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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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वत्सलभक्तिरस | ३०३ काल की चपल लीलाओं में श्रीकृष्ण प्रायः दूध-दही के मटकों पात्रों को फोड डालते हैं, दही को आंगन में बिखेर देते हैं और मक्खन की चोरी करते हैं। कभी-कभी वे मथनी को भी तोड़ डालते हैं और कभी मक्खन को अग्नि मे स्वाहा कर देते हैं। इस प्रकार वे मैय्या यशोदा के दिव्य आनन्द को नित्य बढ़ाया करते हैं। इस सन्दर्भ में यशोदा मैय्या ने एक बार अपनी दासी मुखरा से कहा था—"सशंक दृष्टि से चारों ओर देखता हुआ बार-बार धीरे-धीरे लता से निकल कर आगे पग रखता हुआ यह कृष्ण चला आ रहा है। अरि देख तो ! लगता है यह सीधे माखन चुराकर आया है। चुपचाप खडी रह, इसे पता न चले कि हमने देख लिया है। मैं इसकी चतुर भ्रू-भंगिमा, डरी हुई आँखों और सुन्दर मुख को देखना चाहती हूँ।" श्रीकृष्ण के चुपके-चुपके माखन चुराने की लीला में यशोदा मैय्या को उनका सिर सूंघने, कभी कभी अपने हाथ से शरीर पर हाथ फेरने, आर्शीवाद देने, आज्ञा देने, लालन-पालन करने और चोरी न करने का उपदेश आदि देने का आस्वादन मिलता था। ये सब लीलाएँ वात्सल्यरस में होती हैं। यह विशेष रूप से दर्शनीय है कि चोरी करने की बालकोचित प्रवृत्ति भगवान में भी रहती है। अतएव यह प्रवृत्ति अस्वाभाविक नहीं है। परन्तु प्राकृत जगत् के वितरीत, अप्राकृत सम्बन्धरस में इस प्रकार चोरी करने में कोई दोष नहीं है। श्रीमद्भागवत (१०.१३.३३) में शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित से कहते हैं, "हे राजन् ! जैसे ही वृद्धा गोपियों ने पुत्रों को आते देखा, उनमें अनिर्वचनीय वात्सल्य उमड़ पड़ा और वे सब स्नेह से परिप्लावित हो गईं। पहले वे अपने पुत्रों को माखन चोरी करने के लिए दण्डित करने का विचारकर रही थीं, परन्तु जैसे ही पुत्र नेत्रों के सामने आये कि वे अपने सारे क्रोध को भूल बैठीं और वात्सल्य से अभिभूत हो गईं। अपने पुत्रों का आलिंगन करते हुए वे उनके सिर को सूंघने लगीं। इस प्रकार करते हुए पुत्रप्रेम में वे प्रायः पागल हो गईं। अपनी शैशव क्रीड़ा में ये सब गोपबालक श्रीकृष्ण के साथ माखन चोरो किया करते थे, परन्तु श्रीकृष्ण पर क्रुद्ध होने के स्थान पर यशोदा मैय्या जब भी उन्हें देखतीं तो स्तनों से निकली दुग्धधारा से भीग जातीं। श्रीकृष्ण के लिए अपने स्नेह के अतिरेक- वश वे बारम्बार उनके सिर को सूंघने लगतीं। चुम्बन, आलिंगन, नाम लेकर पुकारना और कभी-कभी चोरी करने के लिए उलाहना देना, ये सब गोपबालकों की माताओं की सामान्य