भारतकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 317, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 317

२६० ] भक्तिरसामृतसिन्धु बहुत से पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र तक हो चुके थे। गोप-सखाओं ने एक बार श्रीकृष्ण से कहा, "हे कृष्ण तुम्हें इन अलंकारों से क्या प्रयोजन ? तुम्हारा दिव्य रूप इतना मनोहर है कि तुम्हें इनकी कोई आवश्यकता नहीं।" इस अवस्था में जब भी श्रीकृष्ण प्रातःकाल अपनी वंशी को बजाते हैं तो उनके सारे सखा तुरन्त शैय्या को त्याग कर उनके साथ गोचारण को जाने के लिये प्रस्तुत हो जाते हैं। श्रीकृष्ण के एक सखा ने कहा, "हे गोप बालकों ! गोवर्धन पर्वत के ऊपर से आ रही श्रीकृष्ण की वंशीध्वनि बता रही है कि अब हमें उन्हें खोजने के लिये यमुना तट पर नहीं जाना पड़ेगा।" पार्वती ने अपने पति भगवान् शिव से कहा, "हे पंचमुख ! तनिक पाण्डवों की ओर देखिये । श्रीकृष्ण के पांचजन्य नामक शंख की ध्वनि को सुनकर वे अपने बल को फिर से प्राप्त हो गये हैं और अब सिंह के समान गर्जन कर रहे हैं।" इस अवस्था में एक बार श्रीकृष्ण ने ठीक राधारानी सा वेष बनाया। उनका प्रयोजन अपने मित्रों में हास-परिहास का संचार करना था। उन्होंने सोने के कुण्डल धारण कर लिये और अपने काले रंग को ढकने के लिये राधारानी के वर्ण के समान कुंकुम का आलेप कर लिया। उनकी इस वेष-भूषा को देखकर सुबल मित्र को बड़ा आश्चर्य हुआ। श्रीकृष्ण कभी-कभी खेल-खेल में अपने अंतरंग सखाओं के साथ लड़ते अथवा भुजाओं से कुश्ती करते। कभी गेंद खेलते तो कभी द्यूत। कभी वे एक दूसरे को अपने कंधे पर उठाते और कभी कूदने में अपनी कुशलता दिखाते गोपबालक भी पलने के आसन वाले झूले पर साथ-साथ बैठकर तथा नाना प्रकार के परिहास और जलाशयों में एक साथ विहार करके श्रीकृष्ण को प्रसन्न करते थे। ये सब क्रियाएँ अनुभव कहलाती हैं। सब सखा श्रीकृष्ण के संग में इकट्ठे होते तो वे तुरन्त इन सब कार्यों, विशेषतया नाचने में प्रवृत्त हो जाते। उनकी कुश्ती के सम्बन्ध में एक मित्र श्रीकृष्ण से कहता है, "सखा ! हे अघारी ! तुम बड़े अभिमान के साथ आज मित्रों में घूम-घूमकर अपनी भुजाओं के बल का प्रदर्शन कर रहे हो इसका कारण कहीं यह तो नहीं कि तुम मुझसे ईर्ष्यालु हो। मैं यह भली प्रकार से जानता हूँ कि तुम कुश्ती में मुझे हरा नहीं सकते। मुझे हरा न सकने की निराशा में मैंने तुम्हें बहुत देर तक अकेले बैठे देखा है।" श्रीकृष्ण के सारे सखा बड़े ही साहसी थे। किसी भी कठिनाई से नहीं डरते थे। उन्हें पूरा विश्वास था कि श्रीकृष्ण सब उद्यमों में