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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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अध्याय ४८ भयानकभक्तिरस तथा बीभत्सभक्तिरस भयानकभक्तिरस श्रीकृष्ण के लिए भयानकभक्तिरस में श्रीकृष्ण स्वयं अथवा श्रीकृष्ण के लिए भयानक अन्य व्यक्ति आलम्बन विभाव होते हैं। जब भक्त अपने को श्रीकृष्ण के चरणकमलों का अपराधी अनुभव करता है तो श्रीकृष्ण स्वयं भयानकभक्तिरस के आलम्बन बन जाते हैं। जब प्रेमवश श्रीकृष्ण के सखा और सुहृद उनके लिए किसी भय की आशंका करते हैं तो वह अवस्था भी उनके भय का आलम्बन बन जाती है। जब ऋक्षराज श्रीकृष्ण के सामने खड़ा हुआ उनसे लड़ रहा था, तब अकस्मात् उसे अनुभव हुआ कि वे साक्षात् भगवान् हैं। ऐसे अवसर पर श्रीकृष्ण ने उससे कहा, "हे ऋक्षराज ! तुम्हारा मुख सूखा क्यों जा रहा है। मन से मेरे भय को निकाल दो। तुम्हारा हृदय इस प्रकार काँप क्यों रहा है। तनिक विश्राम करके स्वस्थ हो जाओ। मुझे तुम पर तनिक भी क्रोध नहीं है। परन्तु तुम जितना चाहो मुझ पर क्रोध कर सकते हो, क्योंकि इससे मेरे साथ लड़कर मुझे आनन्दित करके तुम अपनी सेवा का विस्तार करोगे।" कृष्णभक्तिरस की इस भयानक अवस्था में श्रीकृष्ण स्वयं भयानकरस के आलम्बन हैं। एक ऐसी भयानक अवस्था, जिसमें श्रीकृष्ण विषय हों, इस प्रकार है—बालकृष्ण से यमुना जल में अच्छी प्रकार से पराजित होकर कालिय नाग उनसे कहने लगा, "हे मुरारि ! मैंने अपने तप-त्याग से अनेक योग- सिद्धियों का अर्जन किया है। परन्तु फिर भी आपके सामने मैं कुछ भी नहीं हूँ। मैं परम तुच्छ हूँ। अतएव मुझ दीन जीव पर कृपा करें और मेरे प्रति अपने क्रोध को त्याग दें। मैं आपके यथार्थ स्वरूप को नहीं जानता। इसी अज्ञानवश अनेक भयंकर अपराध कर बैठा हूँ। कृपया मुझे बचायें। मैं परम अधम मूर्ख जीव हूँ। मुझ पर कृपा करें।" यह भयानक भक्तिरस का एक अन्य उदाहरण है।