भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु के भाव मिले रहते हैं कि यह कहना बहुत कठिन है कि ये भाव कब वास्तव में मित्र स्थिति को प्राप्त हो रहे हैं और कब विरोध की स्थिति में पहुँच गये हैं। एक दूसरे से रसों की मित्रता दिखाने के लिये विद्वानों ने किसी विशेष मिश्रण में पाए जाने वाले रसों के अंगीरस और अंगरस—इस प्रकार दो भेद किये हैं। इस विधि के अनुसार मुख्यरस को अंगीरस कहते हैं और गौणरस अंगरस कहलाता है। अंगरस और अंगीरस का विवरण निम्नलिखित वाक्य से स्पष्ट हो जाता है, “सब जीव परब्रह्म रूपी अग्नि के स्फुलिंग जैसे हैं। अतः मुझ जीवरूप स्फुलिंग को अग्नि रूप भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य सेवा में नियुक्त होने का अवसर क्या मिलेगा।” इस वाक्य में शान्तरस अंगीरस है और भगवान् की सेवा का दास्यरस अंगरस है। वास्तव में तो ब्रह्मज्योति में भगवान् और भक्त में होने वाले प्रेमरस-विनिमय की कोई सम्भावना ही नहीं होती। एक अन्य भक्त कहता है, “मैं त्वचा से ढके, कफ, वात, पित्त, शुक्र और शोणित के ढेररूप शरीर में नाना प्रकार से रमण कर रहा हूँ। मुझे धिक्कार है, क्योंकि इस देहात्मबुद्धि के कारण मैं भगवत्स्मरण रूप दिव्य आनन्द का आस्वादन नहीं कर सकता।” इस वाक्य में शान्त और बीभत्स —दोनों रस हैं। शान्तरस अंगीरस है, जबकि बीभत्सरस अंगरस है। एक अन्य भक्त कहता है, “अब मैं चँवर की हवा डुलाते हुए सिंहासन पर विराजमान भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा में प्रवृत्त हो सकूँगा। वे नील मेघ वर्ण श्यामल सच्चिदानन्द विग्रह परब्रह्म हैं। इसलिये अब मैं मांस और रुधिर से सने शरीर के स्नेह को छोड़ दूँगा।” इस वाक्य में भी दास्य और बीभत्स का मिश्रण है। दास्य अंगी है और बीभत्स अंगरस है। एक अन्य वाक्य इस प्रकार है, “वह दिन कब होगा जब मैं अविद्या से मुक्त होकर शुद्ध हुआ निरन्तर कृष्णसेवा की अवस्था को प्राप्त हो सकूँगा। उनके सुन्दर मुखमण्डल और कमलनयनों को निहारता हुआ तब मैं निरन्तर उनकी सेवा करने के योग्य हो जाऊँगा।” इस वाक्य में शान्त- रस अंगी है और दास्यरस अंग है। एक अन्य कथन है, “श्रीकृष्ण के चरणकमल का स्मरण करते हुए भावविह्वल हुए इस भगवद्भक्त के नृत्य को तो देखो। इसे देखने मात्र से