भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
३०८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु हैं। कितना आश्चर्य है कि पुत्रविरह में यह कठोर पिता पर्वत के समान वृन्दावन में बना हुआ है । कभी-कभी श्रीकृष्ण के सखा उन्हें यशोदा मैय्या के उन्माद का इन शब्दों में वर्णन सुनाते, “उन्मादवश यशोदा मैय्या कदम्ब के वृक्षों से पूछने लगतीं, “हे कदम्बों ! तुम्हीं बताओ, मेरा पुत्र कहाँ गया ?'' इसी प्रकार वे पक्षी और भ्रमरों से भी पूछतीं कि कहीं कृष्ण उनके आगे से तो नहीं गये अथवा क्या वे उनके बारे में कुछ जानते हैं। इस प्रकार हे कृष्ण ! तुम्हारे विषय में हर किसी से पूछते हुए यशोदा मैय्या वृन्दावन में भटक रही हैं। यह श्रीकृष्ण के विरह में उन्माद का उदाहरण है । जब यशोदा मैय्या ने नन्द महाराज को पाषाण हृदय बतलाया तो वे बोले, 'हे प्रिय ! तुम इतनी उत्तेजित क्यों हो रही हो । जरा ध्यान से तो देखो ! देखो तुम्हारा पुत्र कृष्ण तुम्हारे सामने ही खड़ा है। इस प्रकार पागलों के समान मत बनो । कृपया मेरे घर को शान्त बनाये रखो ।" श्रीकृष्ण को उनके सखाओं ने सूचित किया कि उनके विरह में नन्द महा- राज भी इस प्रकार मोहित हो गये हैं। कंस की यज्ञशाल में उपस्थित वसुदेव की सारी स्त्रियों ने जब श्रीकृष्ण के सुन्दर रूप को देखा तो तुरन्त वात्सल्य प्रेमवश उनके स्तनों से दुग्ध की धारा प्रवाहित होने लगी और उनकी साड़ियों के अधोभाग भीग गये । यह श्रीकृष्ण के योग से होने वाले प्रेमभाव का लक्षण है । श्रीमद्भागवत (१.११.२६) में उल्लेख है कि जब कुरुक्षेत्र के युद्ध का अन्त होने पर श्रीकृष्ण ने द्वारका में प्रवेश किया तो उनकी दृष्टि सबसे पहले अपनी सब माताओं पर गई और उन्होंने तुरन्त उनके सादर चरणों में प्रणाम किया । माताओं ने भी श्रीकृष्ण को तत्क्षण अपने अंक में उठा लिया और वात्सल्य स्नेहवश उनके स्तनों से दूध बह चला । इस प्रकार अश्रुधारा के जल से मिश्रित उनके स्तनों का दुग्ध श्रीकृष्ण को प्रथम अर्पण हुआ । यह महाविरह के बाद तुष्टि का उदाहरण है। 'ललितमाधव' में एक अन्य वाक्य है—अहो ! कैसा आश्चर्य है कि नन्दगेहिनी यशोदा जी ने अपने वात्सल्यरस में अपने नेत्रजल और स्तन के दुग्ध के मिश्रण से पुत्र कृष्ण का स्नान कराया । 'विदग्धमाधव' में एक भक्त श्रीकृष्ण का सम्बोधन करते हुए कहता है, हे मुकुन्द ! तुम्हारे कमल की सुगन्ध से परिपूर्ण मुख की चन्द्रिका से आकृष्ट हुई यशोदा मैय्या प्रेम से अभिभूत हो गईं और तुरन्त उनके बड़े-बड़े स्तनों से दुग्ध
वत्सलभक्तिरस [ ३०६
झरने लगा।" इस प्रकार यशोदा मैय्या के स्तनों से श्रीकृष्ण के लिये निरन्तर दुग्ध की धारा बरसती रहती थी। ये सब श्रीकृष्ण के लिये उनकी माता, पिता, एवं अन्य गुरुजनों द्वारा अभिव्यक्त कतिपय वात्सल्य के भाव हैं। इनकी अभिव्यक्ति कृष्ण में पुत्रभाव करने पर होती है। श्रीकृष्ण के लिये निरन्तर वत्सलता का भाव वात्सल्यरस का स्थायिभाव है। श्रीरूप गोस्वामी का यहाँ उल्लेख है कि कतिपय विद्वानों के अनुसार अब तक वर्णित तीन प्रकार के दिव्य रस, अर्थात् दास्य, सख्य और वात्सल्य कभी-कभी परस्पर मिल जाते हैं। उदाहरण के लिये, बलराम का सख्य भाव दास्य और वात्सल्य स्नेह से मिश्रित है। इसी प्रकार श्रीकृष्ण के लिये युधिष्ठिर की रति में वात्सल्य, स्नेह और दास्य का मिश्रण है। इसी प्रकार श्रीकृष्ण के पितामह उग्रसेन में दास्य और वात्सल्य दोनों पाये जाते हैं। वृन्दावन की सारी वृद्धा गोपियों का भाव वात्सल्य, दास्य और सख्य का मिश्रण है। माद्री के पुत्रों अर्थात् नकुल, सहदेव और महर्षि नारद का स्नेह भी सख्य और दास्य का मिश्रण है। भगवान् शिव, गरुड़, और उद्धव के भाव में दास्य और सख्य, दोनों पाये जाते हैं।
अध्याय ४४ मधुरभक्तिरस मधुररति में श्रीकृष्ण के प्रति शुद्धभक्त के आकर्षण को भक्ति का मधुऱरस कहा जाता है। यद्यपि ऐसा मधुरभाव बिल्कुल भी प्राकृत नहीं होता, फिर भी इस दिव्य प्रेम और प्राकृत काम-क्रीड़ाओं में समानता सी लगती है। अतएव जो केवल लौकिक काम-क्रीड़ाओं में रुचि रखते हैं वे इस दिव्य प्रेम को नहीं समझ सकते । दिव्य भक्तिरस का यह विनिमय उन्हें बड़ा रहस्यमय प्रतीत होता है। यही कारण है कि श्रील रूपगोस्वामी मधुरभक्तिरस का अत्यन्त संक्षिप्त वर्णन करते हैं। मधुरभक्तिरस के आलम्बन हैं श्रीकृष्ण, राधारानी और उनकी नित्य सहचारी श्रीकृष्ण की प्रियाएँ। श्रीकृष्ण असमोर्ध्व हैं। उनके समान कोई नहीं है और न ही कोई उनसे अधिक है। भगवान् श्रीकृष्ण का सौन्दर्य भी असमोर्ध्व है; उसकी कोई तुलना नहीं। मधुररस की क्रीड़ा में सबसे बढ़कर होने के कारण वे ही सम्पूर्ण मधुररस के आलम्बन माने जाते हैं। जयदेव गोस्वामी के गीतगोविन्द में एक सखी किसी दूसरी से कहती हैं—"इस जगत् में श्रीकृष्ण सब आनन्द के रसराज हैं। उनकी देह कमल के समान अति कोमल है और गोपियों के साथ उनका आवास- व्यवहार किसी युवती के लिये किशोर के आकर्षण जैसा है।" यही दिव्य मधुररस का आलम्बन है। गोपियों के चरणचिह्नों की अनुगति करते हुए एक शुद्धभक्त उनसे प्रार्थना करता है—"आकर्षक अंग वाली गोपांगनाओं को सादर प्रणाम है, जो अपनी रूपमाधुरी से भगवान् श्रीकृष्ण का सेवन कर रही हैं।" इन सब गोपांगनाओं में श्रीमती राधारानी सबसे प्रमुख हैं। श्रीमती राधारानी के रूप का वर्णन इस प्रकार है, "उनके नेत्र चकोरी की चारुता को भी हरने वाले हैं। जब कोई राधारानी के मुख- मण्डल को देख लेता है तो तुरन्त चन्द्रमा के सौन्दर्य की निन्दा करने लगता है। उनके श्रीअंग की दीप्ति स्वर्ण को भी लजाने वाली है। इस
मधुरभक्तिरस [ ३११
प्रकार दिव्य सौन्दर्य से सुशोभित श्रीमती राधारानी को देखो ।'' राधा- रानी के लिये श्रीकृष्ण के आकर्षण को उन्होंने स्वयं व्यक्त किया है, “जब मैं श्रीमती राधारानी के सौन्दर्य का आस्वादन करने के लिये कुछ हास-परिहास करता हूँ तो राधारानी इन हास्य-वचनों को बड़े ध्यान से सुनती हैं। परन्तु अपने शरीर की अंग वृत्ति और कुछ अन्य कहकर बाहर ऐसा प्रकट करती हैं कि मानो वे मेरी बात को न सुन रही हों। उनके इस प्रकार मेरी उपेक्षा कर देने से मुझे अनन्त सुख मिलता है, इससे उनकी माधुरी इतनी बढ़ जाती है कि मेरा आनन्द शत् गुणा हो जाता है ।'' इसी प्रकार गीतगोविन्द में कहा है कि जब कंस के शत्रु श्रीकृष्ण राधारानी का आलिंगन करते हैं तो वे उनके प्रेम में बंध जाते हैं और अन्य सब गोपियों का संग छोड़ बैठते हैं। श्रील रूपगोस्वामी की पद्यावली के अनुसार जब गोपियाँ श्रीकृष्ण की वंशीध्वनि को सुनती हैं तो वे तुरन्त अपने गुरुजनों के रोष, अपकीर्ति और पतियों के कठोर व्यवहार को भुला देती हैं। वे केवल बाहर जाकर श्रीकृष्ण का अन्वेषण करने को आतुर हो उठती हैं। जब गोपियाँ श्रीकृष्ण से मिलती हैं तो परस्पर होने वाले कटाक्ष और स्मितादि अनुभाव कहे गये हैं। 'ललितमाधव' में रूपगोस्वामी ने वर्णन किया है कि श्रीकृष्ण का कटाक्ष ठीक यमुना जैसा है, और राधारानी की हँसी चन्द्रिका के समान है। जब यमुना और चन्द्रिका का संग होता है तो जल अमृत जैसा हो जाता है, उसे पीने से बड़ी तृप्ति होती है। वह हिम के समान शीतल और सब संतापों को हरने वाला होता है। इसी प्रकार पद्यावली में राधा की एक नित्य सहचरी कहती है, “हे चन्द्रमुखी राधे ! तेरा शरीर अत्यन्त पुलकित हो रहा है; आँखों में आनन्द के आँसू भर आये हैं, वाणी गद्गद हो रही है और छाती काँप रही है, इससे जान पड़ता है कि कृष्ण की मुरलीध्वनि की माधुरी ने तेरे चित्त को चंचल बना दिया है, द्रवित कर दिया है ।'' पद्यावली में ही प्रेम में होने वाले निर्वेद के भावों का वर्णन है, श्रीमती राधारानी कहने लगीं, “कामदेव ! मेरे ऊपर अपने पंचबाणों को चलाकर मुझे उत्तेजित न करो। हे वायु ! प्रगाढ़ मकरन्द रस से मेरी देह को मत भरो। श्रीकृष्ण की प्रेमभंगी से वंचित हो जाने के बाद अब इस देह को धारण करने का क्या लाभ ? जीव आज इस देह को धारण करना नहीं चाहता ।'' यह श्रीकृष्ण के प्रेम में उठने वाले निर्वेद भाव का लक्षण है।
३१२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु इसी प्रकार 'दानकेलिकौमुदी' में श्रीकृष्ण की ओर संकेत करते हुए श्रीमती राधारानी कहती हैं, “नीलकमल सी शोभा वाला यह वन- विहारी धूर्त त्रिभुवन की सारी युवतियों का आकर्षण कर सकता है। अपने दिव्य रस का आस्वाद दिलाकर इसने मुझे मदमस्त कर डाला है। मेरे धैर्य को भंग कर दिया है। अब मैं ठीक हाथी के मद से मदमस्त हुई हथिनी के समान अनुभव कर रही हूँ।" यह कृष्णप्रेम में हर्ष है। मधुरभक्तिरस का स्थायिभाव ही देह के सम्भोग का मूल कारण है। पद्यावली में सम्भोग के इस मूल कारण का वर्णन करते हुए राधा- रानी अपनी एक सहचरी से कहती हैं, “हे सखि ! यह कौन बालक है जिसकी निरन्तर थिरकती हुई भ्रू भंगिमा इसके मुख के सौन्दर्य को बढ़ाती हुई मुझमें माधुर्यरस का संचार कर रही है। कानों में अशोक की कलियों का कर्णफूल धारण किये हुए पीताम्बर से सुशोभित अपनी वंशी की ध्वनि से यह मुझे विवश किये दे रहा है।" श्रीराधाकृष्ण की मधुररति सजातीय अथवा विजातीय किसी भी प्रकार के भाव से कभी विच्छिन्न नहीं होती। श्रीराधाकृष्ण की मधुररति के इस निरन्तर अचल स्वभाव का वर्णन इस प्रकार है, “श्रीकृष्ण से थोड़ी ही दूर यशोदा मैया खड़ी थीं और चारों ओर से वे अपने सखाओं से घिरे हुए थे। उनके नेत्रों के आगे चन्द्रावली थी और उसी समय उन्हें व्रज के द्वार पर वृषभासुर खड़ा दिखा। परन्तु फिर भी जब उन्हें लताकुंज में राधारानी दृष्टिगोचर हुईं तो तत्क्षण उन्हीं के ऊपर विद्युत् के समान चंचल श्रीकृष्ण के कटाक्ष होने लगे।" एक अन्य प्रसंग का वर्णन इस प्रकार है, "प्रांगण में एक ओर शृगालों से घिरी हुई शंखासुर की मृतदेह पड़ी थी और दूसरी ओर बहुत से विद्वान् और संयमी ब्राह्मण थे। वे सब ग्रीष्म की शीतल मन्द-मन्द वायु के झकोरों के साथ सुन्दर स्तुतिपाठ कर रहे थे। श्रीकृष्ण के आगे सुधा- निधि बलदेव खड़े थे। परन्तु इन सब शीतल रूप विरुद्ध परिस्थितियों में भी राधारानी के लिये श्रीकृष्ण का प्रेमरूपी कमल म्लान नहीं हुआ। राधारानी के लिये श्रीकृष्ण के इस प्रेम को प्रायः प्रफुल्ल कमल की उपमा दी जाती है। अन्तर केवल इतना है कि श्रीकृष्ण का प्रेम नित्य नई सुन्दरता को धारण किये रहता है, सामान्य कमल की तरह मुरझाता नहीं। मधुरभक्ति सम्भोग और विप्रलम्भ—दो प्रकार की मानी जाती है। विप्रलम्भ के तीन विभेद हैं—पूर्वराग, मान और प्रवास । पहले कभी जिनका मिलन नहीं हुआ है, इस प्रकार के प्रिय और
मधुरभक्तिरस [ ३१३ प्रिया में होने वाले भाव को पूर्वराग कहते हैं। पद्यावली में राधारानी अपनी सखी से कहती हैं, “हे सखि ! यमुना तट पर जाते हुए अकस्मात् मेरी दृष्टि के आगे नवचन्दन वर्ण श्यामल बालक आ गया। उसने मेरी ओर ऐसे देखा जिसका मैं वर्णन नहीं कर सकती। परन्तु इसके बाद अब मेरा मन घर के काम-काज में बिल्कुल नहीं लगता।” यह श्रीकृष्ण के लिये पूर्वराग का उदाहरण है। श्रीमद्भागवत (१०.५३.२) में श्रीकृष्ण ने रुक्मिणीदेवी के पास से आये ब्राह्मण दूत से कहा है, “हे ब्राह्मण ! रुक्मिणी के समान मैं भी रात भर सो नहीं पाता। मेरा मन निरन्तर उसी में लगा रहता है। मैं जानता हूँ कि उसका भाई रुक्मी मेरे विरुद्ध है और उसी के कहने-सुनने से रुक्मिणी से मेरे विवाह को रोक दिया गया है।” यह भी पूर्वराग का लक्षण है। मान के सम्बन्ध में गीतगोविन्द में निम्नलिखित प्रसंग हैं, “जब श्रीमती राधारानी ने देखा कि श्रीकृष्ण अन्य अनेक गोपियों के संग का आनन्द ले रहे हैं तो अपने उत्कर्ष के नष्ट हो जाने के कारण उन्हें कुछ ईर्ष्या हो आई। इसलिये वे वहाँ से हटकर भ्रमरों से गुंजायमान लता मंडप में जा बैठीं और वहाँ लताओं में छिपकर एक सखी से अपनी मनोव्यथा को कहने लगीं।” यह मान का उदाहरण है। प्रवास का दृष्टान्त पद्यावली में इस प्रकार है—“हथेली के ऊपर सिर को रखकर निरन्तर आँसू बहाते हुए जिसका मुख भीग रहा है, उस कमलनयनी राधा को कृष्ण के मथुरा चले जाने के दिन से लेकर आज तक क्षणभर को भी निद्रा नहीं आई।” मुख के भीग जाने पर निद्रा का लोप हो जाता है; अतएव श्रीकृष्ण के विरह में निरन्तर रोते रहने से राधारानी के लिये सोने का प्रश्न ही नहीं बनता। 'प्रह्लादसंहिता' में उद्धव कहते हैं, “कामदेव के बाणों से पीड़ित होकर भगवान् गोविन्द रात-दिन तुम गोपियों का ही चिन्तन करते हुए न खाते-पीते हैं और न सो पाते हैं।” जब प्रेमी और प्रियतम मिलकर प्रत्यक्ष संग में एक-दूसरे का आनन्द लेते हैं तो उसे सम्भोग कहा जाता है। पद्यावली में उल्लेख है, “श्रीकृष्ण ने श्रीमती राधारानी का ऐसी विदग्धता से आलिंगन किया, मानो वे मदन महोत्सव मना रहे हों।” इस प्रकार श्रील रूपगोस्वामी अपने 'भक्तिरसामृतसिन्धु' के दक्षिण विभाग की पाँचवी लहरी को समाप्त करते हैं। उनका सनातनस्वरूप भगवान् गोपाल को सादर प्रणाम है। इति भक्तिरसामृतसिन्धौ मुख्य भक्तिरस निरुपणनामा पश्चिमो विभागः ॥ इति भक्तिवेदान्त भाष्ये पश्चिमो विभागः ॥३॥
अथ उत्तर विभागः गौणभक्तिरस
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अध्याय ४५ हास्यभक्तिरस 'भक्तिरसामृतसिन्धु' के चौथे विभाग में श्रील रूपगोस्वामी ने हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, भयानक तथा बीभत्स—इन सात गौण भक्तिरसों का विवरण दिया है। इन भक्तिरसों का वर्णन करते हुए उन्होंने विविध भावों की परस्पर मैत्री-वैर की स्थिति और रसाभासों का भी वर्णन किया है। जब एक प्रकार का भक्तिरस विरुद्ध विधि से किसी दूसरे रस से मिल जाये तो ऐसी स्थिति को रसाभास कहते हैं। दक्ष विद्वान् कहते हैं कि हास्यरस प्रायः युवकों में अथवा वृद्धों और शिशुओं के समूहों में पाया जाता है। कभी-कभी अत्यन्त गम्भीर स्वभाव वालों में भी यह दृष्टिगोचर होता है। एक बार एक वृद्ध व्यापारी यशोदा मैया के द्वार पर पहुँचा तो श्रीकृष्ण ने यशोदा मैया से कहा, "मैया ! मैं इस सड़ी हुई आकृति वाले भयंकर बूढ़े के पास नहीं जाना चाहता। यदि मैं इसके पास जाऊँ तो यह मुझे अपनी पिटारी में बन्द करके तुमसे दूर ले जायगा।" इस प्रकार आश्चर्यमय कृष्ण अपनी माता की ओर देखने लगे जबकि द्वार पर खड़ा हुआ वह पथिक रोकने पर भी अपनी हँसी को नहीं दबा सका, अर्थात् हँस ही पड़ा। इस दृष्टान्त में स्वयं श्रीकृष्ण हास्यरस के आलम्बन हैं। श्रीकृष्ण के एक सखा ने उन्हें सूचित किया, "श्रीकृष्ण मुख खोलो, मैं तुम्हें दही-बूरा खिलाता हूँ।" श्रीकृष्ण ने तुरन्त अपना मुख खोल दिया; परन्तु दही-बूरा के स्थान पर मित्र ने उनके मुख में एक फूल डाल दिया। जब श्रीकृष्ण ने उसे चखा तो अपने मुख को सिकोड़ कर मोड़ लिया यह देखकर वहाँ खड़े उनके सखा बड़े उच्च स्वर से हँसने लगे। एक बार घर आये ज्योतिषी से नन्द महाराज ने पूछा, "हे महर्षि ! कृपया मेरे बालक का हाथ देखिये। मुझे बताइये कि यह कितने वर्ष तक जीवित रहेगा और क्या हजारों गायों का स्वामी बन पायेगा।" यह
हास्यभक्तिरस [ ३१७
सुनकर ज्योतिषी हँसने लगा तो नन्द महाराज ने उनसे पूछा, “श्रीमान् आप हँसते हुए अपने मुख को छिपा क्यों रहे हैं।” इस प्रकार के हास्यरस में श्रीकृष्ण की वेशभूषा और चरित आदि उद्दीपन विभाव हैं। नाक, होंठ तथा गालों का फड़कना आदि अनुभाव तथा हर्ष, आलस्य, गोपन आदि व्यभिचारिभाव हैं। श्रील रूपगोस्वामी की गणना के अनुसार हास्यरति छः प्रकार की होती है—स्मित, हसित, विहसित, अवहसित, अपहसित, अतिहसित। इनमें से स्मित, हसित और विहसित मुख्य भेद हैं और अवहसित, अपहसित और अतिहसित गौण भेद हैं। जिस हँसी में दाँत न दिखलाई दें और नेत्रों तथा गालों का निश्चित विकास हो उसे स्मित कहते हैं। जब श्रीकृष्ण जरती के घर में दही चुरा रहे थे तो उसे उनकी क्रिया का भास हो गया और वह जल्दी-जल्दी उन्हें पकड़ने के लिए आने लगी। उस समय जरती से अत्यधिक भयभीत होकर श्रीकृष्ण अपने अग्रज बलदेव के पास गये। वे बोले, “हे भ्राता! मैंने दही की चोरी की है। देखो-देखो जरती शीघ्रता से मुझे पकड़ने आ रही है।” इस प्रकार पीछे आ रही जरती के भय से श्रीकृष्ण का बलदेव की शरण में जाना देखकर स्वर्ग के सब महर्षि गण हँसने लगे। उनकी इस हँसी को स्मित कहते हैं। जिस हँसी में दाँत थोड़े-थोड़े दिखाई देने लगें उसे हसित कहते हैं। एक दिन जब राधारानी का तथाकथित पति अभिमन्यु घर को लौट रहा था तो उसने देखा कि श्रीकृष्ण उसके घर में हैं। श्रीकृष्ण ने तुरन्त अभि- मन्यु का सा भेष बना लिया और अभिमन्यु की माँ जटिला के पास जाकर कहने लगे, “हे माता! मैं तुम्हारा असली पुत्र अभिमन्यु हूँ। देखो-देखो कृष्ण ठीक मेरा वेश बनाकर तुम्हारे पास आ रहा है।” जटिला को तुरन्त विश्वास हो गया कि यही उसका असली पुत्र है और इसलिये घर आते हुए अपने वास्तविक पुत्र पर वे बड़ी क्रुद्ध हुई। वह उसे बाहर भगा रही थी और वह पुकार रहा था, “माँ, माँ! तुम यह क्या कर रही हो?” यह देखकर वहाँ उपस्थित राधारानी की सब सखियाँ हँसने लगीं और उनके दाँत थोड़े दिखाई दिये। यह हसित का उदाहरण है। जिस हँसी में दाँत स्पष्ट दिखाई दें उसे विहसित कहते हैं। एक दिन जब श्रीकृष्ण जटिला के घर में दही-मक्खन की चोरी कर रहे थे तो उन्होंने अपने सखाओं को आश्वस्त करते हुए कहा, “हे सखाओ! यह बुढ़िया इस समय बड़ी-बड़ी गहरी साँसें लेती हुई सो रही है। इसलिए
३ १८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु आओ बिना कोई उत्पात किये चुपचाप दही-मक्खन की चोरी करें।" परन्तु वह बुढ़िया जटिला सोई नहीं थी । वह चुपचाप लेटी हुई थी। ऐसे में वह अपनी हँसी को नहीं रोक सकी और उसके दाँत बिल्कुल स्पष्ट दिखने लगे । यह विहसित हँसी है। जिसमें नाक फूल जाये और आँखें बन्द हो जायें, इस प्रकार की हँसी को अवहसित कहते हैं। एक दिन प्रातःकाल जब श्रीकृष्ण रासलीला रचा कर घर लौट रहे थे तो उनके मुखमण्डल को देखकर यशोदा मैया कहने लगीं, "हे पुत्र ! तेरी आँखों में इतना धातुराग क्यों लग रहा है ? क्या तूने बलदेव की वेशभूषा तो धारण नहीं कर ली है ?" जब यशोदा मैया श्रीकृष्ण से इस प्रकार कह रही थीं तो निकट खड़ी गोपांगना जोर-जोर से हँसने लगी । उसकी नाक फूल गई और आँखें बन्द हो गईं । यह अवहसित हँसी है। गोपी जानती थी कि श्रीकृष्ण रासलीला का आनन्द ले रहे थे । यशोदा मैया को अपने पुत्र की इन क्रियाओं का पता नहीं था, इसीलिये वे यह न जान पाईं कि उसके मुख पर गोपियों का अंगराग लगा हुआ है। जिस हँसी में आँखों से आँसू आ जायें और कन्धे हिलने लगें उसे अपहसित कहते हैं । जरती की धुन पर बालकृष्ण को नाचता देखकर नारद को बड़ा आश्चर्य हुआ । जो श्रीभगवान् ब्रह्मा आदि देवताओं को नचाते हैं वे ही अब एक वृद्धा दासी के संकेत के अनुसार नाच रहे हैं। इस आनन्द को देखकर नारदजी भी नाचने लगे; उनके कन्धे काँपने लगे और नेत्र चपल हो उठे । हँसी के कारण उनके दाँत भी फूट पड़े । इस प्रकार : उनके दाँतों से निकली ज्योति से आकाश के बादल सुप्रभ हो गए । जब कोई हँसते हुए ताली बजा-बजाकर हवा में कूदता है तो उसे अतिहसित कहते हैं। इसका प्रदर्शन निम्नलिखित प्रसंग में है। श्रीकृष्ण ने जरती से कहा, "हे भद्रे ! तुम्हारी त्वचा पर झुर्रियाँ पड़ जाने के कारण तुम्हारा मुख अब बिल्कुल बन्दरों के समान हो गया है। अतएव बन्दरों के राजा बलिमुख ने तुम्हें अपनी जीवन-संगिनी बनाने का निश्चय किया है।" जिस समय श्रीकृष्ण जरती को इस प्रकार चिढ़ा रहे थे, उसने उत्तर दिया कि वह पहले ही निश्चित कर चुकी है कि नाना प्रकार के बलि असुरों का नाश करने वाले श्रीकृष्ण को छोड़कर और किसी से विवाह नहीं करेगी।" वातुल जरती के इस परिहास को सुनकर वहाँ खड़ी सब गोपांगनाएँ हाथ बजा-बजा कर जोर-जोर से हँसने लगीं। इसी का नाम 'अतिहसित' है। कभी-कभी अप्रत्यक्ष रूप से हँसाने वाले वाक्यों से भी अतिहसित
की परिस्थिति उपस्थित हो जाती है । इसी प्रकार का एक वाक्य गोपांग- नाओं ने राधारानी के तथाकथित पति अभिमन्यु की बहन (जटिला की पुत्री) कुटिला से कहा था। यह वाक्य परोक्ष रूप से कुटिला को अपमानित करने वाला था। 'हे कुटिले ! जटिलापुत्री ! तेरे स्तन लौकी के समान लटक गये हैं; नाक की आकृति मेढकी के समान मालूम होती है; दृष्टि की शोभा कुतिया को लजाने वाली है, अधर जलते हुए कोयले को लजा रहे हैं और पेट मृदंग के समान बड़ा है। इसलिये हे सुन्दरी कुटिले ! तू वृन्दा- वन की सब गोपांगनाओं में सर्वोत्कर्षमयी है। तेरी इसी असाधारण सुन्दरता के कारण श्रीकृष्ण की वंशीध्वनि में इतनी सामर्थ्य नहीं कि वह तेरा आकर्षण कर सके।"
अध्याय ४६ अद्भुतभक्तिरस और वीरभक्तिरस अद्भुतभक्तिरस अद्भुतभक्तिरस की अनुभूति दो प्रकार से होती है—प्रत्यक्ष रूप से अपनी आँखों के अनुभव के द्वारा और परोक्ष रूप से दूसरों से सुनकर । जब नारदजी द्वारका में भगवान् की लीलाओं को देखने आये तो उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण उसी रूप में अनेक महलों में विराजमान हैं और नाना क्रियाएँ कर रहे हैं। यह सब देखकर वे आश्चर्यचकित रह गये । यह साक्षात् अद्भुतभक्तिरस का उदाहरण है। यशोदा मैया की एक सखी ने कहा, "हे यशोधरे ! जरा इस आनन्द को तो देखो ! एक ओर तो तुम्हारा नन्हा सा बालक है जो सदा तुम्हारा स्तनपान करने को मुग्ध रहता है और दूसरी ओर यह विशाल गोवर्धन पर्वत है जो गगन को छू रहा है। फिर भी देखो कैसा आश्चर्य है कि यह महान् गोवर्धन तुम्हारे पुत्र के नन्हे हाथ की उँगली पर ठहरा हुआ है, मानो कोई खिलौना हो। क्या यह महान् विस्मय की बात नहीं है ?" यह भी साक्षात् अद्भुतभक्तिरस का दृष्टान्त है। परोक्ष अद्भुतभक्तिरस का अनुभव महाराज परीक्षित को हुआ जब उन्होंने शुकदेव गोस्वामी के मुख से श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध का वर्णन सुना, जो ग्यारह अक्षौहिणी सेना के साथ श्रीकृष्ण के साथ युद्ध कर रहा था। एक अक्षौहिणी सेना में हजारों हाथी, हजारों घोड़े और रथ तथा लाखों सैनिक रहते हैं। नरकासुर के पास ऐसी ग्यारह अक्षौहिणी सेना थी और वे सब श्रीकृष्ण पर बाण चला रहे थे। परन्तु फिर भी श्रीकृष्ण ने अपनी ओर से केवल तीन बाण चलाकर उन सबका नाश कर दिया। जब महाराज परीक्षित ने इस अद्भुत विजय को सुना तो वे तुरन्त अपने नेत्रों से विगलित अश्रुधारा को पोंछते हुए हर्षातिरेक में मग्न हो गये। यह सुनने से होने वाला परोक्ष अद्भुतभक्तिरस है।
अद्भुतभक्तिरस और वीरभक्तिरस [ ३२१ परोक्ष अद्भुत भक्तिरस का एक अन्य उदाहरण इस प्रकार है— यह परीक्षा कर देखने के लिये कि क्या श्रीकृष्ण वास्तव में भगवान् हैं, ब्रह्माजी ने उनके सारे गोपबालकों और गायों को चुरा लिया। परन्तु कुछ ही क्षण बाद उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण अब भी अपने सब गोपबालकों, गायों और बछड़ों के साथ ठीक पहले के ही समान क्रीड़ा कर रहे हैं। जब उन्होंने अपने सत्यलोकवासियों को यह घटना सुनाई तो वे सब के सब चकित रह गये। ब्रह्मा ने बताया कि बालकों का हरण करने पर भी उन्होंने श्रीकृष्ण को फिर उसी प्रकार उन्हीं बालकों के साथ खेलते हुए देखा है। उनके शरीर का वर्ण प्रायः श्रीकृष्ण के जैसा श्यामल था। वे सब चतुर्भुजधारी थे। वे ही सब बछड़े और गायें पहले की भाँति वहाँ थे। इस घटना का वर्णन करते-करते ब्रह्मा प्रायः आप्यायित हो गये और आगे कहने लगे कि सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि अन्य अनेक ब्रह्माण्डों से भिन्न-भिन्न ब्रह्मा वहाँ श्रीकृष्ण और उनके पार्षदों की आराधना के लिये आए हुए थे। इसी प्रकार जब भाण्डीर वन में आग लगी तो श्रीकृष्ण ने अपने सखाओं को अपनी-अपनी आँखें मींच लेने की आज्ञा दी। फिर जब श्रीकृष्ण ने अग्नि को बुझा दिया और गोपबालकों ने अपनी आँखें खोलीं तो देखा कि वे अग्नि के भय से बच गये हैं, उनका गोधन और बछड़े सब सुरक्षित हैं। श्रीकृष्ण द्वारा अपनी रक्षा हुई देखकर वे आश्चर्य में भर गये। यह भी अद्भुतभक्तिरस की अनुभूति का उदाहरण है। जो हृदय को प्रिय हो उसकी तनिक सी असाधारण क्रिया भी विस्मय को उत्पन्न करने वाली होती है। परन्तु अप्रिय की एकदम अलौकिक क्रिया भी विस्मय को जन्म नहीं देती। प्रेम के कारण ही किसी अद्भुत क्रिया की मन पर छाप पड़ती है। वीरभक्तिरस जब भगवान् के लिये प्रेम और भक्ति के कारण एक विशेष प्रकार का वीरतापूर्ण उत्साह होता है तो परिणाम में होने वाली क्रियाओं को वीररस कहते हैं। उनकी अभिव्यक्ति युद्धवीरता, कामवीरता, दयावीरता और धर्मवीरता—इन चार रूपों में होती है। इन सब प्रकार की वीररस की क्रियाओं के श्रीकृष्ण आलम्बन हैं। जब कोई सखा किसी वीररस की क्रिया से श्रीकृष्ण को संतुष्ट करना चाहता है तो श्रीकृष्ण को विरोधी समझ कर वह स्वयं उन्हें चुनौती
३२२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु देता है। अथवा श्रीकृष्ण स्वयं तो ऐसे युद्ध को देखते हैं और उनकी इच्छा से अन्य सखा विरोधी की भूमिका निभाता है। किसी सखा ने एक बार श्रीकृष्ण को चुनौती देते हुए कहा, "हे माधव ! तुमको अपने कभी न हारने का बड़ा अभिमान हो चला है। परन्तु यदि तुम यहाँ से भागो नहीं तो मैं तुमको हरा कर दिखा दूँगा और इससे मेरे सब मित्रों को बड़ा सन्तोष होगा।" श्रीकृष्ण और श्रीदामा बड़े अन्तरंग सखा थे। फिर भी श्रीदामा ने क्रोधवश उन्हें ललकारा। जब वे दोनों आपस में लड़ने लगे तो यमुना तट पर खड़े अन्य सखाओं ने दो मित्रों में होने वाले इस अद्भुत युद्ध का आनन्द लिया। वे युद्ध-अभिनय के लिये कुछ बाण बनाने लगे और श्रीकृष्ण उन्हें श्रीदामा के ऊपर छोड़ने लगे। श्रीदामा अपनी लाठी को घुमा- घुमाकर उन बाणों को बचाता और इस प्रकार श्रीदामा की वीररसमयी क्रियाओं से श्रीकृष्ण को बड़ा आनन्द हुआ। ऐसा युद्ध प्रायः वीरपुरुषों में हुआ करता है जिससे सब देखने वालों को बड़ी अद्भुत उत्तेजना होती है। 'हरिवंश' में उल्लेख है कि कभी-कभी जब कुन्ती की उपस्थिति में अर्जुन और श्रीकृष्ण आपस में लड़ते तो अर्जुन श्रीकृष्ण से परास्त हो जाता। मित्रों में होने वाले इस प्रकार के वीर युद्धों में कभी-कभी आत्म- श्लाघा, ताल ठोकना, गर्व, बल, अस्त्रों का उठाना, पैंतरे बाजी, एक दूसरे को ललकारना आदि होते हैं। ये सब वीरभक्तिरस के उद्दीपन हैं। एक मित्र ने श्रीकृष्ण को चुनौती दी, "हे सखे दामोदर ! तुम केवल खाने में ही कुशल हो। तुमने छल से दुर्बल सुबल को हरा दिया, इसमें कौन बड़ी बात है। इस आधार पर अपने को वीर योद्धा घोषित न करो। तुमने अपने को सर्प बताया है और मैं मोर हूँ; इसलिए तुम्हें अवश्य परास्त कर दूँगा।" मोर सर्प का सबसे शक्तिशाली शत्रु है। सखाओं में होने वाले इस प्रकार के युद्ध में आत्मश्लाघा को विद्वानों ने अनुभाव बतलाया है। पैंतरा बदलना, अकेले होने पर भी युद्ध की इच्छा तथा युद्ध से न भागना, ये सब वीररस की क्रियाएँ भी अनुभाव हैं। एक मित्र श्रीकृष्ण से बोला, 'हे मधुसूदन ! तुम मेरे बल-पराक्रम को जानते हो; फिर भी तुम बलशाली बलदेव को चुनौती देने के लिये भद्रसेन को उत्साहित कर रहे हो, मुझे नहीं। इससे मेरा अपमान हुआ है। मेरी भुजाएँ अर्गला की प्रतिद्वन्द्वी हैं।"
अद्भुतभक्तिरस और वीरभक्तिरस [३२३ एक भक्त बोला, “हे कृष्ण ! मेघगर्जन और सिंहनाद जैसी वीररस की क्रियाओं के लिये तुम्हारा प्रतिद्वन्द्वी श्रीदामा सर्वोत्कर्षशाली है।” युद्ध, दान, दया और धर्म सम्बन्धी वीररस की क्रियाओं को सात्त्विक कहते हैं जबकि गर्व, भावुकता, वृत्ति, घृणा, मति, हर्ष, उत्साह, अमर्ष, असूया, और स्मृति आदि व्यभिचारिभाव हैं। जब स्तोककृष्ण नामक श्रीकृष्ण का एक सखा उनसे लड़ रहा था तो उसके पिता ने श्रीकृष्ण से लड़ने के लिये उसे डाँटा; श्रीकृष्ण सम्पूर्ण व्रजवासियों के जीवन-प्राण जो ठहरे। पिता की डाँट को सुनकर स्तोककृष्ण ने लड़ना छोड़ दिया । परन्तु श्रीकृष्ण उसे चुनौती देते रहे; इसलिये इस ललकार का मुकाबला करने के लिये स्तोककृष्ण ने अपनी लाठी पकड़ कर और फिर उसे घुमा-घुमाकर अपनी दक्षता का परिचय दिया । एक बार भद्रसेन को ललकार कर श्रीदामा बोला, “हे सखे ! तुम्हें अभी मुझसे कोई भय नहीं होना चाहिये। पहले बलराम को हराकर, श्रीकृष्ण को पीटकर ही मैं तुम्हारे सामने आऊँगा।” यह कहकर भद्रसेन बलराम के दल को छोड़कर श्रीकृष्ण के साथ हो गया । इससे उसके मित्रों को उतना ही क्षोभ हुआ जैसे मन्दराचल से मथे जाने पर समुद्र को हुआ था। अपने गम्भीर गर्जन से उसने अपने सब सखाओं को बहरा कर दिया और श्रीकृष्ण को अपनी वीर क्रियाओं से आह्लादित किया । एक समय श्रीकृष्ण ने अपने सब मित्रों को चुनौती देते हुए कहा “हे सखाओ ! देखो-देखो मैं महान् वीरता के साथ कूद रहा हूँ; इसलिये, यहाँ से भागो मत ।” इन चुनौती भरे शब्दों को सुनकर वरूथप नामक सखा श्रीकृष्ण की ललकार को स्वीकार करते हुए उनसे भिड़ गया । एक सखा बोला, “श्रीदामा दामोदर को हारा देखने के लिये पूरा प्रयास कर रहा है। मैं समझता हूँ कि यदि हमारा शक्तिशाली सुबल उसके साथ हो जाए तो फिर दोनों की जोड़ी रत्नजड़ित स्वर्ण जैसी मनोहर लगेगी।” इन वीररस की क्रियाओं में श्रीकृष्ण के सखा ही प्रतिद्वन्द्वी हो सकते हैं। श्रीकृष्ण के शत्रु वास्तव में उनका विरोध कभी नहीं कर सकते। अत- एव श्रीकृष्ण के सखाओं का उन्हें इस प्रकार चुनौती देना वीरभक्तिरस कहलाता है। दानवीर दो प्रकार के होते हैं—उदार और त्यागी । जो श्रीकृष्ण के सुख के लिये सर्वस्व त्याग कर सकता है उसे उदार कहते हैं। जब कोई श्रीकृष्ण को देखकर त्याग करने की इच्छा करता है तो श्रीकृष्ण उस दान-
३२४ ] भक्त्तिरसामृतसिन्धु क्रिया के उद्दीपन माने जाते हैं। जब श्रीकृष्ण उनके घर पुत्र रूप से अव- तरित हुए तो नन्द महाराज ने शुद्धभाव से अपने पुत्र के लिये सम्पूर्ण मंगल की कामना की। वे सब ब्राह्मणों को मूल्यवान गायों का दान देने लगे। इस दानक्रिया से ब्राह्मण इतने सन्तुष्ट हुए कि उन्हें कहना पड़ा कि नन्द महाराज ने अपने दान से महाराज पृथु और नृग जैसे पूर्ववर्ती उदार राजाओं को भी हरा दिया। जब कोई भगवान् की कीर्ति को पूर्णरूप से जानता है और इस लिये उनके लिये सर्वस्व अर्पण करने को तैयार रहता है तो उसे सम्प्रदानक कहते हैं। जिस समय महाराज युधिष्ठिर राजसूय मण्डलयज्ञ में श्रीकृष्ण के साथ जा रहे थे तो वे मन ही मन श्रीकृष्ण के शरीर में चन्दन का आलेप करने लगे और गले में अजानुलम्बित माला सुशोभित करने लगे। उन्होंने श्रीकृष्ण को सोने की कसीदाकारी से युक्त वस्त्रालंकार पहनाए और नाना रत्नों से विभूषित अलंकारों से अलंकृत किया। श्रीकृष्ण को बहुत से सुसज्जित हाथी, घोड़े और रथ भी दिए। उन्होंने आगे श्रीकृष्ण को अपने सारे राज्य, अपने परिवार और स्वयं अपनी आत्मा तक का दान करने का संकल्प किया। ऐसा करने के बाद जब उन्होंने पाया कि वास्तव में श्रीकृष्ण को दान देने के लिये ऐसा कुछ भी नहीं है तो महाराज युधिष्ठिर अत्यन्त उद्विग्न और व्याकुल हो उठे। इसी प्रकार महाराज बलि ने एक समय अपने पुरोहित शुक्राचार्य से कहा था, "हे ऋषे ! आप वेदों के ज्ञान में पूर्ण निष्णात् हैं और इसलिए वैदिक कर्मकाण्ड के द्वारा भगवान् विष्णु की आराधना करते हैं। जहाँ तक इन वामन देव ब्राह्मण का सम्बन्ध है; ये चाहे स्वयं भगवान् विष्णु हों, कोई साधारण ब्राह्मण हों अथवा मेरे शत्रु ही क्यों न हों, मैंने संकल्प कर लिया है कि इनके द्वारा माँगी गई सारी भूमि इन्हें अवश्य दूंगा।" महा- राज बलि इतने भाग्यवान् थे कि भगवान् ने उनके आगे अपने उसी हाथ को फैलाया जो लक्ष्मीदेवी के कुंकुम उपलिप्त वक्षःस्थल के स्पर्श से लाल सा हो गया। भाव यह है कि यद्यपि श्रीभगवान् की ऐसी अपार महिमा है कि साक्षात् लक्ष्मीदेवी उन्हें आनन्द प्रदान करने के लिये उनके आधीन रहती हैं; फिर भी उन्होंने बलि महाराज से दान लेने के लिये अपना हाथ फैलाया। जो पुरुष श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व दान करना चाहता है, परन्तु बदले में कुछ नहीं चाहता वह सच्चा त्यागी समझा जाता है। अतएव
अद्भुतभक्तिरस और वीरभक्तिरस [ ३२५ स्वयं भगवान् द्वारा दिये जाने पर भी भक्त मुक्ति को भी नहीं लेता। कृष्णप्रेम का वास्तविक प्रकाश तभी होता है जब श्रीकृष्ण दान को लेने वाले बन जाते हैं और भक्त दान देने वाला बन जाता है। 'हरिभक्तिसुधोदय' में ध्रुव महाराज का एक अन्य उदाहरण है। वे कहते हैं, "हे स्वामिन् ! मैं आपसे किसी अभिलाषा को लेकर तप-त्याग के अध्यात्म में प्रवृत्त हुआ था। परन्तु इसके बदले में आपने मुझे अपना मुनि- दुर्लभ दर्शन प्रदान किया है। मैं केवल कुछ काँच के टूटे टुकड़े ढूँढ रहा था। परन्तु उसके स्थान पर मुझे अमूल्य रत्न मिल गया। अतएव अब मैं पूर्ण सन्तुष्ट हो चुका हूँ। हे नाथ ! मुझे अब आपसे और कुछ नहीं चाहिये।" इसी के अनुरूप श्रीमद्भागवत (३.१५.४८) में उल्लेख हैं—'सनक आदि चारों कुमार भगवान् को सम्बोधन करते हुए कहते हैं, "हे भगवन् ! आपकी निर्मल कीर्ति बड़ी आकर्षक है; अतएव आपकी ही कीर्ति गान के योग्य है और वास्तव में आप ही सम्पूर्ण तीर्थों के निवास हैं। सौभाग्य- शाली पुरुष आपका गुणगान किया करते हैं और वास्तव में आपके दिव्य स्वरूप को जानते हैं; वे आपके द्वारा दी हुई मुक्ति की भी परवाह नहीं करते। उन्हें दिव्य महानिधि प्राप्त हो जाती है, इसलिये वे देवराज इन्द्र का स्थान भी नहीं चाहते। वे जानते हैं कि स्वर्ग का आसन भी भय से खाली नहीं है, जबकि जो केवल आपकी दिव्य कीर्ति के गान में लगे रहते हैं उनके लिये केवल आनन्द और निर्भयता रहती है। ऐसे में इस प्रकार के ज्ञानी पुरुष स्वर्ग के सिंहासन के प्रति आकृष्ट क्यों हों?" एक भक्त ने राजा मयूरध्वज की दानपरायणता पर अपने भाव को इस प्रकार व्यक्त किया है, "जिनकी दान-परायणता का वर्णन करना भी मेरे लिए असम्भव है उन राजा मयूरध्वज को सादर प्रणाम है।" मयूर- ध्वज बड़े बुद्धिमान् थे; अतएव एक समय जब श्रीकृष्ण ब्राह्मण रूप में उनके पास गये तो वे उनका प्रयोजन समझ गये। श्रीकृष्ण ने उनसे उनकी देह का आधा भाग माँगा। यह भी कहा कि स्वयं पत्नी और पुत्र उनके शरीर को काटें। राजा मयूरध्वज ने इसको मान लिया। अपने प्रगाढ़ भक्तिभाव के कारण वे निरन्तर श्रीकृष्ण के चिन्तन में निमग्न रहते थे। इसलिये जब उन्होंने जाना कि श्रीकृष्ण स्वयं ब्राह्मण रूप में आये हैं तो अपनी देह का आधा भाग देने में तनिक भी संकोच न किया। श्रीकृष्ण के लिये महाराज मयूरध्वज का यह त्याग जगत् में अद्वितीय है। अतएव हमें उनकी सादर वन्दना करनी चाहिये। उन्हें ब्राह्मण रूपधारी भगवान् का पूर्ण ज्ञान था और वे पूर्ण दानवीर कहलाते हैं।
३२६] भक्तिरसामृतसिन्धु जो पुरुष निरन्तर भक्तियोग के आचरण में बहुत कुशल हों उन्हें धर्म- वीर कहा जाता है। धर्मानुष्ठान में लगे उत्तम भक्त ही इस धर्मवीर श्रेणी में आ सकते हैं। प्रामाणिक शास्त्रों के अध्ययन, नीति के पालन, श्रद्धाभाव, सहिष्णुता और इन्द्रियसंयम के द्वारा धर्मवीर बना जा सकता है। जो पुरुष श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिये धर्मानुष्ठान करते हैं वे भक्ति- योग में स्थिर रहते हैं, जबकि दूसरे जो श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने की इच्छा के बिना धर्मानुष्ठान करते हैं वे केवल पुण्यात्मा कहलाते हैं। धर्मवीरता के सर्वोत्तम प्रतीक महाराज युधिष्ठिर हैं। एक भक्त ने श्रीकृष्ण से कहा है, "हे कृष्ण ! हे दनुज-दमन ! महाराज पाण्डु के ज्येष्ठ पुत्र महाराज युधिष्ठिर ने आपकी प्रसन्नता के लिये नाना प्रकार के सब यज्ञों का आयोजन किया है। उनमें भाग लेने के लिये वे निरन्तर स्वर्ग के देवता इन्द्र का आह्वान किया करते हैं। इन्द्र की स्वर्ग से अनुपस्थिति में शची देवी प्रायः अपना समय कपोल को हथेली पर धारण किये हुए बिताती हैं।" देवताओं के लिये नाना यज्ञ करना श्रीभगवान् के अंगों की आराधना करना है। देवताओं को विष्णुरूपधारी भगवान् के नाना अंग माना जाता है। इसलिये उनकी आराधना का अंतिम प्रयोजन अंगों की उपासना से साक्षात् श्रीभगवान् को प्रसन्न करना हो है। महाराज युधिष्ठिर की ऐसी कोई लौकिक इच्छा नहीं थी। उन्होंने सब यज्ञों का अनुष्ठान साक्षात् श्रीकृष्ण के निर्देशानुसार किया। वे उनसे कोई निजी लाभ नहीं उठाना चाहते थे। उनकी एकमात्र इच्छा श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने की थी। अतएव वे भक्तों के शिरोमणि माने गये। युधिष्ठिरजी वास्तव में निरन्तर प्रेममयी भक्ति के सागर में निमग्न रहते थे।
अध्याय ४७ करुणभक्तिरस और रौद्रभक्तिरस करुणभक्तिरस जब भक्तिभाव के कारण कृष्ण के सम्बन्ध में किसी प्रकार की शोकरति की उत्पत्ति हो तो उसे करुणभक्तिरस कहते हैं। इस भक्तिरस का उद्दीपन हैं श्रीकृष्ण के दिव्य गुण, रूप, लीला आदि । इस भक्तिरस में कभी-कभी शोक करना, भारी साँस लेना, रोना, भूमि पर गिर पड़ना और छाती पीटना आदि अनुभाव होते हैं। कभी-कभी आलस्य, निर्वेद, अपयश, दैन्य, चिन्ता, विषाद, ग्लानि, उत्सुकता, चपलता, उन्माद, विस्मृति, मरण, मोह और व्याधि आदि लक्षण भी होते हैं। भक्त के मन में श्रीकृष्ण के अनिष्ट की आशंका को शोकरति कहते हैं। वही इस करुणभक्तिरस में स्थायिभाव मानी जाती है। श्रीमद्भागवत (१०.१६.१०) में यह विवरण है। श्रीकृष्ण को यमुना में कालिय नाग के फनों में लिपटा हुआ देखकर उनके सर्वप्रिय गोपबालक बड़े उद्विग्न हो उठे। शोक, संताप और भयवश, मूढ़ होकर वे भूमि पर गिर पड़े । वे मोहवश समझ रहे थे कि श्रीकृष्ण किसी विपत्ति में पड़ गये हैं। अतएव उनमें इन लक्षणों का प्रकट होना बिल्कुल आश्चर्यजनक नहीं। उन्होंने अपनी मित्रता, अपना सर्वस्व, यहाँ तक कि अपनी इच्छा और आत्मा भी श्रीकृष्ण को अर्पण कर रखी थी। श्रीकृष्ण के भयंकर विषमय कालिय हृद में उतर जाने पर यशोदा मैया नाना प्रकार की शंका करती हुई गरम-गरम साँस लेने लगीं। नेत्रों से विगलित अश्रुधारा ने उनके वस्त्रों को भिगो डाला । इस प्रकार वे प्रायः मूर्च्छित हो गईं । इसी प्रकार जब शंखासुर दैत्य एक-एक करके श्रीकृष्ण की महिषियों पर आक्रमण कर रहा था तो श्रीकृष्ण के अग्रज बलराम जी एकदम काले पड़ गये ।