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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 327, कुल 380 में से

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पृष्ठ 327

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सिन्दूर से भरी हुई शोभा पा रही है, और जिनके अंग सम्पूर्ण अलंकारों का तिरस्कार कर रहे हैं, जो नेत्रों से निरन्तर श्रीकृष्ण को निहारा करती हैं और इस प्रकार जिनके नेत्र निरन्तर, अश्रुपूर्ण रहते हैं, नीलकमल के समान कान्तिवाली, नाना वर्ण के परिधान से विभूषिता, यशोदा मैय्या की हम शरण लेते हैं। उनकी कृपा-कटाक्ष हम पर पड़े जिससे हम माया के बन्धन से बचकर सुगमता से भक्तिपथ पर अग्रसर हो सकें।" श्रीकृष्ण के लिये यशोदा मैय्या के स्नेह का वर्णन इस प्रकार है— प्रातःकाल उठकर यशोदा मैय्या सबसे पहले श्रीकृष्ण को स्तनपान करातीं, फिर उनकी रक्षा के लिये नाना मन्त्रों का उच्चारण करतीं, उनके ललाट को अच्छी प्रकार से विभूषित करतीं और उनकी भुजा में मन्त्रौषधि बाँधती हैं। इस सबसे स्पष्ट है कि वे श्रीकृष्ण के लिये वात्सल्यरस की साक्षात् मूर्ति हैं।" नन्द महाराज का रूप इस प्रकार है—"उनके सिर के बाल कुछ काले हैं और कुछ श्वेत हैं। वे बरगद के पत्ते के समान हरित वस्त्र धारण किए रहते हैं। उनका पेट बढ़ा हुआ है और शरीर का वर्ण ठीक पूर्ण चन्द्र जैसा है। वे सुन्दर दाढ़ी-मूँछ से युक्त हैं।" बाल्यकाल में एक दिन श्रीकृष्ण घर के प्रांगण में पिता की उंगली पकड़े-पकड़े चल रहे थे। स्थिरतापूर्वक न चल सकने के कारण वे गिरे जा रहे थे। जिस समय नन्द महाराज अपने दिव्य पुत्र को इस प्रकार संरक्षण दे रहे थे तभी एकाएक उनके नेत्रों में आँसू आ निकले और वे हर्षातिरेक से विह्वल हो गए। उन नन्द महाराज के चरणकमलों में हमारा सादर प्रणाम। कौमार की आयु, वेशभूषा, चेष्टा, बालक की चपलता, मधुर वचन, मुस्कराना, और लीला आदि को विद्वानों ने वात्सल्यरस का उद्दीपन बतलाया है। कौमार अवस्था आद्य, मध्य, और शेष—इस भेद से तीन प्रकार की मानी गई है। कौमार अवस्था के प्रारम्भ में कमर और जंघाओं की स्थूलता, नेत्रों के किनारों की श्वेतिमा, नन्हें- नन्हें दाँतों का निकलना, अत्यन्त मृदु तथा कोमलता आदि होते हैं। उस समय उनका वर्णन इस प्रकार है, "जिनका मुख तीन-चार दांतों से शोभायमान है, जिनकी जंघायें खूब मोटी-मोटी हैं और जिनका शरीर बहुत छोटा है, ऐसे श्रीकृष्ण अपनी शैशव क्रीड़ा से नन्द महाराज और यशोदा मैय्या के आनन्द का वर्धन कर रहे हैं। वे कभी-कभी बार-बार अपने नन्हें-नन्हें चरणों से चलने का प्रयास करते, कभी रोते, कभी हँसते और कभी अंगूठा चूसते हुए भूमि पर चित पड़ जाते।" ये

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