भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५० रसों की मैत्री-वैर स्थिति (२) जैसा कहा जा चुका है, विरोधी रसों के मिश्रण को रसाभास कहते हैं। जैसे जब कोई मीठे चावल खा रहा हो तो उसमें नमकीन एवं कड़वे पदार्थों का मिश्रण विरोधी समझा जायगा। रसाभास का एक उत्तम उदाहरण किसी शोक में डूबे हुए निर्विशेष- वादी के इस वाक्य में है, "हाय ! निर्विशेष ब्रह्मज्ञान में आसक्त होने के कारण मैंने अपने दिन व्यर्थ समाधि के अभ्यास में व्यतीत किये हैं। मैंने निर्विशेष ब्रह्म के स्रोत और अखिलरसामृतमूर्ति भगवान् श्रीकृष्ण की ओर कभी ध्यान नहीं दिया।" इस वाक्य में शान्तरस और मधुररस, दोनों के मिश्रण से रसाभास है। कभी वृन्दावन जैसे स्थानों पर देखने में आता है कि श्रीकृष्ण के लिये किंचित् शान्तरस वाला व्यक्ति तुरन्त कृत्रिम रूप से मधुररस के स्तर पर पहुँच जाना चाहता है। परन्तु शान्तरस और मधुररस के परस्पर विरोध के कारण वह भक्ति से पतित हो जाता है, भक्ति से गिर जाता है। शान्तरस के स्तर पर एक महान् भक्त की इस व्यंग्योक्ति में भिन्न- भिन्न रसों का मिश्रण है, "जो पितृलोक के निवासियों से करोड़ों गुणा अधिक वत्सल हैं और जो निरन्तर देवताओं और ऋषियों द्वारा आह्लादित हैं, उन भगवान् श्रीकृष्ण को क्षणभर के लिये देखने को भी मैं आतुर हूँ। परन्तु बड़ा आश्चर्य है कि श्री के पति होने पर भी श्रीकृष्ण के शरीर पर साधारण युवतियों के नखक्षत रहते हैं।" यह रसाभास शान्तरस और उच्च मधुरस के मिश्रण का उदाहरण है। एक गोपी कहने लगी, "हे कृष्ण ! सबसे पहले अपनी लम्बी-लम्बी भुजाओं से मेरा आलिंगन करो। हे सखे ! मेरा सिर सूंघो और तब मैं तुम्हारे साथ रसास्वादन करूँगी।" रसों के इस विरोधी मिश्रण (रसा- भास) में मधुर अंगीरस है और दास्य अंगरस है। एक भक्त बोला, "हे कृष्ण ! तुम्हें महान् वेदान्ती परम सत्य ओर