भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु हैं। कितना आश्चर्य है कि पुत्रविरह में यह कठोर पिता पर्वत के समान वृन्दावन में बना हुआ है । कभी-कभी श्रीकृष्ण के सखा उन्हें यशोदा मैय्या के उन्माद का इन शब्दों में वर्णन सुनाते, “उन्मादवश यशोदा मैय्या कदम्ब के वृक्षों से पूछने लगतीं, “हे कदम्बों ! तुम्हीं बताओ, मेरा पुत्र कहाँ गया ?'' इसी प्रकार वे पक्षी और भ्रमरों से भी पूछतीं कि कहीं कृष्ण उनके आगे से तो नहीं गये अथवा क्या वे उनके बारे में कुछ जानते हैं। इस प्रकार हे कृष्ण ! तुम्हारे विषय में हर किसी से पूछते हुए यशोदा मैय्या वृन्दावन में भटक रही हैं। यह श्रीकृष्ण के विरह में उन्माद का उदाहरण है । जब यशोदा मैय्या ने नन्द महाराज को पाषाण हृदय बतलाया तो वे बोले, 'हे प्रिय ! तुम इतनी उत्तेजित क्यों हो रही हो । जरा ध्यान से तो देखो ! देखो तुम्हारा पुत्र कृष्ण तुम्हारे सामने ही खड़ा है। इस प्रकार पागलों के समान मत बनो । कृपया मेरे घर को शान्त बनाये रखो ।" श्रीकृष्ण को उनके सखाओं ने सूचित किया कि उनके विरह में नन्द महा- राज भी इस प्रकार मोहित हो गये हैं। कंस की यज्ञशाल में उपस्थित वसुदेव की सारी स्त्रियों ने जब श्रीकृष्ण के सुन्दर रूप को देखा तो तुरन्त वात्सल्य प्रेमवश उनके स्तनों से दुग्ध की धारा प्रवाहित होने लगी और उनकी साड़ियों के अधोभाग भीग गये । यह श्रीकृष्ण के योग से होने वाले प्रेमभाव का लक्षण है । श्रीमद्भागवत (१.११.२६) में उल्लेख है कि जब कुरुक्षेत्र के युद्ध का अन्त होने पर श्रीकृष्ण ने द्वारका में प्रवेश किया तो उनकी दृष्टि सबसे पहले अपनी सब माताओं पर गई और उन्होंने तुरन्त उनके सादर चरणों में प्रणाम किया । माताओं ने भी श्रीकृष्ण को तत्क्षण अपने अंक में उठा लिया और वात्सल्य स्नेहवश उनके स्तनों से दूध बह चला । इस प्रकार अश्रुधारा के जल से मिश्रित उनके स्तनों का दुग्ध श्रीकृष्ण को प्रथम अर्पण हुआ । यह महाविरह के बाद तुष्टि का उदाहरण है। 'ललितमाधव' में एक अन्य वाक्य है—अहो ! कैसा आश्चर्य है कि नन्दगेहिनी यशोदा जी ने अपने वात्सल्यरस में अपने नेत्रजल और स्तन के दुग्ध के मिश्रण से पुत्र कृष्ण का स्नान कराया । 'विदग्धमाधव' में एक भक्त श्रीकृष्ण का सम्बोधन करते हुए कहता है, हे मुकुन्द ! तुम्हारे कमल की सुगन्ध से परिपूर्ण मुख की चन्द्रिका से आकृष्ट हुई यशोदा मैय्या प्रेम से अभिभूत हो गईं और तुरन्त उनके बड़े-बड़े स्तनों से दुग्ध