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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

अद्भुतभक्तिरस और वीरभक्तिरस [ ३२५ स्वयं भगवान् द्वारा दिये जाने पर भी भक्त मुक्ति को भी नहीं लेता। कृष्णप्रेम का वास्तविक प्रकाश तभी होता है जब श्रीकृष्ण दान को लेने वाले बन जाते हैं और भक्त दान देने वाला बन जाता है। 'हरिभक्तिसुधोदय' में ध्रुव महाराज का एक अन्य उदाहरण है। वे कहते हैं, "हे स्वामिन् ! मैं आपसे किसी अभिलाषा को लेकर तप-त्याग के अध्यात्म में प्रवृत्त हुआ था। परन्तु इसके बदले में आपने मुझे अपना मुनि- दुर्लभ दर्शन प्रदान किया है। मैं केवल कुछ काँच के टूटे टुकड़े ढूँढ रहा था। परन्तु उसके स्थान पर मुझे अमूल्य रत्न मिल गया। अतएव अब मैं पूर्ण सन्तुष्ट हो चुका हूँ। हे नाथ ! मुझे अब आपसे और कुछ नहीं चाहिये।" इसी के अनुरूप श्रीमद्भागवत (३.१५.४८) में उल्लेख हैं—'सनक आदि चारों कुमार भगवान् को सम्बोधन करते हुए कहते हैं, "हे भगवन् ! आपकी निर्मल कीर्ति बड़ी आकर्षक है; अतएव आपकी ही कीर्ति गान के योग्य है और वास्तव में आप ही सम्पूर्ण तीर्थों के निवास हैं। सौभाग्य- शाली पुरुष आपका गुणगान किया करते हैं और वास्तव में आपके दिव्य स्वरूप को जानते हैं; वे आपके द्वारा दी हुई मुक्ति की भी परवाह नहीं करते। उन्हें दिव्य महानिधि प्राप्त हो जाती है, इसलिये वे देवराज इन्द्र का स्थान भी नहीं चाहते। वे जानते हैं कि स्वर्ग का आसन भी भय से खाली नहीं है, जबकि जो केवल आपकी दिव्य कीर्ति के गान में लगे रहते हैं उनके लिये केवल आनन्द और निर्भयता रहती है। ऐसे में इस प्रकार के ज्ञानी पुरुष स्वर्ग के सिंहासन के प्रति आकृष्ट क्यों हों?" एक भक्त ने राजा मयूरध्वज की दानपरायणता पर अपने भाव को इस प्रकार व्यक्त किया है, "जिनकी दान-परायणता का वर्णन करना भी मेरे लिए असम्भव है उन राजा मयूरध्वज को सादर प्रणाम है।" मयूर- ध्वज बड़े बुद्धिमान् थे; अतएव एक समय जब श्रीकृष्ण ब्राह्मण रूप में उनके पास गये तो वे उनका प्रयोजन समझ गये। श्रीकृष्ण ने उनसे उनकी देह का आधा भाग माँगा। यह भी कहा कि स्वयं पत्नी और पुत्र उनके शरीर को काटें। राजा मयूरध्वज ने इसको मान लिया। अपने प्रगाढ़ भक्तिभाव के कारण वे निरन्तर श्रीकृष्ण के चिन्तन में निमग्न रहते थे। इसलिये जब उन्होंने जाना कि श्रीकृष्ण स्वयं ब्राह्मण रूप में आये हैं तो अपनी देह का आधा भाग देने में तनिक भी संकोच न किया। श्रीकृष्ण के लिये महाराज मयूरध्वज का यह त्याग जगत् में अद्वितीय है। अतएव हमें उनकी सादर वन्दना करनी चाहिये। उन्हें ब्राह्मण रूपधारी भगवान् का पूर्ण ज्ञान था और वे पूर्ण दानवीर कहलाते हैं।

३२६] भक्तिरसामृतसिन्धु जो पुरुष निरन्तर भक्तियोग के आचरण में बहुत कुशल हों उन्हें धर्म- वीर कहा जाता है। धर्मानुष्ठान में लगे उत्तम भक्त ही इस धर्मवीर श्रेणी में आ सकते हैं। प्रामाणिक शास्त्रों के अध्ययन, नीति के पालन, श्रद्धाभाव, सहिष्णुता और इन्द्रियसंयम के द्वारा धर्मवीर बना जा सकता है। जो पुरुष श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिये धर्मानुष्ठान करते हैं वे भक्ति- योग में स्थिर रहते हैं, जबकि दूसरे जो श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने की इच्छा के बिना धर्मानुष्ठान करते हैं वे केवल पुण्यात्मा कहलाते हैं। धर्मवीरता के सर्वोत्तम प्रतीक महाराज युधिष्ठिर हैं। एक भक्त ने श्रीकृष्ण से कहा है, "हे कृष्ण ! हे दनुज-दमन ! महाराज पाण्डु के ज्येष्ठ पुत्र महाराज युधिष्ठिर ने आपकी प्रसन्नता के लिये नाना प्रकार के सब यज्ञों का आयोजन किया है। उनमें भाग लेने के लिये वे निरन्तर स्वर्ग के देवता इन्द्र का आह्वान किया करते हैं। इन्द्र की स्वर्ग से अनुपस्थिति में शची देवी प्रायः अपना समय कपोल को हथेली पर धारण किये हुए बिताती हैं।" देवताओं के लिये नाना यज्ञ करना श्रीभगवान् के अंगों की आराधना करना है। देवताओं को विष्णुरूपधारी भगवान् के नाना अंग माना जाता है। इसलिये उनकी आराधना का अंतिम प्रयोजन अंगों की उपासना से साक्षात् श्रीभगवान् को प्रसन्न करना हो है। महाराज युधिष्ठिर की ऐसी कोई लौकिक इच्छा नहीं थी। उन्होंने सब यज्ञों का अनुष्ठान साक्षात् श्रीकृष्ण के निर्देशानुसार किया। वे उनसे कोई निजी लाभ नहीं उठाना चाहते थे। उनकी एकमात्र इच्छा श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने की थी। अतएव वे भक्तों के शिरोमणि माने गये। युधिष्ठिरजी वास्तव में निरन्तर प्रेममयी भक्ति के सागर में निमग्न रहते थे।

अध्याय ४७ करुणभक्तिरस और रौद्रभक्तिरस करुणभक्तिरस जब भक्तिभाव के कारण कृष्ण के सम्बन्ध में किसी प्रकार की शोकरति की उत्पत्ति हो तो उसे करुणभक्तिरस कहते हैं। इस भक्तिरस का उद्दीपन हैं श्रीकृष्ण के दिव्य गुण, रूप, लीला आदि । इस भक्तिरस में कभी-कभी शोक करना, भारी साँस लेना, रोना, भूमि पर गिर पड़ना और छाती पीटना आदि अनुभाव होते हैं। कभी-कभी आलस्य, निर्वेद, अपयश, दैन्य, चिन्ता, विषाद, ग्लानि, उत्सुकता, चपलता, उन्माद, विस्मृति, मरण, मोह और व्याधि आदि लक्षण भी होते हैं। भक्त के मन में श्रीकृष्ण के अनिष्ट की आशंका को शोकरति कहते हैं। वही इस करुणभक्तिरस में स्थायिभाव मानी जाती है। श्रीमद्भागवत (१०.१६.१०) में यह विवरण है। श्रीकृष्ण को यमुना में कालिय नाग के फनों में लिपटा हुआ देखकर उनके सर्वप्रिय गोपबालक बड़े उद्विग्न हो उठे। शोक, संताप और भयवश, मूढ़ होकर वे भूमि पर गिर पड़े । वे मोहवश समझ रहे थे कि श्रीकृष्ण किसी विपत्ति में पड़ गये हैं। अतएव उनमें इन लक्षणों का प्रकट होना बिल्कुल आश्चर्यजनक नहीं। उन्होंने अपनी मित्रता, अपना सर्वस्व, यहाँ तक कि अपनी इच्छा और आत्मा भी श्रीकृष्ण को अर्पण कर रखी थी। श्रीकृष्ण के भयंकर विषमय कालिय हृद में उतर जाने पर यशोदा मैया नाना प्रकार की शंका करती हुई गरम-गरम साँस लेने लगीं। नेत्रों से विगलित अश्रुधारा ने उनके वस्त्रों को भिगो डाला । इस प्रकार वे प्रायः मूर्च्छित हो गईं । इसी प्रकार जब शंखासुर दैत्य एक-एक करके श्रीकृष्ण की महिषियों पर आक्रमण कर रहा था तो श्रीकृष्ण के अग्रज बलराम जी एकदम काले पड़ गये ।

३२८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु 'हंसदूत' में निम्नलिखित घटना का उल्लेख है। गोपियों ने हंसदूत से निवेदन किया कि वह श्रीकृष्ण के चरणकमलों के चिह्नों का अन्वेषण करे और मिल जाने पर उन्हें उसी प्रकार सिर पर धारण करे जिस प्रकार श्रीकृष्ण के सारे गोपबालकों को चुराने के बाद ब्रह्माजी ने उन्हें शिरोधार्य किया था। श्रीकृष्ण को चुनौती देने की भूल के लिये शोक करते हुए ब्रह्माजी ने उनके सामने झुककर प्रणाम किया था, जिससे उनका मुकुट श्रीकृष्ण के चरणचिह्नों से अंकित हो गया। गोपियों ने हंसदूत को स्मरण कराया कि कभी-कभी नारद जैसे महान् ऋषि भी इन चरण- चिह्नों को देखकर भाव-विह्वल हो जाते हैं और कभी-कभी जीवन्मुक्त महर्षियों में भी उन्हें देखने की लालसा जाग उठती है। "अतएव तुम्हें बड़े उत्साहपूर्वक श्रीकृष्ण के चरणचिह्नों को खोजना चाहिये," उन्होंने निवेदन किया। यह भी करुणभक्तिरस का सन्दर्भ है। एक बार नकुल के अनुज सहदेव को श्रीकृष्ण के चरणों से निस्सृत तेजोमय दीप्ति को देखकर बड़ा आनन्द हुआ। वह रोते हुए पुकार उठा, "माता माद्री तुम कहाँ हो ? पिता पाण्डु आप अब कहाँ हैं ? हा शोक ! हा शोक ! इस अवसर पर श्रीकृष्ण के चरणचिह्नों को देखने के लिये आप यहाँ नहीं हैं।" यह भी करुणभक्तिरस है। श्रीकृष्णविषया दृढ़ रति से रहित भक्ति में स्मित आदि लक्षण तो हो सकते हैं परन्तु करुणभक्तिरस का शोकभाव कभी नहीं हो सकता। इस करुणरति के मूल में सदा प्रेम रहता है। श्रीकृष्ण अथवा उनकी प्रियाओं को भय की आशंका को जैसे बलदेव और युधिष्ठिर प्रकट करते हैं, वैसा ऊपर वर्णन किया गया है। इस आशंका में श्रीकृष्ण की अचिन्त्य शक्तियों का अज्ञान कारण नहीं है; इनके मूल में है उनके लिये भक्त का प्रगाढ़ प्रेम। श्रीकृष्ण को भय होने की ऐसी आशंका पहले-पहल शोक के आश्रय के रूप में प्रकट होती है; परन्तु शनैः-शनैः वह करुणभक्तिरस में विकसित होकर विशिष्टता को प्राप्त हो जाती है और इस प्रकार अनिर्वचनीय आनन्द देती है। रौद्रभक्तिरस श्रीकृष्ण के लिये रौद्रभक्तिरस में श्रीकृष्ण ही निरन्तर क्रोध के विषय अर्थात् आलम्बन विभाव होते हैं। विदग्धमाधव (२.३७) में ललिता गोपी श्रीकृष्ण के कारण हुए अपने क्रोध को राधारानी के सामने व्यक्त करती है, "हे सखि ! मेरा चित्त संताप से भर गया है; इसलिये अब मैं

करुणभक्तिरस और रौद्रभक्तिरस [ ३२६

मरकर यमराज के पास जाऊँगी। परन्तु मुझे दुःख है कि मुझे छल कर अब भी यह कृष्ण हँसे जा रहा है। हे राधिके ! तुम तो बड़ी बुद्धिमान् हो। फिर कैसे तुमने अपनी सारी प्रेम-सम्पदा को इस कामुक ग्वाले नव- युवक में लगा दिया है।" कभी-कभी श्रीकृष्ण को देखकर जरती कहने लगती, “अरे ओ ! युवतियों को लूटने वाले धूर्त ! मैं तेरे पास अपनी बहू के दुपट्टे को स्पष्ट देख रही हूँ। फिर भी तू झूठ बोल रहा है।" फिर वह चिल्ला-चिल्ला कर व्रजवासियों से कहने लगती, “हे वृन्दावनवासियो ! देखो इस नन्द महाराज के पुत्र ने मेरी बहू की गृहस्थी में आग लगा दी है।" श्रीकृष्ण जिन अर्जुन वृक्षों से बँधे हुए थे, उनके गिरने की गर्जना को सुनकर रोहिणीदेवी ने भी कृष्ण के लिए इसी प्रकार प्रेम को अभिव्यक्त किया था। सारा अडौस-पड़ौस तुरन्त दुर्घटना के स्थान पर दौड़ पड़ा। रुक्मिणीदेवी ने उस अवसर पर यशोदा मैया को डाँटते हुए कहा, “हे व्रजेन्द्रगेहनी ! अपने पुत्र को रस्सी से बाँध कर तुम उसे शिक्षा देने में बड़ी कुशल हो; सो ठीक है। परन्तु क्या तुम यह भी नहीं देख सकतीं कि तुम्हारा पुत्र संकट में पड़ गया है। वृक्ष पृथ्वी पर गिर रहे हैं और वह फिर भी इधर-उधर घूम रहा है।” यशोदा पर रोहिणीदेवी का यह क्रोध श्रीकृष्ण के कारण हुए रौद्रभक्तिरस का प्रतीक है। एक बार जब श्रीकृष्ण अपने गोप-सखाओं के साथ गोचारण भूमि में विचर रहे थे तो उनके मित्रों ने उनसे तालवन जाने का अनुरोध किया, जहाँ गर्धभासुर रहता था। श्रीकृष्ण के मित्र उस वन के वृक्षों के फल खाना चाहते थे; परन्तु उस असुर से भयवश वहाँ जाने में उनको संकोच था। अतएव उन्होंने श्रीकृष्ण से अनुरोध किया कि वे वहाँ जाकर गर्दभा- सुर का वध कर दें। जब श्रीकृष्ण ने ऐसा किया तो वे सब घर लौट आये और उनके इस समाचार से यशोदा मैया को बड़ी चिन्ता हुई, क्योंकि श्रीकृष्ण को अकेले ही तालवन जैसे भयंकर स्थान पर भेज दिया गया था। इस पर वे बालकों की ओर क्रोधभरी दृष्टि से देखने लगीं। राधारानी की एक सखी के क्रोध का भी एक उदाहरण मिलता है। जब श्रीकृष्ण के व्यवहार से रुष्ट होकर राधारानी ने उनसे बोलना बन्द कर दिया तो श्रीमती राधारानी के असन्तोष से कृष्ण को बडा दुःख हुआ और क्षमा-विनती के लिये वे उनके चरणकमलों में गिर पड़े। परन्तु फिर भी राधारानी सन्तुष्ट नहीं हुईं; उन्होंने श्रीकृष्ण से बातचीत नहीं की। इस पर एक सखी ने उन्हें इन शब्दों में डांटा, “तू

३३० ] भक्तिरसामृतसिन्धु अतृप्ति की मथनी से अपने-आपको मथने दे रही है। तो फिर मैं क्या कह सकती हूँ? जा मेरे पास से दूर चली जा। तेरे पास रहने से मेरे शरीर में आग सी लग जाती है। मैं तेरे इस निष्ठुर व्यवहार को नहीं देख सकती, क्योंकि अपने मोरपंख से तेरे चरणों को छूते हुए प्रियतम श्रीकृष्ण के प्रति भी तू क्रोध से ऐंठी रही।" भक्तियोग में इस रूठने अथवा क्रोध के भाव को 'ईर्ष्या' कहते हैं। जब अक्रूर वृन्दावन को छोड़कर जा रहे थे तो कुछ वृद्धा गोपियों ने उन्हें डाँटते हुए कहा, "हे गन्दिनीनन्दन! तेरी निष्ठुरता यदुवंश को अपयश दे रही है। तू श्रीकृष्ण को लिए जा रहा है। इससे उनकी विरह की आशंका के कारण हम अत्यन्त करुण अवस्था को पहुँच रहे हैं। अब तेरे जाने से भी पहले सब की सब गोपियों के प्राणपखेरू प्रायः उड़ से गये हैं।" जब महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में शिशुपाल ने श्रीकृष्ण का अपमान किया तो पाण्डवों और कुरुओं में बड़ी हलचल हो गई। पिता- मह भीष्म भी इससे अछूते न रहे। उस समय नकुल ने बड़े क्रोध में भरकर कहा, "श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् हैं। उनके चरणनख वेदरूपी ज्योति से देदीप्यमान हैं। यदि कोई उनका अपमान करता है तो मैं पाण्डव घोषणा करता हूँ कि मैं उसके मस्तक पर अपनी उल्टी लात का प्रहार करूंगा और यमदंड के समान भयंकर अपने बाणों का उसे निशाना बनाऊँगा।" यह भी श्रीकृष्ण के लिये रौद्रभक्तिरस का उदाहरण है। इस प्रकार के दिव्य क्रोध में कभी-कभी हँसना, व्यंग्य वचन, कटु आक्षेप करना, अनादर करना आदि लक्षण होते हैं। कभी-कभी हाथों का मलना, दाँत किटकिटाना, आँखों का लाल हो जाना, होंठ चबाना, अत्यन्त भौंहें चढ़ाना, भुजाओं का फड़कना, भुजाओं का ठोंकना, चुप हो जाना, सिर झुका लेना, निःश्वास, टेढ़ी दृष्टि, धिक्कारना, सिर हिलाना, नेत्रों के किनारों पर लालिमा छा जाना, भौंहों का टेढ़ा होना, होंठों का फड़कना आदि अनुभाव होते हैं। कभी नेत्र लाल हो जाते हैं तो कभी म्लान पड़ जाते हैं। कभी क्रुद्ध पुरुष फटकारता है, तो कभी चुप पड़ जाता है। क्रोध के इन लक्षणों के दो भाग किये जा सकते हैं—सात्त्विक तथा व्यभिचारी। कभी-कभी आवेश, जड़ता, गर्व, निर्वेद, मोह, चपलता, असूया, उग्रता, अमर्ष एवं श्रम आदि व्यभिचारिभाव भी होते हैं। इन सब भावों में क्रोधरति स्थायिभाव मानी गई है।

करुणभक्तिरस और रौद्रभक्तिरस [ ३३१ मथुरा पर आक्रमण करते हुए क्रुद्ध जरासन्ध ने श्रीकृष्ण पर व्यंग्य- भरी दृष्टि डाली। उस समय बलरामजी ने अपना हल धारण कर लिया और जरासन्ध को लाल-लाल आँखों से देखने लगे । 'विदग्धमाधव' के एक श्लोक में श्रीमती राधारानी क्रोध की मुद्रा में अपनी माता से बोलीं। राधारानी पर श्रीकृष्ण के पास जाने का आरोप लगाया गया था। वे कहने लगीं, "हे माता! मैं तुमसे क्या कहूँ ? कृष्ण ऐसा निर्दयी है कि अनेक बार मार्ग में मुझ पर आक्रमण करता है और यदि मैं रोना भी चाहूँ तो यह मोरमुकुटधारी धूर्त मेरे मुख को ढक लेता है, जिससे मैं रो भी नहीं पाती। यदि मैं उससे डरकर वहाँ से भागना चाहूँ तो वह तुरन्त मेरा मार्ग रोक लेता है। यदि मैं दीन भाव से उसके चरणों में गिर जाऊँ तो वह मधुसूदन क्रोध में भरकर मेरे मुख को काटता है। हे माता ! मेरी परिस्थिति को समझने का प्रयत्न करो। मुझ पर अनावश्यक क्रोध न करो। मुझे डाँटने के स्थान पर बताओ कि मैं कृष्ण के इन भयंकर आक्रमणों से कैसे बचूँ ?" कभी-कभी बराबर वालों में श्रीकृष्ण के प्रेम को लेकर क्रोध के भाव प्रकट होते हैं। इसका एक उदाहरण जटिला और मुखरा की लड़ाई है। जटिला राधारानी की सास थी और मुखरा उसकी नानी थी। ये दोनों चर्चा कर रही थीं कि किस प्रकार मार्ग में जाती हुई राधारानी को कृष्ण व्यर्थ सताया करता है। मुखरा बोली, "हे दुर्मुखी जटिले ! तेरी बातों को सुनकर मेरे हृदय और मस्तिष्क दोनों में आग लगी जा रही है। तेरा यह कहना किसी प्रमाण के बिना है कि कृष्ण मेरी दौहित्री (लड़की की पुत्री) राधारानी को छेड़ता है।" एक बार जब राधारानी श्रीकृष्ण के दिए हुए रत्नहार को उतार कर रख रही थीं तो उनकी सास जटिला एक सखी से कहने लगी, "हे सखि ! इस सुन्दर हार को देख जो कृष्ण ने राधारानी को भेंट किया है। वह अब उसे पकड़े हुए है और फिर भी हमें यह बतलाना चाहती है कि उसका कृष्ण से कोई सम्बन्ध नहीं है। इस लड़की की क्रिया ने तो हमारे सारे कुल को कलंकित कर दिया है।" शिशुपाल जैसे व्यक्तियों में श्रीकृष्ण के लिये प्राप्त होने वाली स्वाभाविक ईर्ष्या को श्रीकृष्ण के साथ रौद्रभक्तिरस नहीं माना जा सकता ।

अध्याय ४८ भयानकभक्तिरस तथा बीभत्सभक्तिरस भयानकभक्तिरस श्रीकृष्ण के लिए भयानकभक्तिरस में श्रीकृष्ण स्वयं अथवा श्रीकृष्ण के लिए भयानक अन्य व्यक्ति आलम्बन विभाव होते हैं। जब भक्त अपने को श्रीकृष्ण के चरणकमलों का अपराधी अनुभव करता है तो श्रीकृष्ण स्वयं भयानकभक्तिरस के आलम्बन बन जाते हैं। जब प्रेमवश श्रीकृष्ण के सखा और सुहृद उनके लिए किसी भय की आशंका करते हैं तो वह अवस्था भी उनके भय का आलम्बन बन जाती है। जब ऋक्षराज श्रीकृष्ण के सामने खड़ा हुआ उनसे लड़ रहा था, तब अकस्मात् उसे अनुभव हुआ कि वे साक्षात् भगवान् हैं। ऐसे अवसर पर श्रीकृष्ण ने उससे कहा, "हे ऋक्षराज ! तुम्हारा मुख सूखा क्यों जा रहा है। मन से मेरे भय को निकाल दो। तुम्हारा हृदय इस प्रकार काँप क्यों रहा है। तनिक विश्राम करके स्वस्थ हो जाओ। मुझे तुम पर तनिक भी क्रोध नहीं है। परन्तु तुम जितना चाहो मुझ पर क्रोध कर सकते हो, क्योंकि इससे मेरे साथ लड़कर मुझे आनन्दित करके तुम अपनी सेवा का विस्तार करोगे।" कृष्णभक्तिरस की इस भयानक अवस्था में श्रीकृष्ण स्वयं भयानकरस के आलम्बन हैं। एक ऐसी भयानक अवस्था, जिसमें श्रीकृष्ण विषय हों, इस प्रकार है—बालकृष्ण से यमुना जल में अच्छी प्रकार से पराजित होकर कालिय नाग उनसे कहने लगा, "हे मुरारि ! मैंने अपने तप-त्याग से अनेक योग- सिद्धियों का अर्जन किया है। परन्तु फिर भी आपके सामने मैं कुछ भी नहीं हूँ। मैं परम तुच्छ हूँ। अतएव मुझ दीन जीव पर कृपा करें और मेरे प्रति अपने क्रोध को त्याग दें। मैं आपके यथार्थ स्वरूप को नहीं जानता। इसी अज्ञानवश अनेक भयंकर अपराध कर बैठा हूँ। कृपया मुझे बचायें। मैं परम अधम मूर्ख जीव हूँ। मुझ पर कृपा करें।" यह भयानक भक्तिरस का एक अन्य उदाहरण है।

भयानकभक्तिरस तथा वीभत्सभक्तिरस [ ३३३ जिस समय केशी दानव बड़े भारी घोड़े का रूप धारण कर पेड़ों पर से कूद-कूद कर वृन्दावन में उत्पात कर रहा था, तो यशोमति मैया नन्द महाराज से कहने लगीं, "हमारा लाला बड़ा चंचल है । अतएव इसे बलपूर्वक घर में बन्द करके रखना चाहिये । मुझे घोड़े का रूप धारण कर उत्पात करते हुए केशी दैत्य से बड़ा भय लग रहा है ।" जब यह पता चला कि वह असुर क्रुद्ध होकर गोकुल में प्रवेश कर रहा है तो यशोदा मैया अपने बालक की रक्षा के लिये इतनी आतुर हो गईं कि उनका मुख सूख गया और नेत्रों में आँसू भर आए । श्रीकृष्ण के लिये भयानक लगने वाली किसी वस्तु को देखने अथवा सुनने से होने वाले भयानकभक्तिरस के ये कुछ अनुभाव हैं । पूतना राक्षसी के मारे जाने पर यशोदा मैया की कुछ सखियाँ उनसे घटना के विषय में पूछने लगीं । यशोदा मैया ने तुरन्त अपनी सखियों से निवेदन किया, "चुप हो जाओ, चुप हो जाओ । पूतना के बारे में कुछ न पूछो । उस घटना का स्मरण होते ही मैं दुःखी हो जाती हूँ । पूतना राक्षसी मेरे पुत्र को खाने आई थी और उसने मुझसे छल करके बालक को अपने अंक में भी ले लिया था । इसके बाद वह मर कर गिर पड़ी, जिस कारण उसके विशालकाय शरीर से भयानक शब्द हुआ ।" भयानकभक्तिरस में मुख का सूखना, निःश्वास, मुड़ कर देखना, अपने को छिपाना, घबराहट, शरण की खोज और जोर-जोर से रोना—ये सब अनुभाव हैं । कुछ अन्य व्यभिचारिभाव हैं—मोह, विस्मृति, भय की आशंका, इत्यादि । सब में भयरति स्थायिभाव है। किसी भी प्रकार का भय अपराधों अथवा भयानक परिस्थितियों के कारण होता है। अपराध नाना प्रकार से हो सकते हैं और भय का अनुभव अपराधी को होता है। जब भय किसी भयानक पदार्थ के कारण होता है तो उस पदार्थ की आकृति-प्रकृति तथा प्रभाव भयानक होते हैं। इसका एक उदाहरण पूतना राक्षसी है । भय राजा कंस जैसे आसुरी चरित्र के कारण भी हो सकता है और महान् शक्तिशाली इन्द्र, शंकर जैसे देवताओं के कारण भी हो सकता है। कंस जैसे असुरों को श्रीकृष्ण से भय होता था । परन्तु उनके भावों को भयानकभक्तिरस के अन्तर्गत नहीं समझा जा सकता । बीभत्सभक्तिरस प्रामाणिक सूत्रों से जाना जाता है कि जुगुप्सा के कारण श्रीकृष्ण में

३३४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु होने वाली आसक्ति कभी-कभी भक्ति के बीभत्सरस के रूप में प्रकट होती है। इस प्रकार के कृष्णभक्तिरस का अनुभव करने वाला प्रायः शान्तरस में स्थित रहता है। बीभत्सभक्तिरस का वर्णन निम्नलिखित है। "यह व्यक्ति पहले केवल कामक्रिया और इन्द्रियतृप्ति में रुचि रखता था। अपने कामविकार की पूर्ति के लिये इसने रतिचौर्य में बड़ी निपुणता प्राप्त कर ली थी; परन्तु यह कैसा आश्चर्य है कि अब यह वही मनुष्य आँखों में आँसू भर कर श्रीकृष्ण के नाम का कीर्तन कर रहा है। अब जैसे ही किसी स्त्री के मुख को देखता है, तुरन्त मुँह सिकोड़ लेता है। इसकी मुखमुद्रा से प्रतीत होता है कि इसे अब मैथुन से घृणा हो गई है।" भक्ति के इस बीभत्सरस के अनुभाव हैं-अपने पूर्व जीवन के विचार पर थूकना, मुँह सिकोड़ना, नाक बन्द कर लेना, हाथ धोना, भागना, काँपना, रोमांचित हो जाना, पसीना आ जाना इत्यादि। इसमें ग्लानि, श्रम, मोह, निर्वेद, विषाद, चपलता, आवेग, जाड्य आदि व्यभिचारिभाव भी रहते हैं। जब कोई भक्त अपने पूर्व जीवन की जघन्य क्रियाओं पर शोक करता हुआ शरीर पर विशेष लक्षणों को प्रकट करता है तो उसके भाव को बीभत्सभक्तिरस कहा जाता है। यह कृष्णभावना के जाग्रत हो जाने के कारण होता है। इस सन्दर्भ में यह कथन है, "भगवान् की भक्ति के लवलेश का भी उदय हो जाने पर फिर इस हाड़-माँस से बने, रुधिर से भरे, दुर्गन्ध से पूर्ण शरीर में कोई रति का आनन्द कैसे ले सकता है?" यह अनुभव उसी को हो सकता है जो कृष्णभावना को प्राप्त हो गया हो और जिसे इस बात का पूर्ण बोध हो गया हो कि यह प्राकृत देह परम अधम प्रकृति की है। माता के गर्भ में कोई भाग्यवान बालक श्रीकृष्ण से प्रार्थना करता है, "हे कंस के शत्रु ! मैं इस प्राकृत देह के कारण बड़ा दुःख पा रहा हूँ। इस समय मैं अपनी माता के गर्भ में रुधिर, मूत्र और मल के बीच पड़ा हुआ हूँ। ऐसी विगर्हित स्थिति में जीवन धारण करता हुआ मैं अत्यन्त दुःख पा रहा हूँ। इसलिये हे कृपा के सागर ! मुझ पर प्रसन्न हों। मुझ में आपकी दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न होने की कोई योग्यता नहीं है; परन्तु फिर भी कृपया मेरी रक्षा करें।" नरक में गिरा प्राणी भी इसी प्रकार प्रार्थना करता है। वह भगवान् से कहता है, "हे नाथ ! यमराज ने मुझे गन्दे, कीड़ों से भरे और दुर्गन्धयुक्त स्थान में रखा है। मैं नाना प्रकार के

भयानकभक्तिरस तथा बीभत्सभक्तिरस [ ३३५ ] व्याधिग्रस्त लोगों के मल-मूत्र से घिरा हुआ हूँ। इस भयानक दृश्य को देखकर मेरी आँखों में घाव हो गये हैं और मैं प्रायः अन्धा हो चला हूँ। इसलिये हे नाथ ! आपसे प्रार्थना है कि इस नारकीय स्थिति से मेरी रक्षा करें। इस समय मैं नरक में गिरा पड़ा हूँ; परन्तु फिर भी निरन्तर आपके पावन नाम को स्मरण करने की चेष्टा करूँगा और इस प्रकार मेरे लिये प्राणधारण करना सम्भव होगा।" यह अधम स्थिति के कारण होने वाली कृष्णरति का उदाहरण है। जो निरन्तर पावन भगवन्नाम—हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे के कीर्तन में संलग्न रहता है, उसे श्रीकृष्ण के दिव्य प्रेम को प्राप्त हुआ समझा जाता है। ऐसी अवस्था में जीवन की किसी भी परिस्थिति में वह पूर्ण स्नेह और प्रेमभाव के साथ श्रीकृष्ण का स्मरण करता हुआ सन्तुष्ट रह सकता है। सारांश में, कहा जा सकता है कि बीभत्स कृष्णभक्तिरस का प्रादुर्भाव सुप्त शान्तरस के उन्नत स्नेहभाव में विकसित होने की अवस्था में होता है।

अध्याय ४६ रसों की मैत्री-वैर स्थिति पूर्ववर्णन के अनुसार, श्रीकृष्ण, के साथ बारह प्रकार के रस (सम्बन्ध) होते हैं। इनमें से पाँच रस मुख्य हैं—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य। सात रस गौण हैं—हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, भयानक तथा बीभत्स । पाँचों मुख्य रस वैकुण्ठ-जगत् में नित्य-निरन्तर प्रकाशित रहते हैं, जबकि सातों गौण रस केवल गोकुल वृन्दावन में, जहाँ श्रीकृष्ण प्राकृतजगत् के अन्तर्गत अपने दिव्य लीलारस का परिवेषण करते हैं, निरन्तर प्रकट-अप्रकट हुआ करते हैं। प्रायः मुख्य अंगीरस के साथ-साथ कुछ अन्य रस भी पाए जाते हैं और इन रसों के मिश्रणों की कभी मैत्री होती है तो कभी विरोधी स्थिति होती है। इन नाना रसों की मैत्री और विरोधी स्थिति का वैज्ञानिक विश्लेषण निम्नलिखित है। शान्तरस के बीभत्स और अद्भुत—ये दोनों मित्र रस हैं। माधुर्य, वीर, रौद्र और भयानक—ये शान्तरस के विरोधी हैं। दास्यरस में भयानक, शान्त, वीर (जैसे दानवीर, धर्मवीर आदि) मित्र रस हैं। युद्धवीर और रौद्ररस स्वयं श्रीकृष्ण से उत्पन्न होते हैं। सख्यरस के साथ माधुर्य, हास्य अथवा वीर की मैत्री स्थिति है। परन्तु भयानक अथवा वात्सल्यरस इसके विरोधी हैं। यद्यपि वात्सल्य, हास्य, करुण और भयानक में गम्भीर अन्तराल है; फिर भी इसका मिलना संगत है। वात्सल्यरस के साथ. माधुर्य, वीर अथवा रौद्र की विरुद्ध स्थिति है। माधुर्यरस के साथ हास्य और सख्य मित्ररस हैं। कतिपय विद्वानों के मत में माधुर्यरस में वीररस के केवल युद्धवीर और धर्मवीर नामक रसों की ही मित्र स्थिति है। इस दृष्टि के अनुसार इन

रसों की मैत्री वैर स्थिति [ ३ ३७ दोनों के अतिरिक्त अन्य, सब अभिव्यक्तियों को माधुर्यरस के विपरीत समझा जाता है । हास्यरस के भयानक, मधुर तथा वात्सल्य—ये तीनों रस मित्र हैं तथा करुण और बीभत्स ये दोनों विरोधी हैं । वीर और शान्त—ये दोनों अद्भुतरस के मित्र हैं; परन्तु रौद्र और भयानक, दोनों विरोधी हैं । वीररस के मित्र अद्भुत, हास्य तथा दास्यरस हैं, जबकि भयानक और माधुर्य ये दोनों विरोधी हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार शान्तरस सदा वीररस का मित्र है । करुणभक्तिरस के मित्र हैं रौद्र और वात्सल्य । हास्य, माधुर्य तथा अद्भुत विरोधी हैं । रौद्रभक्तिरस के साथ करुण अथवा वीररस के मिलने की मैत्री स्थिति है; जबकि हास्य, माधुर्य, अथवा भयानक वैरी हैं । भयानक भक्तिरस के साथ बीभत्स तथा करुणरस मित्र हैं। वीरभक्तिरस के साथ मधुर, हास्य और रौद्ररस का मिश्रण सदा मित्र स्थिति में होता है । बीभत्सभक्तिरस में शान्त, हास्य और दास्य मित्र रस हैं, जबकि सख्य और माधुर्य वैरी हैं । उपरोक्त विश्लेषण रसाभास के अध्ययन का सार संकलन है । रसाभास की यह दिव्य विद्या भक्ति के उन सभी रसों को पूर्ण रूप से समझा सकती है जो एक दूसरे के परस्पर मित्र और विरोधी हैं । जिस समय भगवान् चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथपुरी में विराज रहे थे, उस समय अनेक कवि और भक्त उनके पास आकर अपने नाना प्रकार के काव्यों का समर्पण करते थे । परन्तु यह नियम था कि श्रीचैतन्यदेव के निजी सचिव स्वरूप दामोदर पहले इन सब रचनाओं का बड़ी गम्भीरता से विश्लेषण करते थे । जब वे पाते कि इनमें कोई रसाभास नहीं है, तभी श्रीचैतन्यदेव के निकट जाकर कोई अपने काव्य का पाठ कर सकता था । रसाभास का विषय बड़ा महत्त्वपूर्ण है । जो शुद्ध भक्त हैं वे भगवान् से नाना रसों (सम्बन्धों) के विवरण में सदा पूर्ण मैत्री देखने की आशा रखते हैं । रसों की मैत्री अथवा विरोध का अध्ययन कभी-कभी बड़ा जटिल हो जाता है । इसके कारण की ओर निम्नलिखित संकेत है । जब दो मित्र आपस में मिलते हैं तो इस मिलन से उत्पन्न रस को प्रायः अत्यन्त मित्र रस माना जाता है । परन्तु वास्तव में मित्रों के ऐसे मिलन में इतने प्रकार

३३८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु के भाव मिले रहते हैं कि यह कहना बहुत कठिन है कि ये भाव कब वास्तव में मित्र स्थिति को प्राप्त हो रहे हैं और कब विरोध की स्थिति में पहुँच गये हैं। एक दूसरे से रसों की मित्रता दिखाने के लिये विद्वानों ने किसी विशेष मिश्रण में पाए जाने वाले रसों के अंगीरस और अंगरस—इस प्रकार दो भेद किये हैं। इस विधि के अनुसार मुख्यरस को अंगीरस कहते हैं और गौणरस अंगरस कहलाता है। अंगरस और अंगीरस का विवरण निम्नलिखित वाक्य से स्पष्ट हो जाता है, “सब जीव परब्रह्म रूपी अग्नि के स्फुलिंग जैसे हैं। अतः मुझ जीवरूप स्फुलिंग को अग्नि रूप भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य सेवा में नियुक्त होने का अवसर क्या मिलेगा।” इस वाक्य में शान्तरस अंगीरस है और भगवान् की सेवा का दास्यरस अंगरस है। वास्तव में तो ब्रह्मज्योति में भगवान् और भक्त में होने वाले प्रेमरस-विनिमय की कोई सम्भावना ही नहीं होती। एक अन्य भक्त कहता है, “मैं त्वचा से ढके, कफ, वात, पित्त, शुक्र और शोणित के ढेररूप शरीर में नाना प्रकार से रमण कर रहा हूँ। मुझे धिक्कार है, क्योंकि इस देहात्मबुद्धि के कारण मैं भगवत्स्मरण रूप दिव्य आनन्द का आस्वादन नहीं कर सकता।” इस वाक्य में शान्त और बीभत्स —दोनों रस हैं। शान्तरस अंगीरस है, जबकि बीभत्सरस अंगरस है। एक अन्य भक्त कहता है, “अब मैं चँवर की हवा डुलाते हुए सिंहासन पर विराजमान भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा में प्रवृत्त हो सकूँगा। वे नील मेघ वर्ण श्यामल सच्चिदानन्द विग्रह परब्रह्म हैं। इसलिये अब मैं मांस और रुधिर से सने शरीर के स्नेह को छोड़ दूँगा।” इस वाक्य में भी दास्य और बीभत्स का मिश्रण है। दास्य अंगी है और बीभत्स अंगरस है। एक अन्य वाक्य इस प्रकार है, “वह दिन कब होगा जब मैं अविद्या से मुक्त होकर शुद्ध हुआ निरन्तर कृष्णसेवा की अवस्था को प्राप्त हो सकूँगा। उनके सुन्दर मुखमण्डल और कमलनयनों को निहारता हुआ तब मैं निरन्तर उनकी सेवा करने के योग्य हो जाऊँगा।” इस वाक्य में शान्त- रस अंगी है और दास्यरस अंग है। एक अन्य कथन है, “श्रीकृष्ण के चरणकमल का स्मरण करते हुए भावविह्वल हुए इस भगवद्भक्त के नृत्य को तो देखो। इसे देखने मात्र से

रसों की मैत्री वैर स्थिति [ ३३६ बड़ी से बड़ी सुन्दरी स्त्री में भी सारी रुचि जाती रहेगी।" इस वाक्य में शांत रस अंगी है और वीभत्सरस अंगरस है । एक भक्त ने दृढ़तापूर्वक कहा, "प्रभो ! अब मेरा मुख इन युवतियों का संग प्राप्त होने पर युवतियों के संग के विचार से एकदम मुड़ जाता है। जहाँ तक ब्रह्मसाक्षात्कार का सम्बन्ध है, आपके चिन्तन में मग्न होने से मेरी उसमें कुछ भी रुचि नहीं रही है। इस दिव्य आनन्द में मेरे चित्त में कोई वासना भी शेष नहीं रही है। यहाँ तक कि मैं अब योगसिद्धि भी नहीं चाहता। मेरा मन तो केवल आपके चरणकमलों की आराधना की ओर आकृष्ट हो रहा है।" इस वाक्य में शान्तरस अंगी है और वीररस अंगरस है। एक अन्य वाक्य में सुबल का इस प्रकार से सम्बोधन है, "हे सुबल ! जिन्हें मोरमुकुटधारी श्रीकृष्ण के अधरामृत के पान का अवसर मिला है वे ये व्रजांगनाएँ त्रिभुवन में परम धन्यातिधन्य हैं।" इस दृष्टान्त में सख्यरस अंगी है और माधर्यरस अंग है। श्रीकृष्ण गोपियों से कहते हैं, "हे ललनाओ ! इस प्रकार लालसाभरे नेत्रों से मेरी ओर न देखो। सन्तोष करके वृन्दावन में अपने-अपने घरों को लौट जाओ। तुम्हारे यहाँ खड़े रहने की कोई आवश्यकता नहीं है।" जिस समय श्रीकृष्ण गोपियों से इस प्रकार परिहास कर रहे थे, जो बड़ी उत्कंठा के साथ उनसे रासलीला का आनन्द लेने आई थीं, तो वहाँ उप- स्थित सुबल श्रीकृष्ण की ओर हँसते हुए बड़ी-बड़ी आँखों से देखने लगा। सुबल की अनुभूति में सख्य और हास्यरस का मिश्रण था, यहाँ सख्य अंगी है और हास्य उसका अंग है। निम्नलिखित उदाहरण में सख्यरस और हास्यरस क्रमशः अंगी और अंगरस हैं। जब श्रीकृष्ण ने सुबल को राधारानी की वेशभूषा में यमुना तट पर अशोक वृक्ष के नीचे चुपचाप छिपे हुए देखा तो वे एकदम आश्चर्य से अपने आसन को छोड़कर उठ बैठे। श्रीकृष्ण को देखकर सुबल ने अपने कपोलों को छुपाकर अपनी हँसी रोकने का प्रयास किया। वत्सलरस और करुणरस के मिश्रण का भी उदाहरण है--जब यशोदा मैया को यह विचार हुआ कि उनका पुत्र वन में छाते के बिना नंगे पाँव विचर रहा होगा तो कृष्ण को कितना कष्ट हो रहा होगा, यह सोचकर अत्यन्त व्यथित हो उठीं। यह अंगी वत्सलरस और अंग करुण- रस के मिश्रण का उदाहरण है। वत्सलरस और हास्य के मिश्रण का उदाहरण इस प्रकार है।

३४०] भक्तिरसामृतसिन्धु यशोदा मैया की एक सखी ने उनसे कहा, "हे यशोदारानी ! तुम्हारे पुत्र ने बड़ी चतुराई के साथ मेरे घर से माखन की चोरी की है। इतना ही नहीं, चोरी करके माखन का कुछ अंश इसने मेरे सोये बालक के मुख पर भी लगा दिया जिससे चोरी का दोष उस पर ही लगे।" यह सुनने पर यशोदा मैया की भौंहें कुछ तिरछी हो गईं। परन्तु फिर भी वे अपने पुत्र की ओर मुस्कराते हुए मुख से देख रही थीं। इस प्रकार की मुखमुद्रा वाली यशोदा मैया सबका कल्याण करें। इस उदाहरण में वत्सलरस अंगीरस है और हास्यरस अंगरस है। भक्ति के अनेक रसों के मिश्रण का उदाहरण इस प्रकार है। जिस समय श्रीकृष्ण अपने बायें हाथ से गोवर्धन पर्वत को उठाये हुए थे तो उनके बाल कंधों पर सब ओर फैल गये और शरीर पर स्वेद कण प्रतीत हुए। जब यशोदा मैया ने यह देखा तो वे काँपने लगीं। जब उन्होंने चौड़ी-चौड़ी आँखों से देखा तो श्रीकृष्ण को नाना प्रकार की मुखमुद्रा अभिव्यक्त करते पाया, जिससे उनके गालों पर प्रसन्नता झलक आई और वे हँसने लगीं। तब फिर जब उन्हें यह विचार हुआ कि कृष्ण इतने दीर्घ- काल से पर्वत को अपने हाथ में उठाये हुए हैं, तो उनके वस्त्र पसीने से भीग गये। ऐसी व्रजेश्वरी यशोदा मैया अपनी असीम कृपा से सम्पूर्ण जगत की रक्षा करें। इस उदाहरण में वत्सलरस अंगी है और भयानक, अद्भुत, हास्य, करुण आदि अंगरस हैं। मधुररस और सख्यरस का मिश्रण श्रीमती राधारानी के इस वाक्य में है, "हे सखि ! देखो युवती के समान वेशभूषा धारण किए हुए सुबल के कंधे पर कृष्ण ने अपना हाथ रखा हुआ है। प्रतीत होता है कि वे सुबल के द्वारा मेरे लिये कोई सन्देश भेजना चाहते हैं।" भाव यह है कि राधारानी के बड़े-बूढ़े नहीं चाहते कि श्रीकृष्ण अथवा उनके गोपसखा उनका संग करें। अतएव इन मित्रों को कभी-कभी राधारानी तक श्रीकृष्ण का सन्देश पहुँचाने के लिये युवती का सा वेश बनाना पड़ता है। इस उदाहरण में मधुररस अंगी है और सख्यरस अंग है। मधुररस और हास्यरस के मिश्रण का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए युवती वेशधारी श्रीकृष्ण ने राधारानी से कहा, "हे निष्ठुरे ! क्या तू इतना भी नहीं जानती कि मैं तेरी बहन हूँ। तू मुझे पहचानती क्यों नहीं ? हे कृष्णांगी ! मेरे कन्धे को पकड़कर प्रेमपूर्वक प्रगाढ़ आलिंगन प्रदान कर।" जिस समय श्रीकृष्ण युवती के वेश में इस प्रकार सुन्दर-सुन्दर वचन बोल रहे थे, श्रीमती राधारानी उन्हें पहचान गईं; परन्तु गुरुजनों के सामने

रसों की मैत्री-वैर स्थिति [ ३४१ वे कुछ न कह सकीं, केवल मुस्कराने लगीं । इसमें माधुर्य्यरस को अंगीरस और हास्यरस अंगरस समझा जायगा । अनेक रसों के मिश्रण का दृष्टान्त इस प्रकार है । जब श्रीकृष्ण की एक मित्र सहचरी ने देखा कि श्रीकृष्ण वृषभासुर से लडने को कमर कस रहे हैं तो वह सोचने लगी कि श्रीकृष्ण कैसे अद्भुत हैं, उनका मुख हँसती हुई चन्द्रवली की भौंहों पर मुग्ध है । उन्होंने अपने सर्प जैसे भुज- दण्ड को अपने सखा के कन्धे पर नियत कर रखा है और साथ ही युद्ध के लिए वृषभासुर को ललकारने के लिये वे सिंहनाद कर रहे हैं ।” इस उदाहरण में मधुररस, सख्यरस और वीररस हैं । यहाँ मधुररस अंगी हैं और अन्य दोनों अंगरस हैं । जब कुब्जा ने श्रीकृष्ण के पीताम्बर को पकड़ लिया तो श्रीकृष्ण ने हँसते हुए लोगों के सामने ही अपने चमकते कपोलों वाले मुख को नीचे झुका लिया । यह मधुररस और हास्यरस के मिश्रण का उदाहरण है । यहाँ हास्यरस अंगी है और मधुररस अंग है । भद्रसेन से लड़ने के लिये कटिबद्ध होते विशाल नामक ग्वाले को किसी दूसरे ने कहा, “हे विशाल ! तुम मेरे सामने अपनी वीरता क्यों प्रकट करना चाहते हो । सैकड़ों श्रीदामा और बलरामों को भी मैं कुछ नहीं गिनता । फिर तुम कौन हो ?” यह सख्यभक्तिरस और वीररस का मिश्रण है । यहाँ वीररस अंगी है और सख्य अंगरस है । शिशुपाल का श्रीकृष्ण को अपशब्द कहने का स्वभाव सा था । परन्तु अपने अपमानजनक शब्दों से उसने श्रीकृष्ण की अपेक्षा पाण्डवों को ही अधिक उत्तेजित किया । अतएव पाण्डवों ने शिशुपाल-वध के लिये शस्त्र-अस्त्र धारण कर लिये । उस समय उनके भावों में रौद्र और सख्यरस का मिश्रण था । रौद्र अंगीरस था और सख्यरस अंगरस था । एक बार श्रीकृष्ण ने देखा कि श्रीदामा अपनी लाठी को बड़ी कुशलता के साथ चलाता हुआ बलरामजी से लड़ रहा है, जो गदायुद्ध में बड़े दक्ष थे और अपनी गदा से जिन्होंने सुर जैसे असुरों तक को मार डाला था । अन्त में जब बलरामजी को केवल एक लाठी से लड़ रहे श्रीदामा ने हरा दिया तो श्रीकृष्ण बडे आनन्दित हुए और श्रीदामा की ओर महान् आश्चर्य से देखने लगे । इस उदाहरण में अद्भुत, सख्य तथा वीररस का मिश्रण है । सख्य तथा वीररस अंग हैं और अद्भुत अंगीरस समझा जाता है । इन नाना प्रकार के रसों के कुशल विश्लेषणकर्त्ता निर्देश करते हैं

३४२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु

कि जब कोई रसाभास होता है तो जो रस अंगी, अर्थात् प्रधान हो ता है उसी को संचारी अथवा स्थायी समझा जाता है। 'विष्णुधर्मोत्तर' में प्रमाण है कि जब भक्ति के बहुत से रसों का आपस में मिलना हो तो मुख्यरस अथवा अंगीरस को ही भक्ति का स्थायिभाव कहते हैं। गौणरस का प्रकाश कुछ समय के लिये होता है, परन्तु अन्त में यह मुख्य रस में लीन हो जाता है। ये भक्तिरस के व्यभिचारिभाव माने जाते हैं। इस सन्दर्भ में एक बड़ी सुन्दर उपमा दी गई है, जिससे अंगी और अंग का परस्पर सम्बन्ध स्पष्ट हो जाता है। भगवान् वामन देव वास्तव में आदिपुरुष हैं; परन्तु वे इन्द्र के एक भाई के रूप में 'जन्मे'। यद्यपि वामन देव को कभी-कभी उप-देवता समझ लिया जाता है; परन्तु उनकी यथार्थ स्थिति यह है कि वे सम्पूर्ण देववृन्द के परम स्रोत हैं, देवाधिदेव इन्द्र के भी भर्ता हैं। इसी प्रकार कोई मुख्यरस भी कभी-कभी गौण रूप में प्रकट होता है। किसी कार्य में प्रमुख रूप से व्यक्त होने पर भी व्यभिचारिभाव को अंगरस ही माना जाता है। जब उसकी बहुत अधिक प्रधानता नहीं रहती तब वह अल्प रूप में ही प्रकट होता है और शीघ्र अंगीरस में फिर से लीन हो जाता है। किसी अल्प अभिव्यक्ति के अवसर पर उसे कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। जैसे कोई व्यंजन खाते हुए किसी के मुख में एक तिनका चला जाये तो वह उसका स्वाद नहीं लेगा और न ही उसके स्वाद को जानने का प्रयत्न करेगा।

अध्याय ५० रसों की मैत्री-वैर स्थिति (२) जैसा कहा जा चुका है, विरोधी रसों के मिश्रण को रसाभास कहते हैं। जैसे जब कोई मीठे चावल खा रहा हो तो उसमें नमकीन एवं कड़वे पदार्थों का मिश्रण विरोधी समझा जायगा। रसाभास का एक उत्तम उदाहरण किसी शोक में डूबे हुए निर्विशेष- वादी के इस वाक्य में है, "हाय ! निर्विशेष ब्रह्मज्ञान में आसक्त होने के कारण मैंने अपने दिन व्यर्थ समाधि के अभ्यास में व्यतीत किये हैं। मैंने निर्विशेष ब्रह्म के स्रोत और अखिलरसामृतमूर्ति भगवान् श्रीकृष्ण की ओर कभी ध्यान नहीं दिया।" इस वाक्य में शान्तरस और मधुररस, दोनों के मिश्रण से रसाभास है। कभी वृन्दावन जैसे स्थानों पर देखने में आता है कि श्रीकृष्ण के लिये किंचित् शान्तरस वाला व्यक्ति तुरन्त कृत्रिम रूप से मधुररस के स्तर पर पहुँच जाना चाहता है। परन्तु शान्तरस और मधुररस के परस्पर विरोध के कारण वह भक्ति से पतित हो जाता है, भक्ति से गिर जाता है। शान्तरस के स्तर पर एक महान् भक्त की इस व्यंग्योक्ति में भिन्न- भिन्न रसों का मिश्रण है, "जो पितृलोक के निवासियों से करोड़ों गुणा अधिक वत्सल हैं और जो निरन्तर देवताओं और ऋषियों द्वारा आह्लादित हैं, उन भगवान् श्रीकृष्ण को क्षणभर के लिये देखने को भी मैं आतुर हूँ। परन्तु बड़ा आश्चर्य है कि श्री के पति होने पर भी श्रीकृष्ण के शरीर पर साधारण युवतियों के नखक्षत रहते हैं।" यह रसाभास शान्तरस और उच्च मधुरस के मिश्रण का उदाहरण है। एक गोपी कहने लगी, "हे कृष्ण ! सबसे पहले अपनी लम्बी-लम्बी भुजाओं से मेरा आलिंगन करो। हे सखे ! मेरा सिर सूंघो और तब मैं तुम्हारे साथ रसास्वादन करूँगी।" रसों के इस विरोधी मिश्रण (रसा- भास) में मधुर अंगीरस है और दास्य अंगरस है। एक भक्त बोला, "हे कृष्ण ! तुम्हें महान् वेदान्ती परम सत्य ओर

३४४] भक्तिरसामृतसिन्धु नारदपंचरात्र के अनुगामी वैष्णव भगवान् कहते हैं। फिर ऐसे में मैं तुम्हें अपना पुत्र कैसे कहूँ ? तुम वही परम पुरुष हो फिर मेरी जिह्वा को तुम्हें अपना सामान्य पुत्र कहने का साहस क्यों कर हो ?" इस वाक्य में शान्त और वत्सलरस का मिश्रण है, इसलिए यह रसाभास है। एक अन्य भक्त कहने लगा, "हे मित्र ! आकाश में विद्युत् के विलास के समान ही मेरे नवयौवन की सम्पदा चपल है। अतएव मेरे रूप का कोई महत्त्व नहीं। मेरा आजतक श्रीकृष्ण से मिलन नहीं हुआ। अतएव कृपया तुरन्त ऐसी व्यवस्था करो कि मैं उनसे मिल सकूँ।" इस रसाभास में शान्तरस और मधुररस मिश्रित हैं। कैलास स्थित एक कामिनी ने एक बार श्रीकृष्ण से कहा, "हे कृष्ण ! तुम चिरंजीवी हो।" इस प्रकार कहकर उसने श्रीकृष्ण का प्रगाढ़ आलिंगन किया। वह वत्सल और मधुररस के मिश्रण के रसाभास का दृष्टान्त है। उपरोक्त विवरण का उद्देश्य यह दिखाना है कि यदि श्रीकृष्ण और उनके भक्तों में होने वाले प्रेमविनिमय का परिणाम शुद्ध नहीं होगा तो रसाभास हो जायगा। रूप गोस्वामी जैसे अग्रगण्य भक्तों के मत में भावों में विरोध होते ही रसाभास हो जाता है। एक सामान्य भक्त युवती श्रीकृष्ण का सम्बोधन करते हुए कहती है, "हे श्यामांग ! यह सत्य है कि माँस और शोणितमयी मैं तेरे रमण के योग्य नहीं हूँ। फिर भी अपने कटाक्षों से भेदी हुई मुझको कृपया स्वीकार कर ले।" इस वाक्य में बीभत्स और मधुररस के मिश्रण से रसाभास बन पड़ा है। श्रील रूपगोस्वामी की भक्तों को चेतावनी है कि वे अपनी रचनाओं अथवा व्यवहार में इस प्रकार के रसाभास न करें। विरोधी भावों का होना ही रसाभास कहलाता है। 'कृष्णभावनामृत' के जिस ग्रन्थ में रसाभास हो, विद्वान् अथवा भक्त उसे स्वीकार नहीं करते । 'विदग्धमाधव' (२.१७) में पौर्णमासी नान्दीमुखी से कहती है, "देखो, कैसा आश्चर्य है ! मुनिजन सब पाप-संताप की शान्ति के लिए विषयों से मन को हटाकर जिसमें क्षणभर को लगाने का भी प्रयास करते हैं यह बाला (राधा) उसी श्रीकृष्ण से अपने मन को हटाकर विषयों में लगाना चाहती है। बड़े-बड़े मुनिजन तुच्छ तप-त्याग के द्वारा हृदय में जिसकी लवमात्र स्फूर्ति के लिये उत्कंठित रहते हैं, उसी कृष्ण के स्मरण को यह मुग्धा अपने हृदय से निकालना चाहती है।" यद्यपि इस वाक्य में विरोधी रसों का संचार है; परन्तु परिणाम में कोई विरोध नहीं हैं, क्योंकि इसमें