भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवत्सलभक्तिरस [ ३०७ से बाहर गोचारण भूमि में थे तो एक भक्त ने यशोदा मैय्या से कहा, "हे मैय्या ! मैं देख रहा हूँ कि तुम चिन्ता से भरी होने के कारण गति- शून्य हो गई हो। तुम्हारे नेत्र भी अलक्षित से लग रहे हैं और तुम्हारी श्वास में ऐसी उष्णता अनुभव होती है जिससे तुम्हारे स्तनों का दूध उबलने लगा है। हे ब्रजेश्वरी ! इन लक्षणों से स्पष्ट प्रतीत होता है कि तुम पुत्रविरह के दुःख से आक्रान्त हो रही हो।" जिस समय अक्रूर वृन्दावन में श्रीकृष्ण की द्वारका लीलाओं का विव- रण सुना रहे थे तो यशोदा मैय्या ने अपने कानों में सुना कि उनकी अनेक रानियाँ हैं और वे निरन्तर उनके साथ गृहस्थ के कार्यों में लगे रहते हैं। यह सुनने पर यशोदा मैय्या को बड़ा विषाद हो आया। वे सोचने लगीं कि यह उनका कैसा दुर्भाग्य है कि पुत्र के कैशोर की समाप्ति होते ही उन्होंने उसका विवाह नहीं कर दिया। अपनी इस भूल के कारण वे पुत्र और पुत्रवधु को अपने महल में प्रवेश भी न करा पाईं। वे कह पड़ी, "हे अक्रूर ! कृष्ण को मथुरा ले जाकर तुमने मेरे सिर पर वज्रपात कर डाला है।" यह कृष्णविरह में यशोदा मैय्या में उदित विषाद का लक्षण है। इसी प्रकार निर्वेद का अनुभव करते हुए मैय्या सोचती, "मेरे पास लाखों गायें हैं, फिर भी इनके दूध से श्रीकृष्ण की तृप्ति नहीं होती। अतएव इस दूध को धिक्कार है। मुझे भी धिक्कार है, क्योंकि लौकिक सम्पदा से समृद्ध होने पर भी अब मैं अपने पुत्र का उसी प्रकार सिर नहीं सूँघ सकती, और न अपने स्तनों का दुग्धपान करा सकती हूँ, जैसा उसके वृन्दावन में रहते समय कराती थी।" श्रीकृष्ण के एक सखा ने उनका सम्बोधन किया, 'हे कमलनयन ! गोकुल में रहते समय तुम निरन्तर हाथ में छड़ी धारण किये रहते थे। वह छड़ी अब यशोदा मैय्या के घर में खाली पड़ी है। अब जब भी वे उसे देखती हैं तो उस छड़ी के समान ही जड़ रह जाती हैं। यह श्रीकृष्ण के विरह में होने वाली जड़ता का उदाहरण है। श्रीकृष्ण के विरह में यशोदा मैय्या इतनी दीन हो गईं कि अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान् ब्रह्मा से याचना करने लगीं- "हे विधाता ! क्या तू इतनी भी कृपा नहीं करेगा कि मेरे पुत्र को एक बार फिर मेरे पास, चाहे क्षण भर के लिये ही, ले आये जिससे उसके मुखचन्द्र को निहार सकूँ। कभी-कभी चापल्य में पागल स्त्री के समान यशोदा जी नन्द महाराज पर आरोप लगातीं- 'अरे निर्लज्ज ! तू इस महल में क्या कर रहा है ? लोग न जाने क्यों तुझे ब्रज का राजा कहते