भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
को उनकी एक सखी ने कहा, “हे ब्रजेश्वरी ! तुम्हारे स्तनरूप पर्वतों से निकलने वाली दुग्धधारा ने गंगा को श्वेतवर्ण कर दिया है और तुम्हारे नेत्रों से जो अश्रुधारा प्रवाहित हो रही है उस कज्जल मिश्रित जल ने यमुना का जल काला कर दिया है । तुम इन दोनों नदियों के बीच खड़ी हो इसलिये अब अपने पुत्र के मुख को देखने के लिये ऐसी क्यों उत्कंठित हो । इन दोनों नदियों के रूप में तुम्हारा वात्सल्य प्रेम तो पहले ही व्यक्त हो चुका है ।” यशोदा मैया की उसी सखी ने श्रीकृष्ण से इस प्रकार कहा, “हे मुकुन्द ! यदि गोकुलेश्वरी यशोदा मैय्या को तुम्हारे मुखारविन्द का दर्शन होता रहे तो अग्नि में खड़ा होना भी उन्हें हिमालय जैसा लगेगा । दूसरी ओर, यदि उनका निवास अमृत के सिन्धु में हो, किन्तु तुम्हारा मुखारविन्द न दीख पड़े तो फिर यह अमृत का सिन्धु भी उनके लिए विष सागर जैसा हो जायेगा ।” श्रीकृष्ण के मुखचन्द्र को निरन्तर निहारने की ब्रजेश्वरी यशोदा मैय्या की उत्कंठा त्रिभुवन में धन्यातिधन्य है । इसी प्रकार कुन्ती देवी अक्रूर से कहती हैं, “हे भय्या अक्रूर ! मेरा भतीजा मुकुन्द लम्बे समय तक हमसे अलग रहा है । क्या तुम उसे यह सन्देश कह दोगे कि शत्रुओं के बीच पड़ी तुम्हारी कुन्ती बुआ जानना चाहती है कि क्या वह दुबारा तुम्हारा मुखारविन्द देख सकेगी ?” श्रीमद्भागवत (१०.४६.२८) में इस प्रकार का उल्लेख है । उद्धव से वृन्दावन में श्रीकृष्ण की द्वारकालीला का वर्णन सुनकर यशोदा मैय्या स्तनों से दूध बहाती हुई, नेत्रों से अश्रु विमोचन करने लगीं । श्रीकृष्ण के लिये यशोदा मैय्या के वात्सल्य प्रेम की पराकाष्ठा का एक उदाहरण तब प्रकट हुआ जब श्रीकृष्ण कंस की राजधानी मथुरा को चले गये । श्रीकृष्ण के विरह में, श्रीकृष्ण के नन्हे-नन्हे खिलौनों को देखकर यशोदा मैय्या उच्च स्वर से चिल्लाती हुई भूमि पर अचेतन गिर पड़ीं । भूमि पर लोटने से उनकी देह नाना प्रकार से घायल हो गई और वे पुकारने लगीं—हा पुत्र, हा पुत्र !” इस पर भी उन्हें सन्तोष न हुआ और वे दोनों हाथों से जोर से छाती पीटने लगीं । यशोदा मैय्या की इस क्रिया को दक्ष भक्तों ने विरहप्रेम की संज्ञा दी है । कभी-कभी बहुत से अन्य लक्षण भी होते हैं । जैसे—चिन्ता, शोक, निर्वेद, स्तम्भ, दैन्य, चापल्य, उन्मादन तथा मोह आदि । जहाँ तक यशोदा मैय्या की चिन्ता का सम्बन्ध है, जब श्रीकृष्ण घर