भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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कि जब कोई रसाभास होता है तो जो रस अंगी, अर्थात् प्रधान हो ता है उसी को संचारी अथवा स्थायी समझा जाता है। 'विष्णुधर्मोत्तर' में प्रमाण है कि जब भक्ति के बहुत से रसों का आपस में मिलना हो तो मुख्यरस अथवा अंगीरस को ही भक्ति का स्थायिभाव कहते हैं। गौणरस का प्रकाश कुछ समय के लिये होता है, परन्तु अन्त में यह मुख्य रस में लीन हो जाता है। ये भक्तिरस के व्यभिचारिभाव माने जाते हैं। इस सन्दर्भ में एक बड़ी सुन्दर उपमा दी गई है, जिससे अंगी और अंग का परस्पर सम्बन्ध स्पष्ट हो जाता है। भगवान् वामन देव वास्तव में आदिपुरुष हैं; परन्तु वे इन्द्र के एक भाई के रूप में 'जन्मे'। यद्यपि वामन देव को कभी-कभी उप-देवता समझ लिया जाता है; परन्तु उनकी यथार्थ स्थिति यह है कि वे सम्पूर्ण देववृन्द के परम स्रोत हैं, देवाधिदेव इन्द्र के भी भर्ता हैं। इसी प्रकार कोई मुख्यरस भी कभी-कभी गौण रूप में प्रकट होता है। किसी कार्य में प्रमुख रूप से व्यक्त होने पर भी व्यभिचारिभाव को अंगरस ही माना जाता है। जब उसकी बहुत अधिक प्रधानता नहीं रहती तब वह अल्प रूप में ही प्रकट होता है और शीघ्र अंगीरस में फिर से लीन हो जाता है। किसी अल्प अभिव्यक्ति के अवसर पर उसे कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। जैसे कोई व्यंजन खाते हुए किसी के मुख में एक तिनका चला जाये तो वह उसका स्वाद नहीं लेगा और न ही उसके स्वाद को जानने का प्रयत्न करेगा।