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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 367, कुल 380 में से

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पृष्ठ 367

३४०] भक्तिरसामृतसिन्धु यशोदा मैया की एक सखी ने उनसे कहा, "हे यशोदारानी ! तुम्हारे पुत्र ने बड़ी चतुराई के साथ मेरे घर से माखन की चोरी की है। इतना ही नहीं, चोरी करके माखन का कुछ अंश इसने मेरे सोये बालक के मुख पर भी लगा दिया जिससे चोरी का दोष उस पर ही लगे।" यह सुनने पर यशोदा मैया की भौंहें कुछ तिरछी हो गईं। परन्तु फिर भी वे अपने पुत्र की ओर मुस्कराते हुए मुख से देख रही थीं। इस प्रकार की मुखमुद्रा वाली यशोदा मैया सबका कल्याण करें। इस उदाहरण में वत्सलरस अंगीरस है और हास्यरस अंगरस है। भक्ति के अनेक रसों के मिश्रण का उदाहरण इस प्रकार है। जिस समय श्रीकृष्ण अपने बायें हाथ से गोवर्धन पर्वत को उठाये हुए थे तो उनके बाल कंधों पर सब ओर फैल गये और शरीर पर स्वेद कण प्रतीत हुए। जब यशोदा मैया ने यह देखा तो वे काँपने लगीं। जब उन्होंने चौड़ी-चौड़ी आँखों से देखा तो श्रीकृष्ण को नाना प्रकार की मुखमुद्रा अभिव्यक्त करते पाया, जिससे उनके गालों पर प्रसन्नता झलक आई और वे हँसने लगीं। तब फिर जब उन्हें यह विचार हुआ कि कृष्ण इतने दीर्घ- काल से पर्वत को अपने हाथ में उठाये हुए हैं, तो उनके वस्त्र पसीने से भीग गये। ऐसी व्रजेश्वरी यशोदा मैया अपनी असीम कृपा से सम्पूर्ण जगत की रक्षा करें। इस उदाहरण में वत्सलरस अंगी है और भयानक, अद्भुत, हास्य, करुण आदि अंगरस हैं। मधुररस और सख्यरस का मिश्रण श्रीमती राधारानी के इस वाक्य में है, "हे सखि ! देखो युवती के समान वेशभूषा धारण किए हुए सुबल के कंधे पर कृष्ण ने अपना हाथ रखा हुआ है। प्रतीत होता है कि वे सुबल के द्वारा मेरे लिये कोई सन्देश भेजना चाहते हैं।" भाव यह है कि राधारानी के बड़े-बूढ़े नहीं चाहते कि श्रीकृष्ण अथवा उनके गोपसखा उनका संग करें। अतएव इन मित्रों को कभी-कभी राधारानी तक श्रीकृष्ण का सन्देश पहुँचाने के लिये युवती का सा वेश बनाना पड़ता है। इस उदाहरण में मधुररस अंगी है और सख्यरस अंग है। मधुररस और हास्यरस के मिश्रण का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए युवती वेशधारी श्रीकृष्ण ने राधारानी से कहा, "हे निष्ठुरे ! क्या तू इतना भी नहीं जानती कि मैं तेरी बहन हूँ। तू मुझे पहचानती क्यों नहीं ? हे कृष्णांगी ! मेरे कन्धे को पकड़कर प्रेमपूर्वक प्रगाढ़ आलिंगन प्रदान कर।" जिस समय श्रीकृष्ण युवती के वेश में इस प्रकार सुन्दर-सुन्दर वचन बोल रहे थे, श्रीमती राधारानी उन्हें पहचान गईं; परन्तु गुरुजनों के सामने