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु आया और वे सब प्रकार के जगत्-व्यवहार को भूल बैठे। इस पागलपन में उन्हें अपने दैनिक कर्तव्यों की भी सुध न रही। वे कभी भूमि पर सो जाते, कभी धूलि में लौटने लगते, कभी हँसने और कभी दौड़ने लग जाते। ये सब लक्षण उन्हें पागल सिद्ध कर रहे थे। श्रीकृष्ण के एक सखा ने उनकी निन्दा करते हुए कहा, "हे नाथ ! कंस को मार कर अब आप मथुरा के नरेश बन गये हैं। यह बड़ा मंगलमय समाचार है। परन्तु वृन्दावन का भी कुछ विचार करें। वहाँ के सारे निवासी आपके विरह में निरन्तर रोने के कारण अन्धे हो चले हैं। वे व्याकुलता से पूर्ण हैं और उन्हें आपके मथुरा नरेश बन जाने पर तनिक भी हर्ष नहीं है।" कभी-कभी श्रीकृष्ण के विरह में मृत्यु के लक्षण भी होते हैं। एक बार श्रीकृष्ण से कहा गया, "हे कंसारि श्रीकृष्ण ! तुम्हारे विरह की पीड़ा में गोप-बालक बहुत अधिक कष्ट पा रहे हैं और अब पर्वत की घाटियों में मन्द-मन्द श्वास लेते हुए पड़े हैं। उनकी दयनीय अवस्था से सहानुभूति दिखाते हुए वन के मृग तक आँसू बहा रहे हैं।" स्कन्दपुराण के मथुराखण्ड में गोपबालकों के साथ निरन्तर गोधन की देखभाल करते हुए कृष्ण-बलराम का वर्णन है। जब श्रीकृष्ण द्रुपद नगर में कुम्भकार के घर में अर्जुन से मिले तो अपने शारीरिक रूप की समानता के कारण उनमें अंतरंग घनिष्टता हो गई। यह योग में सिद्धि, अर्थात् समान देहों के आकर्षण से होने वाली मित्रता का उदाहरण है। श्रीमद्भागवत (१०.७१.२७) में उल्लेख है कि जब श्रीकृष्ण इन्द्रप्रस्थ नगरी में पधारे तो प्रेम और आनन्द से विह्वल हुए भीमने अश्रुपूरित नेत्रों से और हँसते हुए मुख से अपने ममेरे भाई का तुरन्त आलिंगन कर लिया। उनके पीछे-पीछे अर्जुन के साथ नकुल, सहदेव भी खड़े थे और वे भी श्रीकृष्ण का दर्शन पाकर ऐसे अभिभूत हो गये कि श्रीअच्युत का आलिंगन करके पूर्ण सन्तोष प्राप्त किया। वृन्दावन के गोपबालकों के सम्बन्ध में ऐसा ही कथन है। जिस समय श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में विराज रहे थे; उस समय सारे गोपबालक नाना प्रकार के कर्ण-कुण्डल पहनकर उनके पास उन्हें देखने आये। अपने पुराने मित्र को देखकर रोमांचित भुजाओं से उन्होंने श्रीकृष्ण का अलिंगन किया। ये सब श्रीकृष्ण के सख्य में होने वाले पूर्ण सन्तोष के उदाहरण हैं। श्रीमद्भागवत (१०.१२.१२) में कथन है कि महान् ध्यानयोगियों के लिये कठोर तप-त्याग और योग का अभ्यास करने पर भी जिनके चरण- कमलों की रज दुर्लभ है, वही श्रीभगवान् वृन्दावनवासियों के लिये सुगमता
'सख्यरस में प्रेम के व्यवहार [ २६७ से दृष्टिगोचर हैं। भाव यह है कि इन भक्तों के महाभाग्य की कोई तुलना नहीं है। गोपवालों का श्रीकृष्ण से जो सख्य सम्बन्ध है वह विशिष्ट प्रकार की दिव्य भावानुभूति है और प्रायः माधुर्य प्रेमभाव जैसा है। गोपबालकों और श्रीकृष्ण में होने वाले प्रेम व्यवहार का वर्णन बहुत कठिन है। श्रील रूप गोस्वामी जैसे विरक्त भक्तों ने श्रीकृष्ण और उनके गोपबाल सखाओं के अनिर्वचनीय भावों पर विस्मय व्यक्त किया है। श्रीकृष्ण और उनके अन्तरंग सखाओं द्वारा परस्पर आस्वादित यह विशेष प्रकार का प्रेमभाव आगे वात्सल्यप्रेम में विकसित होता है और उससे आगे माधुर्यप्रेम का रूप धारण कर लेता है, जो श्रीकृष्ण और उनके भक्तों में होने वाला सर्वोच्च रस है।
अध्याय ४३ वत्सलभक्तिरस जब प्रेम का भाव बढ़कर वात्सल्य सम्बन्ध में विकसित हो जाता है और स्थायित्व को प्राप्त हो जाता है तब उस सम्बन्ध को वात्सल्यरस कहते हैं। भक्ति के वात्सल्यरस का प्रकाश श्रीकृष्ण और उनके पिता-माता आदि गुरुजनों के परस्पर व्यवहार में पाया जाता है। विद्वानों ने श्रीकृष्ण के गुरुजनों में उनके लिए पाए जाने वाले वात्सल्य प्रेम के उद्दीपनों का वर्णन किया है। वे कहते हैं—"जिनकी देह नवीन कुवलय माला के समान श्याम एवं कोमल है, कमलनयन केशराशि रूप भ्रमर पंक्ति से घिरे हुए हैं, ऐसे पुत्र कृष्ण को वृन्दावन में घूमते देखकर नन्द महाराज की गृहिणी यशोदा मैय्या के स्तनों से दुग्ध की धारा बह चली, जिससे उनका सारा शरीर भीग गया।" श्रीकृष्ण के लिए वात्सल्यप्रेम का उद्दीपन करने वाले कुछ विशिष्ट उद्दीपक हैं—उनकी श्यामल देह, उनका सर्वमंगलमयचिह्नों से युक्त स्वरूप, उनकी मृदुता, उनके मधुर वचन, उनकी सरलता, उनकी लज्जा, निरन्तर गुरुजनों के सम्मान करने की भावना, एवं उदारता—ये सब गुण वात्सल्यरस के उद्दीपन माने जाते हैं। श्रीमद्भागवत (१०.८.४५) में शुकदेव गोस्वामी का कथन है कि जिन्हें सम्पूर्ण वेदों में सर्वोच्च देव, उपनिषदों में निर्विशेष ब्रह्म, दर्शन में परम पुरुष माना गया है; योगी जिन्हें परमात्मा जानते हैं और भक्त भगवान् स्वीकार करते हैं, उन्हीं श्रीकृष्ण को यशोदा मैय्या अपना पुत्र मानती हैं। एक बार यशोदा मैय्या ने अपनी एक सखी से कहा, “व्रजराज नन्द महाराज मेरे साथ भगवान् विष्णु की आराधना करते हैं। इसी के फलस्वरूप कृष्ण पूतना और अन्य राक्षसों के चंगुल से बच गया। अर्जुन को तेज आंधी ने गिरा दिया है और यद्यपि समझा जाता है कि कृष्ण ने बलरामजी के साथ मिलकर गोवर्धन पर्वत को धारण किया,
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मैं समझती हूँ कि वास्तव में नन्द महाराज ने ही पर्वत को उठाया था। नहीं तो, नन्हे से बालक के लिये ऐसे बड़े पर्वत को उठाना कहाँ सम्भव था।" यह भी वात्सल्यरस का उदाहरण है। इस वात्सल्यरस का उद्भव भक्त के प्रेम में इस विश्वास के कारण होता है कि वह श्रीकृष्ण का पूज्य है और यदि वह कृष्ण का लालन-पालन नहीं करेगा तो श्रीकृष्ण जीवित नहीं रह सकेंगे। अतएव एक भक्त ने श्रीकृष्ण के माता-पिता से प्रार्थना की है— “मैं श्रीकृष्ण के गुरुजनों को प्रणाम करता हूँ। वे द्रवितचित्त महानु- भाव निरन्तर श्रीकृष्ण की सेवा और लालन-पालन को आतुर रहते हैं। जगत् के पिता के लिए ऐसे कृपाभाव को रखने वाले इन महाभागवतों को सादर प्रणाम है।" एक ब्राह्मण अपनी प्रार्थना में कहता है—“जो वेद उपनिषदों को पढ़ते हैं वे ऐसा किया करें और जो बन्धन के भय से मुक्त होने के लिये महाभारत को भजते हैं, वे भी भजते रहें। परन्तु जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं तो केवल महाराज नन्द का भजन करता हूँ जिसके आँगन में साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्ण बालरूप में क्रीड़ामग्न हैं।” श्रीकृष्ण में वात्सल्य स्नेह रखने वाले गुरुजनों के नाम इस प्रकार हैं—व्रजेश्वरी यशोदा मैय्या, व्रजेन्द्र नन्दमहाराज, बलराम की मैय्या रोहिणी, वे सब वृद्धा गोपियाँ जिनके पुत्रों को ब्रह्माजी ने हर लिया था, वसुदेव-गृहिणी देवकी, वसुदेव की अन्य पन्द्रह स्त्रियाँ, अर्जुन की माता कुन्ती, श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव, श्रीकृष्ण के गुरु सान्दीपनी मुनि—ये सब श्रीकृष्ण के गुरुजन उनमें वात्सल्य प्रेम रखते हैं। इनमें जिनका नाम पहले है वे अगलों से से श्रेष्ठ माने जाते हैं। इस प्रकार यशोदामैय्या और नन्दमहाराज का स्थान गुरुजनों में सर्वोच्च है। श्रीमद्भागवत (१०.६.३) में शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित से यशोदा मैय्या के रूप और सौन्दर्य का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं—"हे राजन् ! यशोदा मैय्या ने कमर में रेशमी वस्त्र बाँधा हुआ था, पुत्र के लिये स्नेहवश उनके स्तनों से दुग्धधारा निर्भरित हो रही थी। नवनीत निकालने के लिये जब वे रस्सी को पकड़कर दुग्ध का मन्थन करतीं तो उनके हाथ के कंगन और कानों के कुण्डल हिलकर बजने लगते और केशराशि में सुशोभित पुष्प गिरने लगते। अतिश्रम के कारण उनका मुखमण्डल श्वेत कणों से भर जाता।" एक अन्य भक्त ने अपनी प्रार्थना में यशोदा मैय्या का चित्रण किया है—"डोरी से जिनके घुंघराले बालों का जूड़ा बन्धा हुआ है, जिनकी माँग
३०० ] bhakti-rasāmṛta-sindhu
सिन्दूर से भरी हुई शोभा पा रही है, और जिनके अंग सम्पूर्ण अलंकारों का तिरस्कार कर रहे हैं, जो नेत्रों से निरन्तर श्रीकृष्ण को निहारा करती हैं और इस प्रकार जिनके नेत्र निरन्तर, अश्रुपूर्ण रहते हैं, नीलकमल के समान कान्तिवाली, नाना वर्ण के परिधान से विभूषिता, यशोदा मैय्या की हम शरण लेते हैं। उनकी कृपा-कटाक्ष हम पर पड़े जिससे हम माया के बन्धन से बचकर सुगमता से भक्तिपथ पर अग्रसर हो सकें।" श्रीकृष्ण के लिये यशोदा मैय्या के स्नेह का वर्णन इस प्रकार है— प्रातःकाल उठकर यशोदा मैय्या सबसे पहले श्रीकृष्ण को स्तनपान करातीं, फिर उनकी रक्षा के लिये नाना मन्त्रों का उच्चारण करतीं, उनके ललाट को अच्छी प्रकार से विभूषित करतीं और उनकी भुजा में मन्त्रौषधि बाँधती हैं। इस सबसे स्पष्ट है कि वे श्रीकृष्ण के लिये वात्सल्यरस की साक्षात् मूर्ति हैं।" नन्द महाराज का रूप इस प्रकार है—"उनके सिर के बाल कुछ काले हैं और कुछ श्वेत हैं। वे बरगद के पत्ते के समान हरित वस्त्र धारण किए रहते हैं। उनका पेट बढ़ा हुआ है और शरीर का वर्ण ठीक पूर्ण चन्द्र जैसा है। वे सुन्दर दाढ़ी-मूँछ से युक्त हैं।" बाल्यकाल में एक दिन श्रीकृष्ण घर के प्रांगण में पिता की उंगली पकड़े-पकड़े चल रहे थे। स्थिरतापूर्वक न चल सकने के कारण वे गिरे जा रहे थे। जिस समय नन्द महाराज अपने दिव्य पुत्र को इस प्रकार संरक्षण दे रहे थे तभी एकाएक उनके नेत्रों में आँसू आ निकले और वे हर्षातिरेक से विह्वल हो गए। उन नन्द महाराज के चरणकमलों में हमारा सादर प्रणाम। कौमार की आयु, वेशभूषा, चेष्टा, बालक की चपलता, मधुर वचन, मुस्कराना, और लीला आदि को विद्वानों ने वात्सल्यरस का उद्दीपन बतलाया है। कौमार अवस्था आद्य, मध्य, और शेष—इस भेद से तीन प्रकार की मानी गई है। कौमार अवस्था के प्रारम्भ में कमर और जंघाओं की स्थूलता, नेत्रों के किनारों की श्वेतिमा, नन्हें- नन्हें दाँतों का निकलना, अत्यन्त मृदु तथा कोमलता आदि होते हैं। उस समय उनका वर्णन इस प्रकार है, "जिनका मुख तीन-चार दांतों से शोभायमान है, जिनकी जंघायें खूब मोटी-मोटी हैं और जिनका शरीर बहुत छोटा है, ऐसे श्रीकृष्ण अपनी शैशव क्रीड़ा से नन्द महाराज और यशोदा मैय्या के आनन्द का वर्धन कर रहे हैं। वे कभी-कभी बार-बार अपने नन्हें-नन्हें चरणों से चलने का प्रयास करते, कभी रोते, कभी हँसते और कभी अंगूठा चूसते हुए भूमि पर चित पड़ जाते।" ये
सब बालकृष्ण की विविध लीलाएँ हैं, क्रीड़ाएँ हैं। जब श्रीकृष्ण भूमि पर चित पड़े हुए कभी अपने चरण के अंगूठे को चूसने लगने, कभी हँसते; कभी रोते तो उनकी इस प्रकार की लीला को देखकर यशोदा मैय्या उन्हें तनिक भी मना करने की चेष्टा नहीं करतीं । वरन् वे तो बड़ी उत्सुकता से देखते हुए अपने पुत्र की शैशव लीला का आनन्द लिया करती थीं । श्रीकृष्ण की कौमार अवस्था के प्रारम्भ में उनके गले में सोने के हार में बघनखा पहनाया गया था, ललाट पर गोरु चन्दन का तिलक था, नेत्रों में काजल और कमर में सुनहरी रेशमी डोरी थी । यह कौमार के प्रारम्भ में श्रीकृष्ण की वेशभूषा का वर्णन है । वक्षःस्थल पर बघनखा धारण किए, नवीन तमाल वृक्ष के समान वर्ण से युक्त,गोरोचन तिलक से शोभायमान, हाथ में सुन्दर रेशमी डोरी बाँधे हुए और कमर में रेशमी वस्त्रों से सुसज्जित भगवान् श्रीकृष्ण के इस सुन्दर रूप को देखकर नन्द महाराज कभी तृप्त नहीं होते थे । मध्य कौमार अवस्था में श्रीकृष्ण के बालों का अगला भाग नेत्रों के चारों ओर बिखर जाता । कभी वे कमर के नीचे वस्त्र धारण करते तो कभी एकदम नंगे रहते । कभी वे एक-एक पग बढ़ाकर आगे चलने का प्रयास करते और कभी टूटी भाषा में बड़ा मधुर बोलते । ये सब उनकी मध्य कौमार अवस्था के कुछ लक्षण हैं। उस समय यशोदा मैय्या ने उनके जिस रूप को देखा उसका वर्णन इस प्रकार है, "उनके बिखरे बाल भौंहों को छू रहे थे और नेत्र भी बड़े चंचल हो चले थे । वे अपने भाव को ठीक-ठीक व्यक्त नहीं कर पा रहे थे । फिर भी जब वे बोलते तो उनकी वाणी बड़ी मधुर और श्रुतिप्रिय होती । जब यशोदा मैय्या ने उनके नन्हें-नन्हें कानों और नन्हें शरीर की ओर देखा और पाया कि वे अपने नन्हें-नन्हें चरणों से जल्दी-जल्दी भागने का प्रयास कर रहे हैं, तो वे मानो अमृत के सिन्धु में निमग्न हो गईं । इस अवस्था में श्रीकृष्ण के आभूषण हैं—नाक के अगले भाग पर धारण किया हुआ मोती, हाथ में मक्खन और कमर आदि में बँधी किंकिणी । जब यशोदा मैय्या ने अपने बालक को कमर में बँधी किंकिणी का शिञ्जन करते हुए, नाक में सुन्दर मोती धारण किए हुए, हाथ में मक्खन लिए हुए और मुस्कराते हुए चलने का प्रयास करते हुए देखा तो वे अपने नन्हें से बालक की इस मुद्रा पर मुग्ध रह गई । जिस समय. श्रीकृष्ण अपने कौमार की शेष अवस्था में थे, उस समय उनकी कमर पतली हो गई, वक्षःस्थल चौड़ा हो गया और
३०२] भक्तिरसामृतसिन्धु सिर घुंघराली अलकावली से सुशोभित हो गया जो काक पक्षा जैसे प्रतीत हो रहे थे । श्रीकृष्ण के इस अद्भुत स्वरूप को देखकर यशोदा मैय्या कभी चकित हुए बिना नहीं रहती थीं । कौमार के अन्त में श्रीकृष्ण हाथ में नन्हीं सी लाठी धारण करने लगे । उनके वस्त्र कुछ लम्बे हो गए और कमर में गाँठ लगा ली । कमर को लगाई लंगोटी सर्प-फन को लज्जित कर रही थी । इस वेषभूषा में वे घर के निकट ही बछड़ों की देखभाल करते और कभी-कभी अपने ही समवयस्क गोपबालकों के साथ खेलते । उनके पास एक पतली सी वंशी और एक शृंग भी था । एवं कभी-कभी वे पेड़ों के पत्तों से बनी वंशी भी बजाते थे । ये सब श्रीकृष्ण के अन्तिम कौमार के लक्षण हैं । जब श्रीकृष्ण कुछ बड़े हो गए तो बछड़ों को चराते-चराते प्रायः वन के निकट चले जाते । घर लौटते में जब उन्हें थोड़ा सा भी विलम्ब हो जाता तो नन्द महाराज तुरन्त चन्द्रशालिका पर चढ़कर उनका मार्ग जोहने लगते । चन्द्रशालिका से वे तब तक नहीं उतरते जब तक यशोदा मैय्या को यह संकेत न दे पाते कि अपने नन्हें गोपसखाओं और बछड़ों से घिरे हुए श्रीकृष्ण लौट रहे हैं । पुत्र के सिर पर लगे मोरपंख की ओर संकेत कर-कर के नन्द महाराज अपनी प्रिय गृहिणी को सूचित करते कि बालक किस प्रकार उसके नेत्रों को आनन्दित कर रहा है । यशोदा मैय्या तब महाराज से इस प्रकार कहतीं, "देखिए मेरे पुत्र को ! जिसके नेत्र श्वेतिमा से युक्त हैं, जिसने अपने सिर पर पगड़ी धारण कर रखी है, और जिसके शरीर पर दुपट्टा और चरणों में बँधे नूपुर मधुर शिञ्जन कर रहे हैं । वह निकट आ रहा है, अपने सुरभि बछड़ों के साथ । देखो-देखो कैसे वह वृन्दावन की पावन भूमि में विहार कर रहा है ।" इसी प्रकार नन्द महाराज अपनी गृहिणी से कहते हैं, "हे यशोदे ! अपने पुत्र कृष्ण को तो देखो । उसके देह की श्यामल कान्ति, रक्तारुण नयन, चौड़ा वक्षःस्थल और सुन्दर स्वर्ण हार कैसा अद्भुत लग रहा है और कैसे मेरे दिव्य आह्लाद को अधिकाधिक बढ़ा रहा है ।" जब नन्द महाराज के प्रियपुत्र श्रीकृष्ण किशोर में प्रवेश करते हैं तो उनका सौन्दर्य बहुत बढ़ जाता है; परन्तु फिर भी उनके माता- पिता उन्हें पौगण्ड अवस्था में समझते हैं, यद्यपि उनकी अवस्था दस और पन्द्रह के बीच की होती है । इसके विपरीत जब श्रीकृष्ण पौगण्ड अवस्था में रहते हैं तो उनके कुछ सेवक उन्हें कैशोर आयु में समझ लेते हैं । शैशव
वत्सलभक्तिरस | ३०३ काल की चपल लीलाओं में श्रीकृष्ण प्रायः दूध-दही के मटकों पात्रों को फोड डालते हैं, दही को आंगन में बिखेर देते हैं और मक्खन की चोरी करते हैं। कभी-कभी वे मथनी को भी तोड़ डालते हैं और कभी मक्खन को अग्नि मे स्वाहा कर देते हैं। इस प्रकार वे मैय्या यशोदा के दिव्य आनन्द को नित्य बढ़ाया करते हैं। इस सन्दर्भ में यशोदा मैय्या ने एक बार अपनी दासी मुखरा से कहा था—"सशंक दृष्टि से चारों ओर देखता हुआ बार-बार धीरे-धीरे लता से निकल कर आगे पग रखता हुआ यह कृष्ण चला आ रहा है। अरि देख तो ! लगता है यह सीधे माखन चुराकर आया है। चुपचाप खडी रह, इसे पता न चले कि हमने देख लिया है। मैं इसकी चतुर भ्रू-भंगिमा, डरी हुई आँखों और सुन्दर मुख को देखना चाहती हूँ।" श्रीकृष्ण के चुपके-चुपके माखन चुराने की लीला में यशोदा मैय्या को उनका सिर सूंघने, कभी कभी अपने हाथ से शरीर पर हाथ फेरने, आर्शीवाद देने, आज्ञा देने, लालन-पालन करने और चोरी न करने का उपदेश आदि देने का आस्वादन मिलता था। ये सब लीलाएँ वात्सल्यरस में होती हैं। यह विशेष रूप से दर्शनीय है कि चोरी करने की बालकोचित प्रवृत्ति भगवान में भी रहती है। अतएव यह प्रवृत्ति अस्वाभाविक नहीं है। परन्तु प्राकृत जगत् के वितरीत, अप्राकृत सम्बन्धरस में इस प्रकार चोरी करने में कोई दोष नहीं है। श्रीमद्भागवत (१०.१३.३३) में शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित से कहते हैं, "हे राजन् ! जैसे ही वृद्धा गोपियों ने पुत्रों को आते देखा, उनमें अनिर्वचनीय वात्सल्य उमड़ पड़ा और वे सब स्नेह से परिप्लावित हो गईं। पहले वे अपने पुत्रों को माखन चोरी करने के लिए दण्डित करने का विचारकर रही थीं, परन्तु जैसे ही पुत्र नेत्रों के सामने आये कि वे अपने सारे क्रोध को भूल बैठीं और वात्सल्य से अभिभूत हो गईं। अपने पुत्रों का आलिंगन करते हुए वे उनके सिर को सूंघने लगीं। इस प्रकार करते हुए पुत्रप्रेम में वे प्रायः पागल हो गईं। अपनी शैशव क्रीड़ा में ये सब गोपबालक श्रीकृष्ण के साथ माखन चोरो किया करते थे, परन्तु श्रीकृष्ण पर क्रुद्ध होने के स्थान पर यशोदा मैय्या जब भी उन्हें देखतीं तो स्तनों से निकली दुग्धधारा से भीग जातीं। श्रीकृष्ण के लिए अपने स्नेह के अतिरेक- वश वे बारम्बार उनके सिर को सूंघने लगतीं। चुम्बन, आलिंगन, नाम लेकर पुकारना और कभी-कभी चोरी करने के लिए उलाहना देना, ये सब गोपबालकों की माताओं की सामान्य
: ३०४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु क्रियाएँ हैं। ये सब वात्सल्यरस के सात्त्विक भाव हैं जिनमें आठ प्रकार के लक्षण पूर्ण रूप से प्रकट रहते हैं। श्रीमद्भागवत (१०.१३.२२) में शुक- देव गोस्वामी राजा परीक्षित से कह रहे हैं, “गोपबालकों की माताएँ श्रीभगवान् की योगमाया शक्ति से मोहित थीं। इसलिये जैसे ही वे अपने बालकों की वंशीध्वनि सुनतीं, वैसे ही उठ कर खड़ी हो जातीं और मन ही मन अपने पुत्रों का आलिंगन करने लगतीं, जो साक्षात् श्रीकृष्ण की अन्तरंगा शक्ति द्वारा रचे गये थे। उन्हें अपने से उत्पन्न जानकर वे उन्हें अपनी भुजाओं में लेकर आलिंगन करने लगतीं और उनकी देह को अपने हृदय पर रख कर सहलातीं। ऐसी अवस्था में उत्पन्न भाव अमृत से भी अधिक मधुर होते और माताओं के स्तनों से बहते दूध को उनके बालक तुरन्त पी जाते।” श्रील रूप गोस्वामी द्वारा संकलित 'ललितमाधव' में श्रीकृष्ण का इन शब्दों में सम्बोधन किया गया है—“हे कृष्ण ! जब तुम गोचारण में संलग्न होते हो तो गाय और बछड़ों के खुरों से उठी हुई धूल तुम्हारे सुन्दर मुख और तिलक को ढक लेती है और तुम बिल्कुल धूली से भर जाते हो। परन्तु जब घर को लौटते हो तो यशोदा मैय्या के स्तनों से बहता हुआ दूध इस धूलि के आवरण को धो डालता है। जैसे अभिषेक में श्रीमूर्ति को स्नान कराया जाता है उसी प्रकार तुम भी इस दूध से शुद्ध हुए प्रतीत होते हो।” मन्दिरों में प्रथा है कि यदि कोई अशुद्ध कार्य बन जाए तो श्रीमूर्ति को दुग्ध में स्नान कराया जाता है। श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। पर वे नित्य यशोदा मैय्या के स्तनों से निस्यन्दित दुग्धधारा में स्नान करते थे, जिससे धूलि का आवरण उन पर से हट जाता था। कभी-कभी यशोदा मैय्या भाव में स्तम्भित हो जातीं। जिस समय श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत धारण कर रखा था उस समय यशोदा मैय्या को उनका आलिंगन करने में संकोच हुआ और वे स्तम्भित रह गईं। श्रीकृष्ण को पर्वत उठाकर संकट में पड़े देखकर यशोदा के नेत्रों में आँसू भर आये। नेत्रों के अश्रुपूरित हो जाने के कारण वे श्रीकृष्ण की ओर अधिक न देख सकीं और चिन्ता के कारण उनका कंठ रुद्ध हो गया। इस लिये वे श्रीकृष्ण को क्या करना चाहिये, यह भी नहीं बतला सकीं। यह प्रेम में स्तम्भित हो जाने का उदाहरण है। अपने बालक को पूतना आदि राक्षसों के संकट से मुक्त हुआ जानकर यशोदा मैय्या को प्रेमवश अपार हर्ष होता। श्रीमद्भागवत (१०. १७.१६) में शुकदेव गोस्वामी कहते हैं कि खोये बालक के फिर से मिल जाने
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पर यशोदा मैय्या अपने को बड़ा भाग्यवान समझतीं। वे तुरन्त उन्हें अपनी गोद में उठा लेतीं और बार-बार आलिंगन करतीं। इस प्रकार करते-करते उनके नेत्रों से अविरल अश्रुधारा झरने लगतीं। वे अपने दिव्य आनन्द को अभिव्यक्त न कर पातीं। श्रील रूप गोस्वामी के "विदग्धमाधव" में उल्लेख है, "हे कृष्ण ! तुम्हारी मैय्या का स्पर्श तो कर्पूर, पराग, चांदनी खस और चन्दन की शीतलता को भी जीतने वाला है।" श्रीकृष्ण के लिये यशोदा मैय्या की वात्सल्य रति निरन्तर स्वभावतः प्रौढ़ता को प्राप्त होती जाती है। कभी अतिशय स्नेह और कभी प्रबल राग के रूप में शोभायमान होती है। वात्सल्यरति का उदाहरण श्रीमद्भागवत में (१०.६.४३) है। शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित से कहते हैं, "हे राजन् ! जब महाभाग नन्द महाराज मथुरा से लौटे तो वे अपने पुत्र का सिर सूंघने लगे और इस प्रकार वात्सल्यरस के भावसिन्धु में निमग्न हो गये। इसी प्रकार का वाक्य यशोदा मैय्या के सम्बन्ध में है। गोचारण से श्रीकृष्ण के लौटने की प्रतीक्षा में वे उनकी वंशीध्वनि को सुनने के लिये अतिशय आतुर हो रही थीं। विलम्बवश श्रीकृष्ण की वंशी को सुनने की उनकी उत्कंठा द्विगुणित हो गई और स्तनों से दुग्धधारा प्रवा- हित होने लगीं। उस अवस्था में वे कभी घर के अन्दर आतीं और कभी बाहर आ जातीं। वे निरन्तर मार्ग की ओर देख रही थीं कि कहीं गोविन्द वापस तो नहीं लौट रहे। जब बड़े-बड़े महर्षि अद्भुत लीलापराक्रम के लिये श्रीकृष्ण का जय-जयकार कर रहे थे तो गोकुलेश्वरी यशोदा मैय्या ने कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में प्रवेश किया। उनकी साड़ी का अधोभाग स्तनों से निकली दुग्धधारा से भीगा हुआ था। यशोदा मैय्या का कुरुक्षेत्र में यह प्रवेश युद्ध के अवसर पर नहीं हुआ था। एक अन्य समय श्रीकृष्ण द्वारका से सूर्यग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र आये थे। इसी समय वृन्दावनवासी भी उन्हें देखने के लिये वहाँ गये। जब श्रीकृष्ण तीर्थयात्रा के लिये कुरुक्षेत्र पधारे तो वहाँ एकत्रित सारे जन कहने लगे कि देवकीनन्दन श्रीकृष्ण पधारे हैं। उस समय स्नेह मयी जननी देवकी श्रीकृष्ण के मुख पर हाथ फेरने लगीं। और फिर जब लोगों ने कहा कि वसुदेव पुत्र पधारे हैं तो दोनों नन्द महाराज और यशोदा मैय्या प्रेम से उल्लसित होकर अपना प्रगाढ़ आनन्द व्यक्त करने लगे। अपने पुत्र को कुरुक्षेत्र में देखने जाते हुए यशोदा मैय्या गोकुलेश्वरी
३०६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
को उनकी एक सखी ने कहा, “हे ब्रजेश्वरी ! तुम्हारे स्तनरूप पर्वतों से निकलने वाली दुग्धधारा ने गंगा को श्वेतवर्ण कर दिया है और तुम्हारे नेत्रों से जो अश्रुधारा प्रवाहित हो रही है उस कज्जल मिश्रित जल ने यमुना का जल काला कर दिया है । तुम इन दोनों नदियों के बीच खड़ी हो इसलिये अब अपने पुत्र के मुख को देखने के लिये ऐसी क्यों उत्कंठित हो । इन दोनों नदियों के रूप में तुम्हारा वात्सल्य प्रेम तो पहले ही व्यक्त हो चुका है ।” यशोदा मैया की उसी सखी ने श्रीकृष्ण से इस प्रकार कहा, “हे मुकुन्द ! यदि गोकुलेश्वरी यशोदा मैय्या को तुम्हारे मुखारविन्द का दर्शन होता रहे तो अग्नि में खड़ा होना भी उन्हें हिमालय जैसा लगेगा । दूसरी ओर, यदि उनका निवास अमृत के सिन्धु में हो, किन्तु तुम्हारा मुखारविन्द न दीख पड़े तो फिर यह अमृत का सिन्धु भी उनके लिए विष सागर जैसा हो जायेगा ।” श्रीकृष्ण के मुखचन्द्र को निरन्तर निहारने की ब्रजेश्वरी यशोदा मैय्या की उत्कंठा त्रिभुवन में धन्यातिधन्य है । इसी प्रकार कुन्ती देवी अक्रूर से कहती हैं, “हे भय्या अक्रूर ! मेरा भतीजा मुकुन्द लम्बे समय तक हमसे अलग रहा है । क्या तुम उसे यह सन्देश कह दोगे कि शत्रुओं के बीच पड़ी तुम्हारी कुन्ती बुआ जानना चाहती है कि क्या वह दुबारा तुम्हारा मुखारविन्द देख सकेगी ?” श्रीमद्भागवत (१०.४६.२८) में इस प्रकार का उल्लेख है । उद्धव से वृन्दावन में श्रीकृष्ण की द्वारकालीला का वर्णन सुनकर यशोदा मैय्या स्तनों से दूध बहाती हुई, नेत्रों से अश्रु विमोचन करने लगीं । श्रीकृष्ण के लिये यशोदा मैय्या के वात्सल्य प्रेम की पराकाष्ठा का एक उदाहरण तब प्रकट हुआ जब श्रीकृष्ण कंस की राजधानी मथुरा को चले गये । श्रीकृष्ण के विरह में, श्रीकृष्ण के नन्हे-नन्हे खिलौनों को देखकर यशोदा मैय्या उच्च स्वर से चिल्लाती हुई भूमि पर अचेतन गिर पड़ीं । भूमि पर लोटने से उनकी देह नाना प्रकार से घायल हो गई और वे पुकारने लगीं—हा पुत्र, हा पुत्र !” इस पर भी उन्हें सन्तोष न हुआ और वे दोनों हाथों से जोर से छाती पीटने लगीं । यशोदा मैय्या की इस क्रिया को दक्ष भक्तों ने विरहप्रेम की संज्ञा दी है । कभी-कभी बहुत से अन्य लक्षण भी होते हैं । जैसे—चिन्ता, शोक, निर्वेद, स्तम्भ, दैन्य, चापल्य, उन्मादन तथा मोह आदि । जहाँ तक यशोदा मैय्या की चिन्ता का सम्बन्ध है, जब श्रीकृष्ण घर
वत्सलभक्तिरस [ ३०७ से बाहर गोचारण भूमि में थे तो एक भक्त ने यशोदा मैय्या से कहा, "हे मैय्या ! मैं देख रहा हूँ कि तुम चिन्ता से भरी होने के कारण गति- शून्य हो गई हो। तुम्हारे नेत्र भी अलक्षित से लग रहे हैं और तुम्हारी श्वास में ऐसी उष्णता अनुभव होती है जिससे तुम्हारे स्तनों का दूध उबलने लगा है। हे ब्रजेश्वरी ! इन लक्षणों से स्पष्ट प्रतीत होता है कि तुम पुत्रविरह के दुःख से आक्रान्त हो रही हो।" जिस समय अक्रूर वृन्दावन में श्रीकृष्ण की द्वारका लीलाओं का विव- रण सुना रहे थे तो यशोदा मैय्या ने अपने कानों में सुना कि उनकी अनेक रानियाँ हैं और वे निरन्तर उनके साथ गृहस्थ के कार्यों में लगे रहते हैं। यह सुनने पर यशोदा मैय्या को बड़ा विषाद हो आया। वे सोचने लगीं कि यह उनका कैसा दुर्भाग्य है कि पुत्र के कैशोर की समाप्ति होते ही उन्होंने उसका विवाह नहीं कर दिया। अपनी इस भूल के कारण वे पुत्र और पुत्रवधु को अपने महल में प्रवेश भी न करा पाईं। वे कह पड़ी, "हे अक्रूर ! कृष्ण को मथुरा ले जाकर तुमने मेरे सिर पर वज्रपात कर डाला है।" यह कृष्णविरह में यशोदा मैय्या में उदित विषाद का लक्षण है। इसी प्रकार निर्वेद का अनुभव करते हुए मैय्या सोचती, "मेरे पास लाखों गायें हैं, फिर भी इनके दूध से श्रीकृष्ण की तृप्ति नहीं होती। अतएव इस दूध को धिक्कार है। मुझे भी धिक्कार है, क्योंकि लौकिक सम्पदा से समृद्ध होने पर भी अब मैं अपने पुत्र का उसी प्रकार सिर नहीं सूँघ सकती, और न अपने स्तनों का दुग्धपान करा सकती हूँ, जैसा उसके वृन्दावन में रहते समय कराती थी।" श्रीकृष्ण के एक सखा ने उनका सम्बोधन किया, 'हे कमलनयन ! गोकुल में रहते समय तुम निरन्तर हाथ में छड़ी धारण किये रहते थे। वह छड़ी अब यशोदा मैय्या के घर में खाली पड़ी है। अब जब भी वे उसे देखती हैं तो उस छड़ी के समान ही जड़ रह जाती हैं। यह श्रीकृष्ण के विरह में होने वाली जड़ता का उदाहरण है। श्रीकृष्ण के विरह में यशोदा मैय्या इतनी दीन हो गईं कि अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान् ब्रह्मा से याचना करने लगीं- "हे विधाता ! क्या तू इतनी भी कृपा नहीं करेगा कि मेरे पुत्र को एक बार फिर मेरे पास, चाहे क्षण भर के लिये ही, ले आये जिससे उसके मुखचन्द्र को निहार सकूँ। कभी-कभी चापल्य में पागल स्त्री के समान यशोदा जी नन्द महाराज पर आरोप लगातीं- 'अरे निर्लज्ज ! तू इस महल में क्या कर रहा है ? लोग न जाने क्यों तुझे ब्रज का राजा कहते