भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरुणभक्तिरस और रौद्रभक्तिरस [ ३२६
मरकर यमराज के पास जाऊँगी। परन्तु मुझे दुःख है कि मुझे छल कर अब भी यह कृष्ण हँसे जा रहा है। हे राधिके ! तुम तो बड़ी बुद्धिमान् हो। फिर कैसे तुमने अपनी सारी प्रेम-सम्पदा को इस कामुक ग्वाले नव- युवक में लगा दिया है।" कभी-कभी श्रीकृष्ण को देखकर जरती कहने लगती, “अरे ओ ! युवतियों को लूटने वाले धूर्त ! मैं तेरे पास अपनी बहू के दुपट्टे को स्पष्ट देख रही हूँ। फिर भी तू झूठ बोल रहा है।" फिर वह चिल्ला-चिल्ला कर व्रजवासियों से कहने लगती, “हे वृन्दावनवासियो ! देखो इस नन्द महाराज के पुत्र ने मेरी बहू की गृहस्थी में आग लगा दी है।" श्रीकृष्ण जिन अर्जुन वृक्षों से बँधे हुए थे, उनके गिरने की गर्जना को सुनकर रोहिणीदेवी ने भी कृष्ण के लिए इसी प्रकार प्रेम को अभिव्यक्त किया था। सारा अडौस-पड़ौस तुरन्त दुर्घटना के स्थान पर दौड़ पड़ा। रुक्मिणीदेवी ने उस अवसर पर यशोदा मैया को डाँटते हुए कहा, “हे व्रजेन्द्रगेहनी ! अपने पुत्र को रस्सी से बाँध कर तुम उसे शिक्षा देने में बड़ी कुशल हो; सो ठीक है। परन्तु क्या तुम यह भी नहीं देख सकतीं कि तुम्हारा पुत्र संकट में पड़ गया है। वृक्ष पृथ्वी पर गिर रहे हैं और वह फिर भी इधर-उधर घूम रहा है।” यशोदा पर रोहिणीदेवी का यह क्रोध श्रीकृष्ण के कारण हुए रौद्रभक्तिरस का प्रतीक है। एक बार जब श्रीकृष्ण अपने गोप-सखाओं के साथ गोचारण भूमि में विचर रहे थे तो उनके मित्रों ने उनसे तालवन जाने का अनुरोध किया, जहाँ गर्धभासुर रहता था। श्रीकृष्ण के मित्र उस वन के वृक्षों के फल खाना चाहते थे; परन्तु उस असुर से भयवश वहाँ जाने में उनको संकोच था। अतएव उन्होंने श्रीकृष्ण से अनुरोध किया कि वे वहाँ जाकर गर्दभा- सुर का वध कर दें। जब श्रीकृष्ण ने ऐसा किया तो वे सब घर लौट आये और उनके इस समाचार से यशोदा मैया को बड़ी चिन्ता हुई, क्योंकि श्रीकृष्ण को अकेले ही तालवन जैसे भयंकर स्थान पर भेज दिया गया था। इस पर वे बालकों की ओर क्रोधभरी दृष्टि से देखने लगीं। राधारानी की एक सखी के क्रोध का भी एक उदाहरण मिलता है। जब श्रीकृष्ण के व्यवहार से रुष्ट होकर राधारानी ने उनसे बोलना बन्द कर दिया तो श्रीमती राधारानी के असन्तोष से कृष्ण को बडा दुःख हुआ और क्षमा-विनती के लिये वे उनके चरणकमलों में गिर पड़े। परन्तु फिर भी राधारानी सन्तुष्ट नहीं हुईं; उन्होंने श्रीकृष्ण से बातचीत नहीं की। इस पर एक सखी ने उन्हें इन शब्दों में डांटा, “तू