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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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मधुरभक्तिरस [ ३११

प्रकार दिव्य सौन्दर्य से सुशोभित श्रीमती राधारानी को देखो ।'' राधा- रानी के लिये श्रीकृष्ण के आकर्षण को उन्होंने स्वयं व्यक्त किया है, “जब मैं श्रीमती राधारानी के सौन्दर्य का आस्वादन करने के लिये कुछ हास-परिहास करता हूँ तो राधारानी इन हास्य-वचनों को बड़े ध्यान से सुनती हैं। परन्तु अपने शरीर की अंग वृत्ति और कुछ अन्य कहकर बाहर ऐसा प्रकट करती हैं कि मानो वे मेरी बात को न सुन रही हों। उनके इस प्रकार मेरी उपेक्षा कर देने से मुझे अनन्त सुख मिलता है, इससे उनकी माधुरी इतनी बढ़ जाती है कि मेरा आनन्द शत् गुणा हो जाता है ।'' इसी प्रकार गीतगोविन्द में कहा है कि जब कंस के शत्रु श्रीकृष्ण राधारानी का आलिंगन करते हैं तो वे उनके प्रेम में बंध जाते हैं और अन्य सब गोपियों का संग छोड़ बैठते हैं। श्रील रूपगोस्वामी की पद्यावली के अनुसार जब गोपियाँ श्रीकृष्ण की वंशीध्वनि को सुनती हैं तो वे तुरन्त अपने गुरुजनों के रोष, अपकीर्ति और पतियों के कठोर व्यवहार को भुला देती हैं। वे केवल बाहर जाकर श्रीकृष्ण का अन्वेषण करने को आतुर हो उठती हैं। जब गोपियाँ श्रीकृष्ण से मिलती हैं तो परस्पर होने वाले कटाक्ष और स्मितादि अनुभाव कहे गये हैं। 'ललितमाधव' में रूपगोस्वामी ने वर्णन किया है कि श्रीकृष्ण का कटाक्ष ठीक यमुना जैसा है, और राधारानी की हँसी चन्द्रिका के समान है। जब यमुना और चन्द्रिका का संग होता है तो जल अमृत जैसा हो जाता है, उसे पीने से बड़ी तृप्ति होती है। वह हिम के समान शीतल और सब संतापों को हरने वाला होता है। इसी प्रकार पद्यावली में राधा की एक नित्य सहचरी कहती है, “हे चन्द्रमुखी राधे ! तेरा शरीर अत्यन्त पुलकित हो रहा है; आँखों में आनन्द के आँसू भर आये हैं, वाणी गद्गद हो रही है और छाती काँप रही है, इससे जान पड़ता है कि कृष्ण की मुरलीध्वनि की माधुरी ने तेरे चित्त को चंचल बना दिया है, द्रवित कर दिया है ।'' पद्यावली में ही प्रेम में होने वाले निर्वेद के भावों का वर्णन है, श्रीमती राधारानी कहने लगीं, “कामदेव ! मेरे ऊपर अपने पंचबाणों को चलाकर मुझे उत्तेजित न करो। हे वायु ! प्रगाढ़ मकरन्द रस से मेरी देह को मत भरो। श्रीकृष्ण की प्रेमभंगी से वंचित हो जाने के बाद अब इस देह को धारण करने का क्या लाभ ? जीव आज इस देह को धारण करना नहीं चाहता ।'' यह श्रीकृष्ण के प्रेम में उठने वाले निर्वेद भाव का लक्षण है।