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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 328, कुल 380 में से

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पृष्ठ 328

सब बालकृष्ण की विविध लीलाएँ हैं, क्रीड़ाएँ हैं। जब श्रीकृष्ण भूमि पर चित पड़े हुए कभी अपने चरण के अंगूठे को चूसने लगने, कभी हँसते; कभी रोते तो उनकी इस प्रकार की लीला को देखकर यशोदा मैय्या उन्हें तनिक भी मना करने की चेष्टा नहीं करतीं । वरन् वे तो बड़ी उत्सुकता से देखते हुए अपने पुत्र की शैशव लीला का आनन्द लिया करती थीं । श्रीकृष्ण की कौमार अवस्था के प्रारम्भ में उनके गले में सोने के हार में बघनखा पहनाया गया था, ललाट पर गोरु चन्दन का तिलक था, नेत्रों में काजल और कमर में सुनहरी रेशमी डोरी थी । यह कौमार के प्रारम्भ में श्रीकृष्ण की वेशभूषा का वर्णन है । वक्षःस्थल पर बघनखा धारण किए, नवीन तमाल वृक्ष के समान वर्ण से युक्त,गोरोचन तिलक से शोभायमान, हाथ में सुन्दर रेशमी डोरी बाँधे हुए और कमर में रेशमी वस्त्रों से सुसज्जित भगवान् श्रीकृष्ण के इस सुन्दर रूप को देखकर नन्द महाराज कभी तृप्त नहीं होते थे । मध्य कौमार अवस्था में श्रीकृष्ण के बालों का अगला भाग नेत्रों के चारों ओर बिखर जाता । कभी वे कमर के नीचे वस्त्र धारण करते तो कभी एकदम नंगे रहते । कभी वे एक-एक पग बढ़ाकर आगे चलने का प्रयास करते और कभी टूटी भाषा में बड़ा मधुर बोलते । ये सब उनकी मध्य कौमार अवस्था के कुछ लक्षण हैं। उस समय यशोदा मैय्या ने उनके जिस रूप को देखा उसका वर्णन इस प्रकार है, "उनके बिखरे बाल भौंहों को छू रहे थे और नेत्र भी बड़े चंचल हो चले थे । वे अपने भाव को ठीक-ठीक व्यक्त नहीं कर पा रहे थे । फिर भी जब वे बोलते तो उनकी वाणी बड़ी मधुर और श्रुतिप्रिय होती । जब यशोदा मैय्या ने उनके नन्हें-नन्हें कानों और नन्हें शरीर की ओर देखा और पाया कि वे अपने नन्हें-नन्हें चरणों से जल्दी-जल्दी भागने का प्रयास कर रहे हैं, तो वे मानो अमृत के सिन्धु में निमग्न हो गईं । इस अवस्था में श्रीकृष्ण के आभूषण हैं—नाक के अगले भाग पर धारण किया हुआ मोती, हाथ में मक्खन और कमर आदि में बँधी किंकिणी । जब यशोदा मैय्या ने अपने बालक को कमर में बँधी किंकिणी का शिञ्जन करते हुए, नाक में सुन्दर मोती धारण किए हुए, हाथ में मक्खन लिए हुए और मुस्कराते हुए चलने का प्रयास करते हुए देखा तो वे अपने नन्हें से बालक की इस मुद्रा पर मुग्ध रह गई । जिस समय. श्रीकृष्ण अपने कौमार की शेष अवस्था में थे, उस समय उनकी कमर पतली हो गई, वक्षःस्थल चौड़ा हो गया और