भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४७ करुणभक्तिरस और रौद्रभक्तिरस करुणभक्तिरस जब भक्तिभाव के कारण कृष्ण के सम्बन्ध में किसी प्रकार की शोकरति की उत्पत्ति हो तो उसे करुणभक्तिरस कहते हैं। इस भक्तिरस का उद्दीपन हैं श्रीकृष्ण के दिव्य गुण, रूप, लीला आदि । इस भक्तिरस में कभी-कभी शोक करना, भारी साँस लेना, रोना, भूमि पर गिर पड़ना और छाती पीटना आदि अनुभाव होते हैं। कभी-कभी आलस्य, निर्वेद, अपयश, दैन्य, चिन्ता, विषाद, ग्लानि, उत्सुकता, चपलता, उन्माद, विस्मृति, मरण, मोह और व्याधि आदि लक्षण भी होते हैं। भक्त के मन में श्रीकृष्ण के अनिष्ट की आशंका को शोकरति कहते हैं। वही इस करुणभक्तिरस में स्थायिभाव मानी जाती है। श्रीमद्भागवत (१०.१६.१०) में यह विवरण है। श्रीकृष्ण को यमुना में कालिय नाग के फनों में लिपटा हुआ देखकर उनके सर्वप्रिय गोपबालक बड़े उद्विग्न हो उठे। शोक, संताप और भयवश, मूढ़ होकर वे भूमि पर गिर पड़े । वे मोहवश समझ रहे थे कि श्रीकृष्ण किसी विपत्ति में पड़ गये हैं। अतएव उनमें इन लक्षणों का प्रकट होना बिल्कुल आश्चर्यजनक नहीं। उन्होंने अपनी मित्रता, अपना सर्वस्व, यहाँ तक कि अपनी इच्छा और आत्मा भी श्रीकृष्ण को अर्पण कर रखी थी। श्रीकृष्ण के भयंकर विषमय कालिय हृद में उतर जाने पर यशोदा मैया नाना प्रकार की शंका करती हुई गरम-गरम साँस लेने लगीं। नेत्रों से विगलित अश्रुधारा ने उनके वस्त्रों को भिगो डाला । इस प्रकार वे प्रायः मूर्च्छित हो गईं । इसी प्रकार जब शंखासुर दैत्य एक-एक करके श्रीकृष्ण की महिषियों पर आक्रमण कर रहा था तो श्रीकृष्ण के अग्रज बलराम जी एकदम काले पड़ गये ।