भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु 'हंसदूत' में निम्नलिखित घटना का उल्लेख है। गोपियों ने हंसदूत से निवेदन किया कि वह श्रीकृष्ण के चरणकमलों के चिह्नों का अन्वेषण करे और मिल जाने पर उन्हें उसी प्रकार सिर पर धारण करे जिस प्रकार श्रीकृष्ण के सारे गोपबालकों को चुराने के बाद ब्रह्माजी ने उन्हें शिरोधार्य किया था। श्रीकृष्ण को चुनौती देने की भूल के लिये शोक करते हुए ब्रह्माजी ने उनके सामने झुककर प्रणाम किया था, जिससे उनका मुकुट श्रीकृष्ण के चरणचिह्नों से अंकित हो गया। गोपियों ने हंसदूत को स्मरण कराया कि कभी-कभी नारद जैसे महान् ऋषि भी इन चरण- चिह्नों को देखकर भाव-विह्वल हो जाते हैं और कभी-कभी जीवन्मुक्त महर्षियों में भी उन्हें देखने की लालसा जाग उठती है। "अतएव तुम्हें बड़े उत्साहपूर्वक श्रीकृष्ण के चरणचिह्नों को खोजना चाहिये," उन्होंने निवेदन किया। यह भी करुणभक्तिरस का सन्दर्भ है। एक बार नकुल के अनुज सहदेव को श्रीकृष्ण के चरणों से निस्सृत तेजोमय दीप्ति को देखकर बड़ा आनन्द हुआ। वह रोते हुए पुकार उठा, "माता माद्री तुम कहाँ हो ? पिता पाण्डु आप अब कहाँ हैं ? हा शोक ! हा शोक ! इस अवसर पर श्रीकृष्ण के चरणचिह्नों को देखने के लिये आप यहाँ नहीं हैं।" यह भी करुणभक्तिरस है। श्रीकृष्णविषया दृढ़ रति से रहित भक्ति में स्मित आदि लक्षण तो हो सकते हैं परन्तु करुणभक्तिरस का शोकभाव कभी नहीं हो सकता। इस करुणरति के मूल में सदा प्रेम रहता है। श्रीकृष्ण अथवा उनकी प्रियाओं को भय की आशंका को जैसे बलदेव और युधिष्ठिर प्रकट करते हैं, वैसा ऊपर वर्णन किया गया है। इस आशंका में श्रीकृष्ण की अचिन्त्य शक्तियों का अज्ञान कारण नहीं है; इनके मूल में है उनके लिये भक्त का प्रगाढ़ प्रेम। श्रीकृष्ण को भय होने की ऐसी आशंका पहले-पहल शोक के आश्रय के रूप में प्रकट होती है; परन्तु शनैः-शनैः वह करुणभक्तिरस में विकसित होकर विशिष्टता को प्राप्त हो जाती है और इस प्रकार अनिर्वचनीय आनन्द देती है। रौद्रभक्तिरस श्रीकृष्ण के लिये रौद्रभक्तिरस में श्रीकृष्ण ही निरन्तर क्रोध के विषय अर्थात् आलम्बन विभाव होते हैं। विदग्धमाधव (२.३७) में ललिता गोपी श्रीकृष्ण के कारण हुए अपने क्रोध को राधारानी के सामने व्यक्त करती है, "हे सखि ! मेरा चित्त संताप से भर गया है; इसलिये अब मैं