भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभयानकभक्तिरस तथा बीभत्सभक्तिरस [ ३३५ ] व्याधिग्रस्त लोगों के मल-मूत्र से घिरा हुआ हूँ। इस भयानक दृश्य को देखकर मेरी आँखों में घाव हो गये हैं और मैं प्रायः अन्धा हो चला हूँ। इसलिये हे नाथ ! आपसे प्रार्थना है कि इस नारकीय स्थिति से मेरी रक्षा करें। इस समय मैं नरक में गिरा पड़ा हूँ; परन्तु फिर भी निरन्तर आपके पावन नाम को स्मरण करने की चेष्टा करूँगा और इस प्रकार मेरे लिये प्राणधारण करना सम्भव होगा।" यह अधम स्थिति के कारण होने वाली कृष्णरति का उदाहरण है। जो निरन्तर पावन भगवन्नाम—हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे के कीर्तन में संलग्न रहता है, उसे श्रीकृष्ण के दिव्य प्रेम को प्राप्त हुआ समझा जाता है। ऐसी अवस्था में जीवन की किसी भी परिस्थिति में वह पूर्ण स्नेह और प्रेमभाव के साथ श्रीकृष्ण का स्मरण करता हुआ सन्तुष्ट रह सकता है। सारांश में, कहा जा सकता है कि बीभत्स कृष्णभक्तिरस का प्रादुर्भाव सुप्त शान्तरस के उन्नत स्नेहभाव में विकसित होने की अवस्था में होता है।