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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 331

: ३०४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु क्रियाएँ हैं। ये सब वात्सल्यरस के सात्त्विक भाव हैं जिनमें आठ प्रकार के लक्षण पूर्ण रूप से प्रकट रहते हैं। श्रीमद्भागवत (१०.१३.२२) में शुक- देव गोस्वामी राजा परीक्षित से कह रहे हैं, “गोपबालकों की माताएँ श्रीभगवान् की योगमाया शक्ति से मोहित थीं। इसलिये जैसे ही वे अपने बालकों की वंशीध्वनि सुनतीं, वैसे ही उठ कर खड़ी हो जातीं और मन ही मन अपने पुत्रों का आलिंगन करने लगतीं, जो साक्षात् श्रीकृष्ण की अन्तरंगा शक्ति द्वारा रचे गये थे। उन्हें अपने से उत्पन्न जानकर वे उन्हें अपनी भुजाओं में लेकर आलिंगन करने लगतीं और उनकी देह को अपने हृदय पर रख कर सहलातीं। ऐसी अवस्था में उत्पन्न भाव अमृत से भी अधिक मधुर होते और माताओं के स्तनों से बहते दूध को उनके बालक तुरन्त पी जाते।” श्रील रूप गोस्वामी द्वारा संकलित 'ललितमाधव' में श्रीकृष्ण का इन शब्दों में सम्बोधन किया गया है—“हे कृष्ण ! जब तुम गोचारण में संलग्न होते हो तो गाय और बछड़ों के खुरों से उठी हुई धूल तुम्हारे सुन्दर मुख और तिलक को ढक लेती है और तुम बिल्कुल धूली से भर जाते हो। परन्तु जब घर को लौटते हो तो यशोदा मैय्या के स्तनों से बहता हुआ दूध इस धूलि के आवरण को धो डालता है। जैसे अभिषेक में श्रीमूर्ति को स्नान कराया जाता है उसी प्रकार तुम भी इस दूध से शुद्ध हुए प्रतीत होते हो।” मन्दिरों में प्रथा है कि यदि कोई अशुद्ध कार्य बन जाए तो श्रीमूर्ति को दुग्ध में स्नान कराया जाता है। श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। पर वे नित्य यशोदा मैय्या के स्तनों से निस्यन्दित दुग्धधारा में स्नान करते थे, जिससे धूलि का आवरण उन पर से हट जाता था। कभी-कभी यशोदा मैय्या भाव में स्तम्भित हो जातीं। जिस समय श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत धारण कर रखा था उस समय यशोदा मैय्या को उनका आलिंगन करने में संकोच हुआ और वे स्तम्भित रह गईं। श्रीकृष्ण को पर्वत उठाकर संकट में पड़े देखकर यशोदा के नेत्रों में आँसू भर आये। नेत्रों के अश्रुपूरित हो जाने के कारण वे श्रीकृष्ण की ओर अधिक न देख सकीं और चिन्ता के कारण उनका कंठ रुद्ध हो गया। इस लिये वे श्रीकृष्ण को क्या करना चाहिये, यह भी नहीं बतला सकीं। यह प्रेम में स्तम्भित हो जाने का उदाहरण है। अपने बालक को पूतना आदि राक्षसों के संकट से मुक्त हुआ जानकर यशोदा मैय्या को प्रेमवश अपार हर्ष होता। श्रीमद्भागवत (१०. १७.१६) में शुकदेव गोस्वामी कहते हैं कि खोये बालक के फिर से मिल जाने