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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 363, कुल 380 में से

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अध्याय ४६ रसों की मैत्री-वैर स्थिति पूर्ववर्णन के अनुसार, श्रीकृष्ण, के साथ बारह प्रकार के रस (सम्बन्ध) होते हैं। इनमें से पाँच रस मुख्य हैं—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य। सात रस गौण हैं—हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, भयानक तथा बीभत्स । पाँचों मुख्य रस वैकुण्ठ-जगत् में नित्य-निरन्तर प्रकाशित रहते हैं, जबकि सातों गौण रस केवल गोकुल वृन्दावन में, जहाँ श्रीकृष्ण प्राकृतजगत् के अन्तर्गत अपने दिव्य लीलारस का परिवेषण करते हैं, निरन्तर प्रकट-अप्रकट हुआ करते हैं। प्रायः मुख्य अंगीरस के साथ-साथ कुछ अन्य रस भी पाए जाते हैं और इन रसों के मिश्रणों की कभी मैत्री होती है तो कभी विरोधी स्थिति होती है। इन नाना रसों की मैत्री और विरोधी स्थिति का वैज्ञानिक विश्लेषण निम्नलिखित है। शान्तरस के बीभत्स और अद्भुत—ये दोनों मित्र रस हैं। माधुर्य, वीर, रौद्र और भयानक—ये शान्तरस के विरोधी हैं। दास्यरस में भयानक, शान्त, वीर (जैसे दानवीर, धर्मवीर आदि) मित्र रस हैं। युद्धवीर और रौद्ररस स्वयं श्रीकृष्ण से उत्पन्न होते हैं। सख्यरस के साथ माधुर्य, हास्य अथवा वीर की मैत्री स्थिति है। परन्तु भयानक अथवा वात्सल्यरस इसके विरोधी हैं। यद्यपि वात्सल्य, हास्य, करुण और भयानक में गम्भीर अन्तराल है; फिर भी इसका मिलना संगत है। वात्सल्यरस के साथ. माधुर्य, वीर अथवा रौद्र की विरुद्ध स्थिति है। माधुर्यरस के साथ हास्य और सख्य मित्ररस हैं। कतिपय विद्वानों के मत में माधुर्यरस में वीररस के केवल युद्धवीर और धर्मवीर नामक रसों की ही मित्र स्थिति है। इस दृष्टि के अनुसार इन

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