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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 361, कुल 380 में से

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३३४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु होने वाली आसक्ति कभी-कभी भक्ति के बीभत्सरस के रूप में प्रकट होती है। इस प्रकार के कृष्णभक्तिरस का अनुभव करने वाला प्रायः शान्तरस में स्थित रहता है। बीभत्सभक्तिरस का वर्णन निम्नलिखित है। "यह व्यक्ति पहले केवल कामक्रिया और इन्द्रियतृप्ति में रुचि रखता था। अपने कामविकार की पूर्ति के लिये इसने रतिचौर्य में बड़ी निपुणता प्राप्त कर ली थी; परन्तु यह कैसा आश्चर्य है कि अब यह वही मनुष्य आँखों में आँसू भर कर श्रीकृष्ण के नाम का कीर्तन कर रहा है। अब जैसे ही किसी स्त्री के मुख को देखता है, तुरन्त मुँह सिकोड़ लेता है। इसकी मुखमुद्रा से प्रतीत होता है कि इसे अब मैथुन से घृणा हो गई है।" भक्ति के इस बीभत्सरस के अनुभाव हैं-अपने पूर्व जीवन के विचार पर थूकना, मुँह सिकोड़ना, नाक बन्द कर लेना, हाथ धोना, भागना, काँपना, रोमांचित हो जाना, पसीना आ जाना इत्यादि। इसमें ग्लानि, श्रम, मोह, निर्वेद, विषाद, चपलता, आवेग, जाड्य आदि व्यभिचारिभाव भी रहते हैं। जब कोई भक्त अपने पूर्व जीवन की जघन्य क्रियाओं पर शोक करता हुआ शरीर पर विशेष लक्षणों को प्रकट करता है तो उसके भाव को बीभत्सभक्तिरस कहा जाता है। यह कृष्णभावना के जाग्रत हो जाने के कारण होता है। इस सन्दर्भ में यह कथन है, "भगवान् की भक्ति के लवलेश का भी उदय हो जाने पर फिर इस हाड़-माँस से बने, रुधिर से भरे, दुर्गन्ध से पूर्ण शरीर में कोई रति का आनन्द कैसे ले सकता है?" यह अनुभव उसी को हो सकता है जो कृष्णभावना को प्राप्त हो गया हो और जिसे इस बात का पूर्ण बोध हो गया हो कि यह प्राकृत देह परम अधम प्रकृति की है। माता के गर्भ में कोई भाग्यवान बालक श्रीकृष्ण से प्रार्थना करता है, "हे कंस के शत्रु ! मैं इस प्राकृत देह के कारण बड़ा दुःख पा रहा हूँ। इस समय मैं अपनी माता के गर्भ में रुधिर, मूत्र और मल के बीच पड़ा हुआ हूँ। ऐसी विगर्हित स्थिति में जीवन धारण करता हुआ मैं अत्यन्त दुःख पा रहा हूँ। इसलिये हे कृपा के सागर ! मुझ पर प्रसन्न हों। मुझ में आपकी दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न होने की कोई योग्यता नहीं है; परन्तु फिर भी कृपया मेरी रक्षा करें।" नरक में गिरा प्राणी भी इसी प्रकार प्रार्थना करता है। वह भगवान् से कहता है, "हे नाथ ! यमराज ने मुझे गन्दे, कीड़ों से भरे और दुर्गन्धयुक्त स्थान में रखा है। मैं नाना प्रकार के

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