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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 319

२६२] भक्तिरसामृतसिन्धु श्रीकृष्ण और श्रीदामा को परस्पर आलिंगन करते देखकर श्रीमती राधारानी तनिक ईर्ष्या से भर गईं और अपने क्रोध को छिपाकर बोलीं, "हे सुबल ! तुम बड़े भाग्यवान् हो, जो पूज्यों की उपस्थिति में भी तुम्हें और श्रीकृष्ण को परस्पर आलिंगन करने में जरा संकोच नहीं हुआ । अवश्य ही तुमने पूर्वजन्म में महान् तप-त्याग किया होगा।" श्रीमती राधारानी प्रायः श्रीकृष्ण का आलिंगन किया करती थीं। परन्तु पूज्यों की उपस्थिति में उनके लिये ऐसा करना सम्भव न था; जबकि सुबल ऐसा खुले रूप से कर सका । अतएव राधारानी ने उसके सौभाग्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की । जिस समय श्रीकृष्ण ने कालिय दह में प्रवेश किया तो उनके अंतरंग सखा इतने उद्विग्न हो उठे कि उनके शरीर का रंग उड़ गया और वे भयंकर धड़धड़ ध्वनि करने लगे । ऐसी अवस्था में वे तुरन्त अचेतन होकर भूमि पर गिर पड़े । इसी प्रकार जब वन में अग्नि लगी तो श्रीकृष्ण के सभी सखाओं ने अपने गोधन की चिन्ता किये बिना चारों ओर से उन्हें घेर लिया और अग्नि की ज्वाला से उनकी रक्षा करने लगे। सखाओं के इस व्यवहार को मनीषि जनों ने व्यभिचारी कहा है। व्यभिचारिभाव में कभी-कभी मद, दक्षता, भय, आलस्य, हर्ष, गर्व, श्रम, धृति, व्याधि, विस्मृति और दैन्य आदि भाव होते हैं। ये सब श्रीकृष्ण के व्यभिचारिभाव के सामान्य लक्षण हैं । जब श्रीकृष्ण और उनके सखाओं में सम्भ्रम के भाव से सर्वथा रहित रति होती है जिसमें वे एक-दूसरे को समान समझते हैं तो ऐसे सख्य भाव को स्थायी कहते हैं। श्रीकृष्ण से ऐसी घनिष्ठ सख्यरति में प्रेम के प्रणय, प्रेम, स्नेह तथा राग आदि लक्षण प्रकट रहते हैं । स्थायी का उदाहरण अक्रूर से कहे अर्जुन (ये अर्जुन भगवद्गीता के अर्जुन से भिन्न हैं) के वाक्य से प्रकट होता है—"हे गान्दिनीनन्दन ! कृपया श्रीकृष्ण से पूछियेगा कि मैं अपनी भुजाओं में उनका आलिंगन कब कर सकूँगा ?" जब श्रीकृष्ण की श्रेष्ठता का पूर्ण ज्ञान हो, परन्तु फिर भी उनसे सख्यरस के व्यवहार में सम्भ्रम की गन्ध का भी अभाव हो तो उस अवस्था को प्रणय कहते हैं। इस प्रणय का एक उज्ज्वल उदाहरण है—जब शिव आदि देवता भगवान् के कीर्तिमय ऐश्वर्यों को बखानते हुए सादर प्रणाम कर रहे थे तो श्रीकृष्ण के सामने उनके कन्धे पर हाथ रख कर खड़ा अर्जुन उनके मोरपंख से धूलि झाड़ने लगा ।