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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 357

३३० ] भक्तिरसामृतसिन्धु अतृप्ति की मथनी से अपने-आपको मथने दे रही है। तो फिर मैं क्या कह सकती हूँ? जा मेरे पास से दूर चली जा। तेरे पास रहने से मेरे शरीर में आग सी लग जाती है। मैं तेरे इस निष्ठुर व्यवहार को नहीं देख सकती, क्योंकि अपने मोरपंख से तेरे चरणों को छूते हुए प्रियतम श्रीकृष्ण के प्रति भी तू क्रोध से ऐंठी रही।" भक्तियोग में इस रूठने अथवा क्रोध के भाव को 'ईर्ष्या' कहते हैं। जब अक्रूर वृन्दावन को छोड़कर जा रहे थे तो कुछ वृद्धा गोपियों ने उन्हें डाँटते हुए कहा, "हे गन्दिनीनन्दन! तेरी निष्ठुरता यदुवंश को अपयश दे रही है। तू श्रीकृष्ण को लिए जा रहा है। इससे उनकी विरह की आशंका के कारण हम अत्यन्त करुण अवस्था को पहुँच रहे हैं। अब तेरे जाने से भी पहले सब की सब गोपियों के प्राणपखेरू प्रायः उड़ से गये हैं।" जब महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में शिशुपाल ने श्रीकृष्ण का अपमान किया तो पाण्डवों और कुरुओं में बड़ी हलचल हो गई। पिता- मह भीष्म भी इससे अछूते न रहे। उस समय नकुल ने बड़े क्रोध में भरकर कहा, "श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् हैं। उनके चरणनख वेदरूपी ज्योति से देदीप्यमान हैं। यदि कोई उनका अपमान करता है तो मैं पाण्डव घोषणा करता हूँ कि मैं उसके मस्तक पर अपनी उल्टी लात का प्रहार करूंगा और यमदंड के समान भयंकर अपने बाणों का उसे निशाना बनाऊँगा।" यह भी श्रीकृष्ण के लिये रौद्रभक्तिरस का उदाहरण है। इस प्रकार के दिव्य क्रोध में कभी-कभी हँसना, व्यंग्य वचन, कटु आक्षेप करना, अनादर करना आदि लक्षण होते हैं। कभी-कभी हाथों का मलना, दाँत किटकिटाना, आँखों का लाल हो जाना, होंठ चबाना, अत्यन्त भौंहें चढ़ाना, भुजाओं का फड़कना, भुजाओं का ठोंकना, चुप हो जाना, सिर झुका लेना, निःश्वास, टेढ़ी दृष्टि, धिक्कारना, सिर हिलाना, नेत्रों के किनारों पर लालिमा छा जाना, भौंहों का टेढ़ा होना, होंठों का फड़कना आदि अनुभाव होते हैं। कभी नेत्र लाल हो जाते हैं तो कभी म्लान पड़ जाते हैं। कभी क्रुद्ध पुरुष फटकारता है, तो कभी चुप पड़ जाता है। क्रोध के इन लक्षणों के दो भाग किये जा सकते हैं—सात्त्विक तथा व्यभिचारी। कभी-कभी आवेश, जड़ता, गर्व, निर्वेद, मोह, चपलता, असूया, उग्रता, अमर्ष एवं श्रम आदि व्यभिचारिभाव भी होते हैं। इन सब भावों में क्रोधरति स्थायिभाव मानी गई है।