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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 344, कुल 380 में से

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पृष्ठ 344

हास्यभक्तिरस [ ३१७

सुनकर ज्योतिषी हँसने लगा तो नन्द महाराज ने उनसे पूछा, “श्रीमान् आप हँसते हुए अपने मुख को छिपा क्यों रहे हैं।” इस प्रकार के हास्यरस में श्रीकृष्ण की वेशभूषा और चरित आदि उद्दीपन विभाव हैं। नाक, होंठ तथा गालों का फड़कना आदि अनुभाव तथा हर्ष, आलस्य, गोपन आदि व्यभिचारिभाव हैं। श्रील रूपगोस्वामी की गणना के अनुसार हास्यरति छः प्रकार की होती है—स्मित, हसित, विहसित, अवहसित, अपहसित, अतिहसित। इनमें से स्मित, हसित और विहसित मुख्य भेद हैं और अवहसित, अपहसित और अतिहसित गौण भेद हैं। जिस हँसी में दाँत न दिखलाई दें और नेत्रों तथा गालों का निश्चित विकास हो उसे स्मित कहते हैं। जब श्रीकृष्ण जरती के घर में दही चुरा रहे थे तो उसे उनकी क्रिया का भास हो गया और वह जल्दी-जल्दी उन्हें पकड़ने के लिए आने लगी। उस समय जरती से अत्यधिक भयभीत होकर श्रीकृष्ण अपने अग्रज बलदेव के पास गये। वे बोले, “हे भ्राता! मैंने दही की चोरी की है। देखो-देखो जरती शीघ्रता से मुझे पकड़ने आ रही है।” इस प्रकार पीछे आ रही जरती के भय से श्रीकृष्ण का बलदेव की शरण में जाना देखकर स्वर्ग के सब महर्षि गण हँसने लगे। उनकी इस हँसी को स्मित कहते हैं। जिस हँसी में दाँत थोड़े-थोड़े दिखाई देने लगें उसे हसित कहते हैं। एक दिन जब राधारानी का तथाकथित पति अभिमन्यु घर को लौट रहा था तो उसने देखा कि श्रीकृष्ण उसके घर में हैं। श्रीकृष्ण ने तुरन्त अभि- मन्यु का सा भेष बना लिया और अभिमन्यु की माँ जटिला के पास जाकर कहने लगे, “हे माता! मैं तुम्हारा असली पुत्र अभिमन्यु हूँ। देखो-देखो कृष्ण ठीक मेरा वेश बनाकर तुम्हारे पास आ रहा है।” जटिला को तुरन्त विश्वास हो गया कि यही उसका असली पुत्र है और इसलिये घर आते हुए अपने वास्तविक पुत्र पर वे बड़ी क्रुद्ध हुई। वह उसे बाहर भगा रही थी और वह पुकार रहा था, “माँ, माँ! तुम यह क्या कर रही हो?” यह देखकर वहाँ उपस्थित राधारानी की सब सखियाँ हँसने लगीं और उनके दाँत थोड़े दिखाई दिये। यह हसित का उदाहरण है। जिस हँसी में दाँत स्पष्ट दिखाई दें उसे विहसित कहते हैं। एक दिन जब श्रीकृष्ण जटिला के घर में दही-मक्खन की चोरी कर रहे थे तो उन्होंने अपने सखाओं को आश्वस्त करते हुए कहा, “हे सखाओ! यह बुढ़िया इस समय बड़ी-बड़ी गहरी साँसें लेती हुई सो रही है। इसलिए

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