भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४३ वत्सलभक्तिरस जब प्रेम का भाव बढ़कर वात्सल्य सम्बन्ध में विकसित हो जाता है और स्थायित्व को प्राप्त हो जाता है तब उस सम्बन्ध को वात्सल्यरस कहते हैं। भक्ति के वात्सल्यरस का प्रकाश श्रीकृष्ण और उनके पिता-माता आदि गुरुजनों के परस्पर व्यवहार में पाया जाता है। विद्वानों ने श्रीकृष्ण के गुरुजनों में उनके लिए पाए जाने वाले वात्सल्य प्रेम के उद्दीपनों का वर्णन किया है। वे कहते हैं—"जिनकी देह नवीन कुवलय माला के समान श्याम एवं कोमल है, कमलनयन केशराशि रूप भ्रमर पंक्ति से घिरे हुए हैं, ऐसे पुत्र कृष्ण को वृन्दावन में घूमते देखकर नन्द महाराज की गृहिणी यशोदा मैय्या के स्तनों से दुग्ध की धारा बह चली, जिससे उनका सारा शरीर भीग गया।" श्रीकृष्ण के लिए वात्सल्यप्रेम का उद्दीपन करने वाले कुछ विशिष्ट उद्दीपक हैं—उनकी श्यामल देह, उनका सर्वमंगलमयचिह्नों से युक्त स्वरूप, उनकी मृदुता, उनके मधुर वचन, उनकी सरलता, उनकी लज्जा, निरन्तर गुरुजनों के सम्मान करने की भावना, एवं उदारता—ये सब गुण वात्सल्यरस के उद्दीपन माने जाते हैं। श्रीमद्भागवत (१०.८.४५) में शुकदेव गोस्वामी का कथन है कि जिन्हें सम्पूर्ण वेदों में सर्वोच्च देव, उपनिषदों में निर्विशेष ब्रह्म, दर्शन में परम पुरुष माना गया है; योगी जिन्हें परमात्मा जानते हैं और भक्त भगवान् स्वीकार करते हैं, उन्हीं श्रीकृष्ण को यशोदा मैय्या अपना पुत्र मानती हैं। एक बार यशोदा मैय्या ने अपनी एक सखी से कहा, “व्रजराज नन्द महाराज मेरे साथ भगवान् विष्णु की आराधना करते हैं। इसी के फलस्वरूप कृष्ण पूतना और अन्य राक्षसों के चंगुल से बच गया। अर्जुन को तेज आंधी ने गिरा दिया है और यद्यपि समझा जाता है कि कृष्ण ने बलरामजी के साथ मिलकर गोवर्धन पर्वत को धारण किया,