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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 337

अध्याय ४४ मधुरभक्तिरस मधुररति में श्रीकृष्ण के प्रति शुद्धभक्त के आकर्षण को भक्ति का मधुऱरस कहा जाता है। यद्यपि ऐसा मधुरभाव बिल्कुल भी प्राकृत नहीं होता, फिर भी इस दिव्य प्रेम और प्राकृत काम-क्रीड़ाओं में समानता सी लगती है। अतएव जो केवल लौकिक काम-क्रीड़ाओं में रुचि रखते हैं वे इस दिव्य प्रेम को नहीं समझ सकते । दिव्य भक्तिरस का यह विनिमय उन्हें बड़ा रहस्यमय प्रतीत होता है। यही कारण है कि श्रील रूपगोस्वामी मधुरभक्तिरस का अत्यन्त संक्षिप्त वर्णन करते हैं। मधुरभक्तिरस के आलम्बन हैं श्रीकृष्ण, राधारानी और उनकी नित्य सहचारी श्रीकृष्ण की प्रियाएँ। श्रीकृष्ण असमोर्ध्व हैं। उनके समान कोई नहीं है और न ही कोई उनसे अधिक है। भगवान् श्रीकृष्ण का सौन्दर्य भी असमोर्ध्व है; उसकी कोई तुलना नहीं। मधुररस की क्रीड़ा में सबसे बढ़कर होने के कारण वे ही सम्पूर्ण मधुररस के आलम्बन माने जाते हैं। जयदेव गोस्वामी के गीतगोविन्द में एक सखी किसी दूसरी से कहती हैं—"इस जगत् में श्रीकृष्ण सब आनन्द के रसराज हैं। उनकी देह कमल के समान अति कोमल है और गोपियों के साथ उनका आवास- व्यवहार किसी युवती के लिये किशोर के आकर्षण जैसा है।" यही दिव्य मधुररस का आलम्बन है। गोपियों के चरणचिह्नों की अनुगति करते हुए एक शुद्धभक्त उनसे प्रार्थना करता है—"आकर्षक अंग वाली गोपांगनाओं को सादर प्रणाम है, जो अपनी रूपमाधुरी से भगवान् श्रीकृष्ण का सेवन कर रही हैं।" इन सब गोपांगनाओं में श्रीमती राधारानी सबसे प्रमुख हैं। श्रीमती राधारानी के रूप का वर्णन इस प्रकार है, "उनके नेत्र चकोरी की चारुता को भी हरने वाले हैं। जब कोई राधारानी के मुख- मण्डल को देख लेता है तो तुरन्त चन्द्रमा के सौन्दर्य की निन्दा करने लगता है। उनके श्रीअंग की दीप्ति स्वर्ण को भी लजाने वाली है। इस