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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 343

अध्याय ४५ हास्यभक्तिरस 'भक्तिरसामृतसिन्धु' के चौथे विभाग में श्रील रूपगोस्वामी ने हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, भयानक तथा बीभत्स—इन सात गौण भक्तिरसों का विवरण दिया है। इन भक्तिरसों का वर्णन करते हुए उन्होंने विविध भावों की परस्पर मैत्री-वैर की स्थिति और रसाभासों का भी वर्णन किया है। जब एक प्रकार का भक्तिरस विरुद्ध विधि से किसी दूसरे रस से मिल जाये तो ऐसी स्थिति को रसाभास कहते हैं। दक्ष विद्वान् कहते हैं कि हास्यरस प्रायः युवकों में अथवा वृद्धों और शिशुओं के समूहों में पाया जाता है। कभी-कभी अत्यन्त गम्भीर स्वभाव वालों में भी यह दृष्टिगोचर होता है। एक बार एक वृद्ध व्यापारी यशोदा मैया के द्वार पर पहुँचा तो श्रीकृष्ण ने यशोदा मैया से कहा, "मैया ! मैं इस सड़ी हुई आकृति वाले भयंकर बूढ़े के पास नहीं जाना चाहता। यदि मैं इसके पास जाऊँ तो यह मुझे अपनी पिटारी में बन्द करके तुमसे दूर ले जायगा।" इस प्रकार आश्चर्यमय कृष्ण अपनी माता की ओर देखने लगे जबकि द्वार पर खड़ा हुआ वह पथिक रोकने पर भी अपनी हँसी को नहीं दबा सका, अर्थात् हँस ही पड़ा। इस दृष्टान्त में स्वयं श्रीकृष्ण हास्यरस के आलम्बन हैं। श्रीकृष्ण के एक सखा ने उन्हें सूचित किया, "श्रीकृष्ण मुख खोलो, मैं तुम्हें दही-बूरा खिलाता हूँ।" श्रीकृष्ण ने तुरन्त अपना मुख खोल दिया; परन्तु दही-बूरा के स्थान पर मित्र ने उनके मुख में एक फूल डाल दिया। जब श्रीकृष्ण ने उसे चखा तो अपने मुख को सिकोड़ कर मोड़ लिया यह देखकर वहाँ खड़े उनके सखा बड़े उच्च स्वर से हँसने लगे। एक बार घर आये ज्योतिषी से नन्द महाराज ने पूछा, "हे महर्षि ! कृपया मेरे बालक का हाथ देखिये। मुझे बताइये कि यह कितने वर्ष तक जीवित रहेगा और क्या हजारों गायों का स्वामी बन पायेगा।" यह