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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 324

'सख्यरस में प्रेम के व्यवहार [ २६७ से दृष्टिगोचर हैं। भाव यह है कि इन भक्तों के महाभाग्य की कोई तुलना नहीं है। गोपवालों का श्रीकृष्ण से जो सख्य सम्बन्ध है वह विशिष्ट प्रकार की दिव्य भावानुभूति है और प्रायः माधुर्य प्रेमभाव जैसा है। गोपबालकों और श्रीकृष्ण में होने वाले प्रेम व्यवहार का वर्णन बहुत कठिन है। श्रील रूप गोस्वामी जैसे विरक्त भक्तों ने श्रीकृष्ण और उनके गोपबाल सखाओं के अनिर्वचनीय भावों पर विस्मय व्यक्त किया है। श्रीकृष्ण और उनके अन्तरंग सखाओं द्वारा परस्पर आस्वादित यह विशेष प्रकार का प्रेमभाव आगे वात्सल्यप्रेम में विकसित होता है और उससे आगे माधुर्यप्रेम का रूप धारण कर लेता है, जो श्रीकृष्ण और उनके भक्तों में होने वाला सर्वोच्च रस है।