भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभयानकभक्तिरस तथा वीभत्सभक्तिरस [ ३३३ जिस समय केशी दानव बड़े भारी घोड़े का रूप धारण कर पेड़ों पर से कूद-कूद कर वृन्दावन में उत्पात कर रहा था, तो यशोमति मैया नन्द महाराज से कहने लगीं, "हमारा लाला बड़ा चंचल है । अतएव इसे बलपूर्वक घर में बन्द करके रखना चाहिये । मुझे घोड़े का रूप धारण कर उत्पात करते हुए केशी दैत्य से बड़ा भय लग रहा है ।" जब यह पता चला कि वह असुर क्रुद्ध होकर गोकुल में प्रवेश कर रहा है तो यशोदा मैया अपने बालक की रक्षा के लिये इतनी आतुर हो गईं कि उनका मुख सूख गया और नेत्रों में आँसू भर आए । श्रीकृष्ण के लिये भयानक लगने वाली किसी वस्तु को देखने अथवा सुनने से होने वाले भयानकभक्तिरस के ये कुछ अनुभाव हैं । पूतना राक्षसी के मारे जाने पर यशोदा मैया की कुछ सखियाँ उनसे घटना के विषय में पूछने लगीं । यशोदा मैया ने तुरन्त अपनी सखियों से निवेदन किया, "चुप हो जाओ, चुप हो जाओ । पूतना के बारे में कुछ न पूछो । उस घटना का स्मरण होते ही मैं दुःखी हो जाती हूँ । पूतना राक्षसी मेरे पुत्र को खाने आई थी और उसने मुझसे छल करके बालक को अपने अंक में भी ले लिया था । इसके बाद वह मर कर गिर पड़ी, जिस कारण उसके विशालकाय शरीर से भयानक शब्द हुआ ।" भयानकभक्तिरस में मुख का सूखना, निःश्वास, मुड़ कर देखना, अपने को छिपाना, घबराहट, शरण की खोज और जोर-जोर से रोना—ये सब अनुभाव हैं । कुछ अन्य व्यभिचारिभाव हैं—मोह, विस्मृति, भय की आशंका, इत्यादि । सब में भयरति स्थायिभाव है। किसी भी प्रकार का भय अपराधों अथवा भयानक परिस्थितियों के कारण होता है। अपराध नाना प्रकार से हो सकते हैं और भय का अनुभव अपराधी को होता है। जब भय किसी भयानक पदार्थ के कारण होता है तो उस पदार्थ की आकृति-प्रकृति तथा प्रभाव भयानक होते हैं। इसका एक उदाहरण पूतना राक्षसी है । भय राजा कंस जैसे आसुरी चरित्र के कारण भी हो सकता है और महान् शक्तिशाली इन्द्र, शंकर जैसे देवताओं के कारण भी हो सकता है। कंस जैसे असुरों को श्रीकृष्ण से भय होता था । परन्तु उनके भावों को भयानकभक्तिरस के अन्तर्गत नहीं समझा जा सकता । बीभत्सभक्तिरस प्रामाणिक सूत्रों से जाना जाता है कि जुगुप्सा के कारण श्रीकृष्ण में