भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
पृष्ठ 318, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंसख्यरस में प्रेम के व्यवहार [ २६१ ]
उन्हें विजयी बनायेंगे। वे आपस में बैठकर कर्तव्य-अकर्तव्य का विचार करते, एक दूसरे को हितकार्य में प्रवृत्त करते । कभी-कभी वे एक-दूसरे के मुख में पान खिलाते अथवा एक-दूसरे के शरीरों में चन्दन का आलेप करते । कभी-कभी हास-परिहास के लिये वे विचित्र रूपों में अपने मुखों को सजाते । श्रीकृष्ण के सखाओं का एक अन्य कार्य स्पर्धापूर्वक श्रीकृष्ण को हराना था। वे उनके वस्त्रों को खींच लेते, तो कभी उनके हाथ में पकड़े हुए पुष्पों को । कभी-कभी वे एक-दूसरे को अपने शरीर की सज्जा में प्रवृत्त करते और ऐसा न करने पर हाथापाई का प्रसंग भी उठ आता । श्रीकृष्ण और उनके सखाओं के ये सामान्य कार्य हैं। श्रीकृष्ण के सखाओं का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य गोपियों के पास श्रीकृष्ण का और श्रीकृष्ण के पास गोपियों का दूत बनकर जाना है। वे गोपियों से श्रीकृष्ण का परिचय कराते और फिर श्रीकृष्ण के लिये दूत का कार्य करते । जब गोपियों और श्रीकृष्ण में प्रणयकलह हो जाती तो श्रीकृष्ण की उपस्थिति में तो ये सखा श्रीकृष्ण का ही पक्ष लेते, परन्तु जब श्रीकृष्ण वहाँ नहीं होते तो गोपियों का साथ देते। इस प्रकार कभी एक का पक्ष लेते हुए और कभी दूसरे का पक्ष लेते हुए वे बड़ी चातुरी के साथ कानाफूसी करते । श्रीकृष्ण के सेवक समय-समय पर उनके लिये फूल चुनते, उनके शरीर को अलंकारों से सजाते-सँवारते, उनके आगे नाचते-गाते, उन्हें गोचारण में सहायता देते, उनके शरीर की मालिश करते, उनके लिये सुन्दर-सुन्दर पुष्पों के हार बनाते और कभी-कभी उन्हें हवा करते । ये सब श्रीकृष्ण के सेवकों के प्रधान कर्तव्य हैं। श्रीकृष्ण के सखा और सेवक दोनों मिलकर सेवा करते और उनकी इन सब क्रियाओं का नाम अनुभाव है । जब श्रीकृष्ण कालिय नाग का अनुशासन करके यमुना से निकले तो श्रीदामा सबसे पहले उनका आलिंगन करने के लिये दौड़ा; परन्तु वह चाहते हुए भी अपने स्तम्भित हाथों को ऊपर न उठा सका । जब श्रीकृष्ण अपनी वंशी बजाते तो उससे निकली ध्वनि स्वाति नक्षत्र में आकाश में होने वाली मेघों की गर्जना जैसी लगती । वैदिक ज्योति शास्त्र के अनुसार यदि स्वाति नक्षत्र की वर्षा सागर पर गिरे तो वह मोती को जन्म देती है और यदि सर्प पर गिरे तो रत्नों की उत्पत्ति होती है । इसी प्रकार जब स्वाति नक्षत्र के मेघगर्जन के समान श्रीकृष्ण की वेणु गरजी तो श्रीदामा के शरीर पर उत्पन्न स्वेदकण मुक्ताहल की सी शोभा पाने लगे ।