भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअद्भुतभक्तिरस और वीरभक्तिरस [३२३ एक भक्त बोला, “हे कृष्ण ! मेघगर्जन और सिंहनाद जैसी वीररस की क्रियाओं के लिये तुम्हारा प्रतिद्वन्द्वी श्रीदामा सर्वोत्कर्षशाली है।” युद्ध, दान, दया और धर्म सम्बन्धी वीररस की क्रियाओं को सात्त्विक कहते हैं जबकि गर्व, भावुकता, वृत्ति, घृणा, मति, हर्ष, उत्साह, अमर्ष, असूया, और स्मृति आदि व्यभिचारिभाव हैं। जब स्तोककृष्ण नामक श्रीकृष्ण का एक सखा उनसे लड़ रहा था तो उसके पिता ने श्रीकृष्ण से लड़ने के लिये उसे डाँटा; श्रीकृष्ण सम्पूर्ण व्रजवासियों के जीवन-प्राण जो ठहरे। पिता की डाँट को सुनकर स्तोककृष्ण ने लड़ना छोड़ दिया । परन्तु श्रीकृष्ण उसे चुनौती देते रहे; इसलिये इस ललकार का मुकाबला करने के लिये स्तोककृष्ण ने अपनी लाठी पकड़ कर और फिर उसे घुमा-घुमाकर अपनी दक्षता का परिचय दिया । एक बार भद्रसेन को ललकार कर श्रीदामा बोला, “हे सखे ! तुम्हें अभी मुझसे कोई भय नहीं होना चाहिये। पहले बलराम को हराकर, श्रीकृष्ण को पीटकर ही मैं तुम्हारे सामने आऊँगा।” यह कहकर भद्रसेन बलराम के दल को छोड़कर श्रीकृष्ण के साथ हो गया । इससे उसके मित्रों को उतना ही क्षोभ हुआ जैसे मन्दराचल से मथे जाने पर समुद्र को हुआ था। अपने गम्भीर गर्जन से उसने अपने सब सखाओं को बहरा कर दिया और श्रीकृष्ण को अपनी वीर क्रियाओं से आह्लादित किया । एक समय श्रीकृष्ण ने अपने सब मित्रों को चुनौती देते हुए कहा “हे सखाओ ! देखो-देखो मैं महान् वीरता के साथ कूद रहा हूँ; इसलिये, यहाँ से भागो मत ।” इन चुनौती भरे शब्दों को सुनकर वरूथप नामक सखा श्रीकृष्ण की ललकार को स्वीकार करते हुए उनसे भिड़ गया । एक सखा बोला, “श्रीदामा दामोदर को हारा देखने के लिये पूरा प्रयास कर रहा है। मैं समझता हूँ कि यदि हमारा शक्तिशाली सुबल उसके साथ हो जाए तो फिर दोनों की जोड़ी रत्नजड़ित स्वर्ण जैसी मनोहर लगेगी।” इन वीररस की क्रियाओं में श्रीकृष्ण के सखा ही प्रतिद्वन्द्वी हो सकते हैं। श्रीकृष्ण के शत्रु वास्तव में उनका विरोध कभी नहीं कर सकते। अत- एव श्रीकृष्ण के सखाओं का उन्हें इस प्रकार चुनौती देना वीरभक्तिरस कहलाता है। दानवीर दो प्रकार के होते हैं—उदार और त्यागी । जो श्रीकृष्ण के सुख के लिये सर्वस्व त्याग कर सकता है उसे उदार कहते हैं। जब कोई श्रीकृष्ण को देखकर त्याग करने की इच्छा करता है तो श्रीकृष्ण उस दान-