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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 353

३२६] भक्तिरसामृतसिन्धु जो पुरुष निरन्तर भक्तियोग के आचरण में बहुत कुशल हों उन्हें धर्म- वीर कहा जाता है। धर्मानुष्ठान में लगे उत्तम भक्त ही इस धर्मवीर श्रेणी में आ सकते हैं। प्रामाणिक शास्त्रों के अध्ययन, नीति के पालन, श्रद्धाभाव, सहिष्णुता और इन्द्रियसंयम के द्वारा धर्मवीर बना जा सकता है। जो पुरुष श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिये धर्मानुष्ठान करते हैं वे भक्ति- योग में स्थिर रहते हैं, जबकि दूसरे जो श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने की इच्छा के बिना धर्मानुष्ठान करते हैं वे केवल पुण्यात्मा कहलाते हैं। धर्मवीरता के सर्वोत्तम प्रतीक महाराज युधिष्ठिर हैं। एक भक्त ने श्रीकृष्ण से कहा है, "हे कृष्ण ! हे दनुज-दमन ! महाराज पाण्डु के ज्येष्ठ पुत्र महाराज युधिष्ठिर ने आपकी प्रसन्नता के लिये नाना प्रकार के सब यज्ञों का आयोजन किया है। उनमें भाग लेने के लिये वे निरन्तर स्वर्ग के देवता इन्द्र का आह्वान किया करते हैं। इन्द्र की स्वर्ग से अनुपस्थिति में शची देवी प्रायः अपना समय कपोल को हथेली पर धारण किये हुए बिताती हैं।" देवताओं के लिये नाना यज्ञ करना श्रीभगवान् के अंगों की आराधना करना है। देवताओं को विष्णुरूपधारी भगवान् के नाना अंग माना जाता है। इसलिये उनकी आराधना का अंतिम प्रयोजन अंगों की उपासना से साक्षात् श्रीभगवान् को प्रसन्न करना हो है। महाराज युधिष्ठिर की ऐसी कोई लौकिक इच्छा नहीं थी। उन्होंने सब यज्ञों का अनुष्ठान साक्षात् श्रीकृष्ण के निर्देशानुसार किया। वे उनसे कोई निजी लाभ नहीं उठाना चाहते थे। उनकी एकमात्र इच्छा श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने की थी। अतएव वे भक्तों के शिरोमणि माने गये। युधिष्ठिरजी वास्तव में निरन्तर प्रेममयी भक्ति के सागर में निमग्न रहते थे।