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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 352, कुल 380 में से

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अद्भुतभक्तिरस और वीरभक्तिरस [ ३२५ स्वयं भगवान् द्वारा दिये जाने पर भी भक्त मुक्ति को भी नहीं लेता। कृष्णप्रेम का वास्तविक प्रकाश तभी होता है जब श्रीकृष्ण दान को लेने वाले बन जाते हैं और भक्त दान देने वाला बन जाता है। 'हरिभक्तिसुधोदय' में ध्रुव महाराज का एक अन्य उदाहरण है। वे कहते हैं, "हे स्वामिन् ! मैं आपसे किसी अभिलाषा को लेकर तप-त्याग के अध्यात्म में प्रवृत्त हुआ था। परन्तु इसके बदले में आपने मुझे अपना मुनि- दुर्लभ दर्शन प्रदान किया है। मैं केवल कुछ काँच के टूटे टुकड़े ढूँढ रहा था। परन्तु उसके स्थान पर मुझे अमूल्य रत्न मिल गया। अतएव अब मैं पूर्ण सन्तुष्ट हो चुका हूँ। हे नाथ ! मुझे अब आपसे और कुछ नहीं चाहिये।" इसी के अनुरूप श्रीमद्भागवत (३.१५.४८) में उल्लेख हैं—'सनक आदि चारों कुमार भगवान् को सम्बोधन करते हुए कहते हैं, "हे भगवन् ! आपकी निर्मल कीर्ति बड़ी आकर्षक है; अतएव आपकी ही कीर्ति गान के योग्य है और वास्तव में आप ही सम्पूर्ण तीर्थों के निवास हैं। सौभाग्य- शाली पुरुष आपका गुणगान किया करते हैं और वास्तव में आपके दिव्य स्वरूप को जानते हैं; वे आपके द्वारा दी हुई मुक्ति की भी परवाह नहीं करते। उन्हें दिव्य महानिधि प्राप्त हो जाती है, इसलिये वे देवराज इन्द्र का स्थान भी नहीं चाहते। वे जानते हैं कि स्वर्ग का आसन भी भय से खाली नहीं है, जबकि जो केवल आपकी दिव्य कीर्ति के गान में लगे रहते हैं उनके लिये केवल आनन्द और निर्भयता रहती है। ऐसे में इस प्रकार के ज्ञानी पुरुष स्वर्ग के सिंहासन के प्रति आकृष्ट क्यों हों?" एक भक्त ने राजा मयूरध्वज की दानपरायणता पर अपने भाव को इस प्रकार व्यक्त किया है, "जिनकी दान-परायणता का वर्णन करना भी मेरे लिए असम्भव है उन राजा मयूरध्वज को सादर प्रणाम है।" मयूर- ध्वज बड़े बुद्धिमान् थे; अतएव एक समय जब श्रीकृष्ण ब्राह्मण रूप में उनके पास गये तो वे उनका प्रयोजन समझ गये। श्रीकृष्ण ने उनसे उनकी देह का आधा भाग माँगा। यह भी कहा कि स्वयं पत्नी और पुत्र उनके शरीर को काटें। राजा मयूरध्वज ने इसको मान लिया। अपने प्रगाढ़ भक्तिभाव के कारण वे निरन्तर श्रीकृष्ण के चिन्तन में निमग्न रहते थे। इसलिये जब उन्होंने जाना कि श्रीकृष्ण स्वयं ब्राह्मण रूप में आये हैं तो अपनी देह का आधा भाग देने में तनिक भी संकोच न किया। श्रीकृष्ण के लिये महाराज मयूरध्वज का यह त्याग जगत् में अद्वितीय है। अतएव हमें उनकी सादर वन्दना करनी चाहिये। उन्हें ब्राह्मण रूपधारी भगवान् का पूर्ण ज्ञान था और वे पूर्ण दानवीर कहलाते हैं।

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